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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

प्र० १३०-१३२ : अ० ४ ] पीडनवर्ग, स्तंभवर्ग, कोषसंगवर्ग ५७५

शक्यते वारयितुम्, एकदेशं वा पीडयति । सर्वदेशपीडनं तु परचक्रं विलोपघातदाहविध्वंसनापवाहनैः पीडयतीति ।

(१) प्रकृतिराजविवादयोः प्रकृतिविवादः प्रकृतीनां भेदकः पराभियोगानावहति । राजविवादस्तु प्रकृतीनां द्विगुणभक्तवेतनपरिहारकरो भवतीत्याचार्याः ।

(२) नेति कौटिल्यः । शक्यः प्रकृतिविवादः प्रकृतिमुख्योपग्रहेण कलहस्थानापनयनेन वा वारयितुं, विवदमानास्तु प्रकृतयः परस्परसंघर्षेणोपकुर्वन्ति । राजविवादस्तु पीडनोच्छेदनाय प्रकृतीनां द्विगुणव्यायामसाध्य इति ।

(३) देशराजविहारयोर्देशविहारस्त्रैकाल्येन कर्मफलोपघातं करोति, राजविहारस्तु कारुशिल्पिकुशीलववाग्जीवनरूपाजीवावैदेहकोपकारं करोति इत्याचार्याः ।


आदि मुख्य व्यक्तियों को अनुकूल बनाकर या उनका खातमा कर देने पर भी किया जा सकता है । स्वचक्र से किसी एक धन-धान्य सम्पन्न देश को ही पीड़ा पहुँचती है । किन्तु परचक्र के द्वारा तो लूटने, मारने, आग लगाने, अन्य प्रकार से पीड़ा पहुँचाने और अपने देश से निकाल देने आदि द्वारा अनेक प्रकार की पीड़ाएँ सारे राष्ट्र को उठानी पड़ती है ।'

( १ ) आचार्यों का मत है कि 'प्रकृतिविवाद और राजविवाद, इन दोनों में से प्रकृति-विवाद ही अधिक हानिकर होता है, क्योंकि वह अमात्य आदि में परस्पर फूट डालने वाला और शत्रु के कार्यों को सहारा देने वाला होता है । परन्तु राज-विवाद के कारण प्रकृतियों का दुगुना वेतन, भत्ता बढ़ जाता है और प्रजा के सारे कर माफ कर दिये जाते हैं ।'

( २ ) किन्तु कौटिल्य का कहना है कि 'अमात्य आदि मुख्य प्रकृतियों को अनुकूल बनाकर और कलह के कारणों को मिटा देने से प्रकृति-विवाद को शान्त किया जा सकता है । दूसरी बात यह भी है कि परस्पर विरुद्ध प्रकृति जन स्पर्धावश राजा का उपकार ही करते हैं । किन्तु प्रजा की सारी शक्ति और सम्पूर्ण समृद्धि राजविवाद में नष्ट हो जाती है । उसको शान्त करने के लिए दुगुना यत्न करना पड़ता है ।'

( ३ ) प्राचीन आचार्यों का कहना है कि 'देश-विहार ( हँसी-खेल में फँसा हुआ देश ) और राजविहार ( हँसी-खेल में फँसा हुआ राजा ), इन दोनों में से देशविहार अधिक हानिकर होता है; क्योंकि प्रजाजनों के खेल-कूद में फँसे रहने के कारण कृषि-कार्यों के क्रम में विघ्न हो जाता है । किन्तु राज-विहार से संबद्ध बढ़ई, सुनार, गाने वाले, भाट, वेश्या और व्यापारी आदि व्यक्तियों का बड़ा भला होता है ।'

५७६कौटिल्य का अर्थशास्त्र[ आठवां अधिकरण

(१) नेति कौटिल्यः । देशविहारः कर्मश्रमवधार्थमल्पं भक्षयति, भक्षयित्वा च भूयः कर्मसु योगं गच्छति । राजविहारस्तु स्वयं वल्लभैश्च स्वयंग्राहप्रणयपण्यागारकार्योपग्रहैः पीडयति इति । (२) सुभगाकुमारयोः कुमारः स्वयं वल्लभैश्च स्वयंग्राहप्रणयपण्यागारकार्योपग्रहैः पीडयति । सुभगा विलासोपभोगेनेत्याचार्याः । (३) नेति कौटिल्यः । शक्यः कुमारो मंत्रिपुरोहिताभ्यां वारयितुं न सुभगा, बालिश्यादनर्थजनसंयोगाच्चेति । (४) श्रेणीमुख्ययोः श्रेणी बाहुल्यादनवग्रहा स्तेयसाहसाभ्यां पीडयति, मुख्यः कार्यानुग्रहविघाताभ्यामित्याचार्याः ।

( १ ) किन्तु उक्त मत के विरोध में कौटिल्य का कहना है कि 'प्रजाजनों का मनोविनोद थोड़े ही व्यय में हो जाता है और वह मनोविनोद उन्हें ताजगी देकर दुगुने उत्साह से फिर काम करने में जुटा देता है । किन्तु राजविहार में तो स्वयं राजा के द्वारा तथा राजा के प्रिय व्यक्तियों के द्वारा जनपद की इच्छा के विरुद्ध धन की लूट-मार की जाती है । पण्यशाला से तथा अतिरिक्त कार्यों को पूरा करने के लिए रिश्वत आदि से धन लेकर प्रजा को पीड़ित किया जाता है ।'

( २ ) प्राचीन आचार्यों का मत है कि 'रानी-विहार और युवराज-विहार, इन दोनों में से युवराज-विहार अधिक कष्टकर होता है; क्योंकि युवराज के द्वारा तथा उसके खुशामदी व्यक्तियों के द्वारा जनपद की इच्छा के विरुद्ध धन लेकर पण्यशाला तथा अन्य कार्यों को पूरा करने के लिए रिश्वत लेकर प्रजा को पीड़ित किया जाता है । किन्तु विलास-प्रिय रानी केवल भोग-विलास की सामग्री द्वारा ही प्रजा को पीड़ित करती है ।'

( ३ ) किन्तु कौटिल्य उक्त मत से सहमत नहीं है, उनका कहना है कि 'युवराज को इस प्रकार के अनर्थकारी कार्यों से अमात्य आदि रोक सकते हैं । परन्तु रानियों के सम्बन्ध में यह बात नहीं हो सकती है; क्योंकि उनमें प्रायः मूर्खता अधिक होती है और फिर अनर्थकारी नीच पुरुषों का संसर्ग होने के कारण उन्हें समझाना बहुत कठिन होता है ।'

( ४ ) प्राचीन आचार्यों के मतानुसार 'श्रेणी ( आयुधजीवी तथा कृषिजीवी व्यक्तियों का संघ ) और मुख्य ( प्रधान कर्मचारियों का समूह ), इन दोनों में से श्रेणी पुरुष ही अधिककष्टकर है; क्योंकि वही चोरी डाका आदि से प्रजा को कष्ट पहुँचाते हैं और उनकी संख्या इतनी अधिक होती है कि उन्हें रोका भी नहीं जा सकता है । किन्तु मुख्य पुरुष केवल रिश्वत के मिलने न मिलने के कारण ही कार्यों बनाने-बिगाड़ने के द्वारा प्रजा को तङ्ग करते हैं ।'

प्र० १३०-१३२ : अ० ४ ] पीडनवर्ग, स्तंभवर्ग, कोषसंगवर्ग ५७७

(१) नेति कौटिल्यः । सुव्यावर्त्या श्रेणी समानशीलव्यसनत्वात्, श्रेणीमुख्यैकदेशोपग्रहेण वा । स्तम्भयुक्तो मुख्यः परप्राणद्रव्योपघाताभ्यां पीडयतीति । (२) सन्निधातृसमाहर्त्रोः सन्निधाता कृतविदूषणात्ययाभ्यां पीडयति । समाहर्ता करणाधिष्ठितः प्रदिष्टफलोपभोगी भवतीत्याचार्याः । (३) नेति कौटिल्यः । सन्निधाता कृतावस्थमन्यैः कोशप्रवेश्यं प्रतिगृह्णाति । समाहर्ता तु पूर्वमर्थमात्मनः कृत्वा पश्चाद् राजार्थं करोति प्रणाशयति वा, परस्वादाने च स्वप्रत्ययश्चरतीति । (४) अन्तपालवैदेहकयोरन्तपालश्चोरप्रसंगदेयात्यादानाभ्यां वणिक्पथं पीडयति । वैदेहकास्तु पण्यप्रतिपण्यानुग्रहैः प्रसाधयन्ति । इत्याचार्याः । (५) नेति कौटिल्यः । अन्तपालः पण्यसम्पातानुग्रहेण वर्तयति । वैदेह-


(१) परन्तु आचार्य कौटिल्य का कहना है कि 'श्रेणी पुरुषों को चोरी, डाका आदि से सहज ही में रोका जा सकता है; क्योंकि जहाँ वे चोरी-डाका करते हैं वे लोग भी उन्हीं के स्वभाव एवं व्यवसाय के होते हैं। उनके मुखिया को वश में करके भी उनको चोरी आदि से रोका जा सकता है। परन्तु राजकीय मुख्य पुरुष बड़े अभिमानी होते हैं और वे प्राण तथा धन का अपहरण करके दूसरों को बहुत कष्ट पहुँचाते हैं।'

(२) प्राचीन आचार्य, सन्निधाता और समाहर्त्ता, दोनों में से सन्निधाता को अधिक कष्टकर समझते हैं; क्योंकि वह कार्य बिगाड़कर और प्रजा से अनुचित कर वसूल कर प्रजा को तंग करता है। परन्तु समाहर्त्ता अपने ठीक हिसाब से कार्य करता हुआ नियमित नौकरी को भोगने वाला होता है।

(३) किन्तु आचार्य कौटिल्य का कहना कुछ और ही है। उनका कथन है कि 'सन्निधाता तो दूसरे कर्मचारियों द्वारा वसूल किए हुए धन को एकत्र कर कोष में जमा कर देता है। किन्तु समाहर्त्ता पहिले अपनी रिश्वत लेकर फिर राजकर को वसूल करता है। अथवा उसमें से भी कुछ चुरा लेता है और स्वेच्छया सब कुछ करता है।'

(४) प्राचीन आचार्यों के मत से 'अन्तपाल और वैदेहक, इन दोनों में से अन्तपाल ही अधिक कष्टप्रद है; क्योंकि वह चोरों द्वारा राहगीरों को लुटवाता है; रास्ते का टैक्स मनमाना वसूल करता है; और व्यापारिक मार्गों पर चलने वाले पथिकों को अधिक कष्ट पहुँचाता है। परन्तु वैदेहक क्रय-विक्रय पर अधिक लाभ पहुंचा कर देश को व्यापारिक भागों को उन्नत बनाता है।'

(५) इसके विरुद्ध आचार्य कौटिल्य का कथन है कि 'अन्तपाल एक साथ लाये

३७ कौ०

५७८कौटिल्य का अर्थशास्त्र[ आठवां अधिकरण

कास्तु सम्भूय पण्यानामुत्कर्षापकर्षं कुर्वाणाः पणे पणशतं कुम्भे कुम्भशत-मित्याजीवन्ति । (१) अभिजातोपरुद्धा भूमिः पशुव्रजोपरुद्धा वेति । अभिजातोपरुद्धा भूमिः महाफलाप्यायुधीयोपकारिणी न क्षमा मोक्षयितुं, व्यसनाबाधभयात् । पशुव्रजोपरुद्धा तु कृषियोग्या क्षमा मोक्षयितुं, विवीतं हि क्षेत्रेण बाध्यते । इत्याचार्याः । (२) नेति कौटिल्यः । अभिजातोपरुद्धा भूमिरत्यन्तमहोपकारापि क्षमा मोक्षयितुं व्यसनाबाधभयात् । पशुव्रजोपरुद्धा तु कोशवाहनोपकारिणी न क्षमा मोक्षयितुमन्यत्र सस्यवापोपरोधादिति । (३) प्रतिरोधकाटविकयोः प्रतिरोधका रात्रिसत्रचराः शरीराक्रमिणो नित्याः शतसहस्रापहारिणः प्रधानकोपकाश्च । व्यवहिताः प्रत्यन्तारण्य-चराश्चाटविकाः प्रकाशा दृश्याश्चरन्त्येकदेशघातकाश्च इत्याचार्याः ।


विक्रेय पदार्थों पर उचित वर्तनी ( व्यापारी मार्गों का टैक्स ) लेकर व्यापारिक मार्गों को उन्नत एवं लाभप्रद बनाता है। किन्तु वैदेहक तो आपस में सलाह करके व्यापारी माल के मूल्य को घटा-बढ़ाकर एक पण के सौ पण और एक कुम्भ के सौ कुम्भ लाभ उठाते हैं।'

( १ ) 'विजिगीषु के पारिवारिक पुरुषों से घिरी हुई भूमि को छोड़ना उचित है या गो आदि पशुओं से घिरी हुई भूमि को छोड़ना ठीक है?' इस संबंध में प्राचीन आचार्यों का मत है कि 'यदि विजिगीषु की भूमि अत्यन्त उपजाऊ; लाभदायक और सैनिकों को देकर उपकार करनेवाली हो तो उसको नहीं छोड़ना चाहिए; क्योंकि आक्रमण के समय सैनिक पुरुषों के अभाव में ऐसी भूमि कष्टकर होती है। पशुओं से घिरी भूमि यदि कृषियोग्य हो तो छोड़ी जा सकती है; क्योंकि चारागाह की अपेक्षा खेती से अधिक लाभ हो सकता है।'

( २ ) किन्तु मत के विरुद्ध कौटिल्य का कहना है कि 'विजिगीषु के पारिवारिक पुरुषों की भूमि सैन्य दृष्टि से उपकारक होने पर भी छोड़ी जा सकती है; क्योंकि उससे सदा ही भय बना रहता है। किन्तु पशुओं की भूमि कोष-संग्रह योग्य घृत तथा बैल आदि को देकर अन्यन्त उपकार करने वाली होती है। इसलिए छोड़ने योग्य नहीं है। किन्तु उसके पास यदि अनाज के खेत हों और चारागाह के कारण उनका नुकसान होता हो तो उसे भी छोड़ा जा सकता है, अन्यथा नहीं।'

( ३ ) प्राचीन आचार्यों की दृष्टि से 'प्रतिरोधक ( लुटेरे ) और आटविक ( जंगली ), इन दोनों में से प्रतिरोधक पुरुष ही प्रजा के लिए अधिक कष्टप्रद हैं; क्योंकि प्रतिरोधक रात्रि में तथा घने जंगलों में घूमने वाले, राहगीर पर आक्रमण

प्र० १३०-१३२ : अ० ४ ] पीडनवर्ग, स्तंभवर्ग, कोषसंगवर्ग ५७९

(१) नेति कौटिल्यः। प्रतिरोधकाः प्रमत्तस्यापहरन्ति, अल्पाः कुण्ठाः सुखा ज्ञातुं ग्रहीतुं च। स्वदेशस्थाः प्रभूता विक्रान्ताश्चाटविकाः। प्रकाशयोधिनोऽपहर्तारो हन्तारश्च देशानां राजसधर्माण इति।
(२) मृगहस्तिवनयोर्मृगाः प्रभूताः प्रभूतमांसचर्मोपकारिणो मन्दग्रासावक्लेशिनः सुनियम्याश्च। विपरीता हस्तिनो गृह्यमाणा दुष्टाश्च देशविनाशायेति।
(३) स्वपरस्थानीयोपकारयोः स्वस्थानीयोपकारो धान्यपशुहिरण्यकुप्योपकारो जानपदानामापद्यात्मधारणः। विपरीत: परस्थानीयोपकारः। इति पीडनानि।


करने वाले, सदा ही पास रहने वाले, सैकड़ों-हजारों का धन अपहरण करने वाले और राज्य के प्रमुख व्यक्तियों को लूट के द्वारा कंपित कर देने वाले होते हैं। इसके विपरीत आटविक दूर रहने वाले, सीमा के जंगलों में घूमने वाले, प्रकट रूप में रहने वाले होते हैं। उनसे देश के किसी एक ही भाग को नुकसान पहुँचाता है और पता चल जाने पर लोग उनसे अपनी रक्षा भी कर सकते हैं।'

( १ ) किन्तु आचार्य कौटिल्य का कहना है कि 'प्रतिरोधक पुरुष असावधान व्यक्ति के यहाँ से ही चोरी करते हैं। ये लोग अल्प संख्या में होने के कारण सरलता से पहिचाने जा सकते हैं। किन्तु आटविकों के अपने देश होते हैं और संख्या में भी वे अधिक होते हैं। बहादुर होने के कारण वे बड़ी कठिनाई से कब्जे में आते हैं। वे प्रकट रूप में युद्ध करते हैं, प्राणों का अपहरण करने वाले होते हैं और निरंकुश होने के कारण उनकी स्थिति राजाओं के समान होती है।'

( २ ) मृगवन और हस्तिवन इन दोनों में से मृगवन उत्तम होता है क्योंकि मृगों में मांस और चाम अधिक मात्रा में मिलता है। वे थोड़ा खाने वाले, भागते समय जल्दी थक जाने वाले और पकड़े जाने पर जल्दी ही वश में आने वाले होते हैं। उनके विपरीत हाथी संख्या में कम होते हैं; उन पर बहुत कम चमड़ा और मांस निकलता है; वे अधिक खाते हैं; थकते भी नहीं हैं; मुश्किल में पकड़े जाते हैं और पकड़े जाने पर मार भी डालते हैं।

( ३ ) अपने नगर का उपकार करना और पराये नगर का अपकार करना, इन दोनों में से अपने नगर का उपकार करना; अर्थात् धान्य, पशु, हिरण्य और कुप्य आदि पदार्थों का क्रय-विक्रय करना; जनपदवासियों के विपत्तिकाल में उनकी आत्मरक्षा करना—श्रेष्ठ है। किन्तु दूसरे नगर में क्रय-विक्रय का व्यवहार करके उसे लाभ पहुँचाने से विपरीत ही परिणाम होता है। यहाँ तक पीडनवर्ग का निरूपण किया गया।

५८०कौटिल्य का अर्थशास्त्र[ आठवां अधिकरण

(१) आभ्यन्तरो मुख्यस्तम्भो बाह्यो मित्राटवीस्तम्भः । इति स्तम्भ-वर्गः ।

(२) ताभ्यां पीडनैर्यथोक्तैश्च पीडितः सक्तो मुख्येषु परिहारोपहतः प्रकीर्णो मिथ्यासंहतः सामन्ताटवीहृत इति कोषसङ्गः ।

(३) पीडनानामनुत्पत्तावुत्पन्नानां च वारणे । यतेत देशवृद्धयर्थं नाशे च स्तम्भसंगयोः ॥ १ ॥

इति व्यसनाधिकारिकेऽष्टमेऽधिकरणे पीडनवर्ग-स्तम्भवर्ग-कोषसंगवर्गो नाम चतुर्थोऽध्यायः; आदित एकनविंशतिशततमः ।

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( १ ) स्तंभवर्ग : स्तंभ दो प्रकार का होता है । आभ्यन्तर और बाह्य । अपने ही मुख्य सरकारी कर्मचारियों के द्वारा अर्थ का रोका जाना आभ्यंतर स्तम्भ और भिन्न तथा आटविक पुरुषों द्वारा अर्थ का रोका जाना बाह्य स्तंभ कहलाता है । इस प्रकार स्तंभवर्ग का निरूपण हुआ ।

( २ ) कोषसंग : उक्त दोनों प्रकार के स्तम्भों तथा सरकारी कर्मचारियों के द्वारा उचित आमदनी की मात्रा से घटाया हुआ, छोटे कर्मचारियों से कर वसूली लेकर मुख्य कर्मचारियों द्वारा गवन किया हुआ, राजाज्ञा से माफी के कारण कम हुआ, इधर-उधर बिखरा हुआ, उचित परिमाण से कम-ज्यादा रूप में इकट्ठा किया हुआ और सामन्त तथा आटविक पुरुषों के द्वारा अपहरण किया हुआ धन खजाने में न पहुँच कर बीच ही में नष्ट हो जाता है । उसी का नाम कोषसंग है । इस प्रकार कोषसंग वर्ग का निरूपण किया गया ।

( ३ ) देश की सुख-समृद्धि के लिए राजा को चाहिए कि वह अपने राज्य में पीडनवर्ग को उत्पन्न न होने दे, अथवा उत्पन्न होने पर उनका निवारण करे । स्तम्भवर्ग और कोषसंग को नष्ट करने के लिए भी राजा को सतत यत्नवान् रहना चाहिए ।

इति व्यसनाधिकारिक नामक आठवें अधिकरण में पीडनवर्ग-स्तंभवर्ग-कोषसंगवर्ग नामक चौथा अध्याय समाप्त ।

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प्रकरण १३३-१३४
अध्याय ५

बलव्यसनवर्गः मित्रव्यसनवर्गश्च

(१) बलव्यसनानि। अमानितं विमानितम् अभृतं व्याधितं नवागतं दूरायातं परिश्रान्तं परिक्षीणं प्रतिहतं हताग्रवेगम् अनृतुप्राप्तम् अभूमि-प्राप्तम् आशानिर्वेदि परिसृप्तं कलत्रगर्हि अन्तःशल्यं कुपितमूलं भिन्नगर्भम् अपसृतम् अतिक्षिप्तम् उपनिविष्टं समाप्तम् उपरुद्धं परिक्षिप्तं छिन्नधान्य-पुरुषवीवधं स्वविक्षिप्तं मित्रविक्षिप्तं दूष्ययुक्तं दुष्टपार्ष्णिग्राहं शून्यमूलम् अस्वामिसंहतं भिन्नकूटम् अन्धमिति।

(२) तेषाममानितविमानितयोरमानितं कृतार्थमानं युध्येत, न विमानितमन्तःकोपम्।

(३) अभृतव्याधितयोरभृतं तदात्वकृतवेतनं युध्येत, न व्याधितमकर्मण्यम्।

(४) नवागतदूरायातयोर्नवागतमन्यत उपलब्धदेशमनवमिश्रं युध्येत, न दूरायातमायतगतपरिक्लेशम्।


सेना-व्यसन और मित्र-व्यसन

(१) सेना के व्यसन : अमानित, विमानित, अभृत, व्याधित, नवागत, दुरायात, परिश्रान्त, परिक्षीण, प्रतिहत, हताग्रवेग, अनृतुप्राप्त, अभूमिप्राप्त, आशा-निर्वेदी, परिसृप्त, कलत्रगर्ही, अन्तःशल्य, कुपितमूल, भिन्नगर्भ, अपसृत, अतिक्षिप्त, उपनिविष्ट, समाप्त, उपरुद्ध, परिक्षिप्त, छिन्नधान्य, छिन्नपुरुषवीवध, स्वविक्षिप्त, मित्रविक्षिप्त, दूष्ययुक्त, दुष्टपार्ष्णिग्राह, शून्यमूल, अस्वामिसंहत, भिन्नकूट और अन्ध—ये चौंतीस सेना के व्यसन हैं।

(२) उक्त सैन्य-व्यसनों में अमानित (असत्कृत) और निमानित (तिरस्कृत), इन दो सेनाओं में अमानित सेना सत्कार पाने के बाद युद्ध के लिए तैयार हो जाती है, किन्तु निमानित सेना नहीं, क्योंकि तिरस्कार के कारण वह अन्दर-ही-अन्दर कुपित रहती है।

(३) अभृत (जिसे वेतन न दिया गया हो) और व्याधित (रोगी) इन दोनों सेनाओं में अभृत सेना वेतन, भत्ता दिये जाने पर युद्ध के लिए तैयार हो सकती है, किन्तु व्याधित सेना नहीं, क्योंकि वह बीमारी के कारण कार्य करने में असमर्थ रहती है।

(४) नवागत (नई भरती) और दूरायात (दूर से आई हुई), इन दो

५८२ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ आठवां अधिकरण

(१) परिश्रान्तपरिक्षीणयोः परिश्रान्तं स्नानभोजनस्वप्नलब्धविश्रमं युध्येत, न परिक्षीणमन्यत्राहवे क्षीणयुग्यपुरुषम् । (२) प्रतिहतहताग्रवेगयोः प्रतिहतमग्रपातभग्नं प्रवीरपुरुषसंहतं युध्यते, न हताग्रवेगमग्रपातहतप्रवीरम् । (३) अनृतुभूमिप्राप्तयोरनृतुप्राप्तं यथर्तुयोग्ययुग्यशस्त्रावरणं युध्येत, नाभूमिस्राप्तमवरुद्धप्रसारव्यायामम् । (४) आशानिर्वेदिपरिसृप्तयोराशानिर्वेदि लब्धाभिप्रायं युध्येत, न परिसृप्तमपसृतमुख्यम् । (५) कलत्रगर्ह्यन्तश्शल्ययोः कलत्रगर्ह्यमुन्मुच्य कलत्रं युध्येत, नान्तश्शल्यमन्तरमित्रम् ।

सेनाओं में नवागत सेना दूसरे अनुभवी व्यक्तियों से जानकारी प्राप्त करके तथा पुराने आदमियों के साथ मिलकर युद्ध कर सकती है, किन्तु दूरायात सेना नहीं, क्योंकि वह लम्बी यात्रा से थकी हुई होने के कारण असमर्थ रहती है ।

(१) परिश्रांत (थकी हुई) और परिक्षीण (योग्य सैनिकों से हीन), इन दोनों सेनाओं में परिश्रांत सेना स्नान, भोजन, निद्रा आदि विश्राम प्राप्त कर युद्ध के लिए तैयार हो सकती है; किन्तु परिक्षीण सेना नहीं, क्योंकि उसके योग्य पुरुषों का नाश हो चुका होता है ।

(२) प्रतिहत (पराजित) और हताग्रवेग (हतोत्साह) इन दोनों सेनाओं में प्रतिहत सेना युद्ध के लिए तैयार हो सकती है, किन्तु हताग्रवेग नहीं, क्योंकि वीर सैनिकों के खो देने से युद्ध में जाने के लिए उसका उत्साह जाता रहता है ।

(३) अनृतुप्राप्त (जिसको युद्ध के योग्य समय न मिले) और अभूमिप्राप्त (जिसको कवायद के लिए भूमि प्राप्त न हो) इन दोनों में अनृतुप्राप्त सेना विपरीत समय में भी युद्धोपयोगी साधन प्राप्त कर युद्ध के लिए तैयार हो सकती है, किन्तु अभूमिप्राप्त सेना नहीं, क्योंकि वह अनुपयुक्त भूमि में फँस कर चलने-फिरने तथा युद्धसम्बन्धी कार्यों को करने में असमर्थ रहती है ।

(४) आशानिर्वेदी (आशारहित) और परिसृप्त (नेतृत्वहीन) इन दोनों सेनाओं में आशानिर्वेदी अपना स्वार्थलाभ देखकर युद्ध के लिए तैयार हो सकती है, किन्तु परिसृप्त नहीं, क्योंकि उसका मुख्य नेता नहीं होता है ।

(५) कलत्रगर्ही (कलत्र आदि की निन्दा करने वाला) और अन्तःशल्य (अन्दर से शत्रुता रखने वाला) इन दोनों सैन्यों में कलत्रगर्ही अपने स्त्री-पुरुषों की समुचित व्यवस्था करके युद्ध के लिए तैयार हो सकता है, किन्तु अन्तःशल्य सैन्य नहीं, क्योंकि वह अन्दर से शत्रुता रखता है ।

प्र० १३३-१३४ : अ० ५ ] सेनाव्यसन और मित्रव्यसन ५८३

(१) कुपितमूलभिन्नगर्भयोः कुपितमूलं प्रशमितकोपं सामादिभिर्युध्येत, न भिन्नगर्भमन्योन्यस्माद् भिन्नम् ।
(२) अपसृतातिक्षिप्तयोरपसृतमेकराज्यातिक्रान्तं मन्त्रव्यायामाभ्यां सत्रमित्रापाश्रयं युध्येत, नातिक्षिप्तमनेकराज्यातिक्रान्तं बह्वाबाधत्वात् ।
(३) उपनिविष्टसमाप्तयोरुपनिविष्टं पृथग्यानस्थानमतिसन्धातारं युध्येत, न समाप्तमरिणैकस्थानयानम् ।
(४) उपरुद्धपरिक्षिप्तयोरुपरुद्धमन्यतो निष्क्रम्योपरोधद्वारं प्रतियुध्येत, न परिक्षिप्तं सर्वतः प्रतिरुद्धम् ।
(५) छिन्नधान्यपुरुषवीवधयोः छिन्नधान्यमन्यतो धान्यमानीय जङ्गम-स्थावराहारं वा युध्येत, न छिन्नपुरुषवीवधमनभिसारम् ।


( १ ) कुपितमूल ( क्रोधीली सेना ) और भिन्नगर्भ ( आपसी वैर रखने वाली सेना ) इन दोनों में से कुपितमूल सेना को साम आदि के द्वारा शान्त करके युद्ध के तैयार किया जा सकता है, किन्तु भिन्नगर्भ सेना को नहीं, क्योंकि उसकी आपस में ही अनबन रहती है ।

( २ ) अपसृत ( एक ही राज्य में दूसरी सेना द्वारा कष्ट पायी सेना ) और अतिक्षिप्त ( अनेक राज्यों में दूसरी अनेक सेनाओं द्वारा कष्ट पायी हुई सेना ), इन दोनों में से अपसृत सेना को, विशेष उपायों तथा कवायद आदि के द्वारा जंगल और मित्र का सहारा देकर, युद्ध के लिए तैयार किया जा सकता है, किन्तु अतिक्षिप्त सेना को नहीं, क्योंकि उसे अनेक राज्यों के बहुत-से कष्टों का अनुभव रहता है ।

( ३ ) उपनिविष्ट ( शत्रु के समीप ठहरने वाली किन्तु शत्रु-विमुख सेना ) और समाप्त ( शत्रु के साथ ही ठहरने तथा आक्रमण करने वाली सेना ), इन दोनों में से उपनिविष्ट सेना भिन्न-भिन्न स्थानों में युद्ध करने का अनुभव प्राप्त करने से छावनी के अतिरिक्त अन्यत्र भी युद्ध कर सकती है, किन्तु समाप्त सेना नहीं, क्योंकि शत्रु के सहयोग में रहने के कारण उसके सब भेद शत्रु को मालूम होते हैं ।

( ४ ) उपरुद्ध ( एक ओर से घिरी हुई ) और परिक्षिप्त ( चारों ओर से घिरी हुई ), इन दोनों में से उपरुद्ध सेना दूसरी ओर से निकल कर आक्रमण कर सकती है, किन्तु परिक्षिप्त सेना नहीं, क्योंकि वह चारों ओर से घिरी होती है ।

( ५ ) छिन्नधान्य ( जिस सेना का अपने देश से धान्य आदि मँगाने का सम्बन्ध टूट गया हो ) और विच्छिन्नपुरुषवीवध ( जिस सेना का अपने देश से खाद्य पदार्थ तथा सैनिक सम्बन्ध टूट गया हो ), इन दोनों में से छिन्नधान्य सेना अन्यत्र से अनाज, साग-सब्जी तथा मांस आदि मँगाकर युद्ध कर सकती है, किन्तु विच्छिन्नपुरुषवीवध सेना नहीं, क्योंकि वह सब तरह से असहाय होती है ।

५८४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ आठवां अधिकरण

(१) स्वविक्षिप्तमित्रविक्षिप्तयोः स्वविक्षिप्तं स्वभूमौ विक्षिप्तं सैन्य- मापदि शक्यमवस्त्रावयितुं, न मित्रविक्षिप्तं विप्रकृष्टदेशकालत्वात् । (२) दूष्ययुक्तदुष्टपाष्णिग्राहयोर्दूष्ययुक्तमाप्तपुरुषाधिष्ठितमसंहतं यु- ध्येत, न दुष्टपाष्णिग्राहं पृष्ठाभिघातत्रस्तम् । (३) शून्यमूलस्वामिसंहतयोः शून्यमूलं कृतपौरजानपदारक्षं सर्वसन्दो- हेन युध्येत, नास्वामिसंहतं राजसेनापतिहीनम् । (४) भिन्नकूटान्धयोभिन्नकूटमन्याधिष्ठितं युध्येत, नान्धमदेशिक- मिति । (५) दोषशुद्धिर्बलावापः सत्रस्थानातिसंहतम् । सन्धिश्चोत्तरपक्षस्य बलव्यसनसाधनम् ॥ (६) रक्षेत् स्वदण्डं व्यसने शत्रुभ्यो नित्यमुत्थितः । प्रहरेद् दण्डरन्ध्रेषु शत्रूणां नित्यमुत्थितः ॥


( १ ) स्वविक्षिप्त ( अपने ही देश में इधर-उधर भेजी ) और मित्रविक्षिप्त ( मित्र देश को भेजी हुई ), इन दोनों सेनाओं में से स्वविक्षिप्त सेना आवश्यकतानुसार आसानी से एकत्र की जा सकती है, किन्तु मित्रविक्षिप्त सेना नहीं, क्योंकि दूर होने के कारण वह समय पर काम नहीं आ सकती ।

( २ ) दूष्ययुक्त ( राजद्रोहियों से सम्बद्ध ) और दुष्ट पाष्णिग्राह ( जिसके पीछे दुष्ट सेना हो ) इन दोनों में से दूष्ययुक्त सेना, दूष्य पुरुषों की सेवा में विश्वस्त पुरुषों को नियुक्त कर, युद्ध के लिए तैयार हो सकती है, किन्तु दुष्टपाष्णिग्राह नहीं, क्योंकि उसको पीछे के आक्रमण का सदा भय बना रहता है ।

( ३ ) शून्यमूल ( राजधानी की अत्यल्प सेना ) और अस्वामिसंहत ( राजा तथा सेनापति रहित सेना ), इन दोनों में से शून्यमूल सेना नगरनिवासियों तथा जनपद-निवासियों की सहायता से युद्ध कर सकती है, किन्तु अस्वामिसंहत सेना नहीं, क्योंकि वह अपने नेता से रहित होती है ।

( ४ ) भिन्नकूट ( प्रधान सेनापति से रहित ) और अन्ध ( शत्रु के व्यवहारों से सर्वथा अपरिचित ), इन दोनों सेनाओं में से भिन्नकूट सेना किसी दूसरे सेनापति के शासन से युद्ध के लिए तैयार हो सकती है, किन्तु अन्ध सेना नहीं, क्योंकि उसमें शत्रु के व्यवहारों से सर्वथा अपरिचित सैनिक रहते हैं ।

( ५ ) सैनिक व्यसनों के परिहार का उपाय : अमानन, विमानन, आदि दोषों का प्रायश्चित करना, दोषरहित सेना को दूसरी सेना के साथ ठहराना, जंगली स्थानों में सेना की स्थिति बनाये रखना, क्रूर उपायों से शत्रुसेना का भेदन करना और अपने से बलवान् पक्ष के साथ सन्धि करना, ये सेनासम्बन्धी व्यसनों (बल-व्यसनों) को दूर करने के उपाय हैं ।

( ६ ) विजिगीषु को चाहिए कि सदा सजग रहता हुआ वह व्यसनकाल में शत्रु

प्र० १३३-१३४ : अ० ५ ] सेनाव्यसन और मित्रव्यसन ५८५

(१) अभियातं स्वयं मित्रं सम्भूयान्यवशेन वा।
परित्यक्तमशक्त्या वा लोभेन प्रणयेन वा॥
(२) विक्रीतमभियुञ्जाने सङ्ग्रामे वांपवर्तिना।
द्वैधीभावेन वा मित्रं यास्यता वान्यमन्यतः॥
(३) पृथग्वा सहयाने वा विश्वासेनातिसंहितम्।
भयावमानालस्यैर्वा व्यसनान्न प्रमोक्षितम्॥
(४) अवरुद्धं स्वभूमिभ्यः समीपाद् वा भयाद् गतम्।
आच्छेदनाददानाद् वा दत्त्वा वाप्यवमानितम्॥
(५) आत्याहारितमर्थं वा स्वयं परमुखेन वा।
अतिभारे नियुक्तं वा भङ्क्त्वा परमवस्थितम्॥


सेना से अपनी सेना की रक्षा करे और बड़ी चतुरता से शत्रुसेना की निर्बलताओं का पता लगा कर उन पर सदा प्रहार करता रहे।

(१) मित्रव्यसन : जब विजिगीषु असमर्थ होने के कारण या लोभ तथा स्नेह के कारण अपने प्रयोजन से अथवा किसी बन्धु आदि के प्रयोजन से शत्रु के साथ मिल कर शत्रु पर आक्रमण करने वाले अपने मित्र की सहायता नहीं करता तो वह बिछुड़ा हुआ मित्र फिर बड़ी मुश्किल से उसके वश में आता है।

(२) युद्ध के दौरान में ही शत्रु से कुछ धन आदि लेकर अपनी सहायता को पूरा न करके विजिगीषु द्वारा बीच ही में छोड़ा हुआ मित्र, अथवा द्वैधीभाव द्वारा अपने यातव्य पर आक्रमण कर देने के कारण बेचा हुआ मित्र, अथवा 'तुम इस ओर आक्रमण करो और मैं इस ओर' इस प्रकार परस्पर अपने मित्र के शत्रु के साथ संधि करके किसी दूसरे ही अपने शत्रु पर आक्रमण करने वाले विजिगीषु से ठगा हुआ मित्र फिर बड़ी मुश्किल से उसके वश में आता है।

(३) पृथक् आक्रमण करने या एक साथ आक्रमण करने पर पहले विश्वास दिलाकर और बाद में छिपे तौर से मित्र के शत्रु के साथ सन्धि करके विजिगीषु द्वारा खोया हुआ मित्र, अथवा मित्र के सम्बन्ध में तिरस्कार की भावना रखने के कारण या अपने ही आलस्य के कारण आपत्ति से न छुड़ाया गया मित्र बड़ी मुश्किल से वश में आता है।

(४) विजिगीषु के देश में जाने से रोका गया मित्र अथवा वध-बन्धन के भय से विजिगीषु के पास से गया हुआ मित्र अथवा बलपूर्वक द्रव्य का अपहरण करने से तिरस्कृत हुआ मित्र, अथवा देने योग्य वस्तु न देने के कारण या देकर फिर तिरस्कृत हुआ मित्र बड़ी कठिनाई से वश में आता है।

(५) विजिगीषु के द्वारा या किसी दूसरे के द्वारा धन का सर्वथा अपहरण किया गया या कराया गया मित्र, अथवा विजिगीषु के शत्रु को जीतकर आया हुआ और तत्काल ही किसी दूसरे दुःसाध्य कार्य पर लगाया हुआ मित्र बिगड़ जाने पर बड़ी मुश्किल से वश में आता है।

५८६ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ आठवां अधिकरण

(१) उपेक्षितमशक्त्या वा प्रार्थयित्वा विरोधितम् । कृच्छ्रेण साध्यते मित्रं सिद्धं चाशु विरज्यति ॥ (२) कृतप्रयासं मान्यं वा मोहान्मित्रममानितम् । मानितं वा न सदृशं भक्तितो वा निवारितम् ॥ (३) मित्रोपघातत्रस्तं वा शङ्कितं वारिसंहितात् । दूष्यैर्वा भेदितं मित्रं साध्यं सिद्धं च तिष्ठति ॥ (४) तस्मान्नोत्पादयेदेनान् दोषान् मित्रोपघातकान् । उत्पन्नान् वा प्रशमयेद् गुणैर्दोषोपघातिभिः ॥ (५) यतो निमित्तं व्यसनं प्रकृतीनामवाप्नुयात् । प्रागेव प्रतिकुर्वीत तन्निमित्तमतन्द्रितः ॥

इति व्यसनाधिकारिकेऽष्टमेऽधिकरणे बलव्यसन-मित्रव्यसनवर्गो नाम पञ्चमोऽध्यायः; आदितो विंशतिशततमः ।

समाप्तमिदमष्टमं व्यसनाधिकारिकं नामाधिकरणम् ।

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( १ ) असमर्थ होने के कारण ठुकराया गया मित्र, अथवा मित्रता के लिए प्रार्थना करके फिर विरुद्ध किया गया मित्र बड़ी कठिनाई से वश में आता है ।

( २ ) जिस मित्र ने विजिगीषु के लिए अत्यन्त कठिन संग्राम किया हो, भ्रम या प्रमाद से तिरस्कृत हुआ ऐसा पूजा योग्य मित्र अथवा परिश्रम के योग्य सत्कार न किया हुआ मित्र, अथवा विजिगीषु में अनुराग होने के कारण विजिगीषु के शत्रुओं से दुत्कारा गया मित्र, शीघ्र ही फिर विजिगीषु के वश में हो जाता है ।

( ३ ) विजिगीषु के द्वारा किसी दूसरे मित्र पर किये गये आघात को देखकर डरा हुआ मित्र अथवा विजिगीषु द्वारा शत्रु के साथ सन्धि कर लेने पर शंकित हुआ मित्र, शीघ्र ही विजिगीषु के वश में हो जाता है ।

( ४ ) इसलिए विजिगीषु को चाहिए कि वह मित्रों के साथ भेद डालने वाले उक्त दोषों को अपने में कभी पनपने ही न दे । यदि कोई दोष पैदा भी हो जायँ तो उन्हें दोषनाशक गुणों के द्वारा तत्काल ही शान्त कर देना चाहिए ।

( ५ ) विजिगीषु को चाहिए कि वह आलस्य का परित्याग कर अपने प्रकृतिवर्ग में, व्यसनों के पैदा होने से पहिले ही, उनके कारणों का प्रतिकार कर दे ।

इति व्यसनाधिकारिक नामक आठवें अधिकरण में बलव्यसन-मित्रव्यसनवर्ग-नामक पाँचवां अध्याय समाप्त ।

—: ० :—

नौवाँ अधिकरण

नौवाँ अधिकरण

अभियास्यत्कर्म

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प्रकरण १३५-१३६# शक्तिदेशकालबलाबलज्ञानं
अध्याय १### यात्राकालाश्च

(१) विजिगीषुरात्मनः परस्य च बलाबलं शक्तिदेशकालयात्राकाल-बलसमुत्थानकालपश्चात्कोपक्षयव्ययलाभापदां ज्ञात्वा विशिष्टबलो यायात् । अन्यथासीत ।

(२) उत्साहप्रभावयोरुत्साहः श्रेयान् । स्वयं हि राजा शूरो बलवान-रोगः कृतास्त्रो दण्डद्वितीयोऽपि शक्तः प्रभाववन्तं राजानं जेतुम्, अल्पोऽपि चास्य दण्डस्तेजसा कृत्यकरो भवति । निरुत्साहस्तु प्रभाववान् राजा विक्र-माभिपन्नो नश्यति इत्याचार्याः ।

(३) नेति कौटिल्यः । प्रभाववानुत्साहवन्तं राजानं प्रभावेणाति-सन्धत्ते । तद्विशिष्टमन्यं राजानमावाह्य हृत्वा क्रीत्वा प्रवीरपुरुषान् । प्रभूतप्रभावहयहस्तिरथोपकरणसम्पन्नश्चास्य दण्डः सर्वत्राप्रतिहतश्चरति ।


शक्ति, देश, काल के बलाबल का ज्ञान और आक्रमण का समय

( १ ) विजिगीषु को चाहिए कि वह अपने और शत्रु के बीच शक्ति, देश, काल, युद्धकाल, सेना की उन्नति का समय ( बलसमुत्थानकाल ), पश्चात्कोप ( अपनी सेना-रहित राजधानी में पाणिग्राह के आक्रमण की आशंका ), क्षय, व्यय, लाभ और आपत्ति आदि बलाबल के सम्बन्ध में भलीभाँति जानकर शत्रु की अपेक्षा अधिक सेना लेकर उस पर आक्रमण करे । यदि अधिक सैन्यबल का प्रबन्ध न हो सके तो चुपचाप बैठा रहे ।

( २ ) शक्ति : प्राचीन आचार्यों का कहना है कि उत्साहशक्ति और प्रभावशक्ति इन दोनों में से उत्साहशक्ति श्रेष्ठ है, क्योंकि शूर, बलवान्, नीरोग, शस्त्रास्त्र चलाने में निपुण, केवल अपनी ही सेना की सहायता पर निर्भर रहने वाला उत्साहशक्ति-सम्पन्न राजा, प्रभावशक्तिसम्पन्न राजा को अच्छी तरह जीत सकता है । उसके तेज से उसकी थोड़ी सेना भी हर तरह का कार्य करने के लिए तैयार रहती है । प्रभाव-सम्पन्न, किन्तु उत्साहहीन राजा पराक्रम के समय अपनी रक्षा नहीं कर पाता है ।

( ३ ) पूर्वाचार्यों के उक्त मत के विरुद्ध आचार्य कौटिल्य का कहना है कि 'प्रभावशाली राजा उत्साही राजा को अपने प्रभाव से पराभूत कर लेता है । अपने प्रभाव से वह अधिक उत्साही किसी दूसरे राजा को अपने पक्ष में कर सकता है ।

५९० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ नौवां अधिकरण

उत्साहवतश्च प्रभाववन्तो जित्वा क्रीत्वा च स्त्रियो बालाः पङ्गवोऽन्धाश्च पृथिवीं जिग्युः इति । (१) प्रभावमन्त्रयोः प्रभावः श्रेयान् । मन्त्रशक्तिसम्पन्नो हि वन्ध्यबुद्धि-रप्रभावो भवति, मन्त्रकर्म चास्य निश्चितमप्रभावो गर्भधान्यमवृष्टिरिवोप-हन्ति इत्याचार्याः । (२) नेति कौटिल्यः । मन्त्रशक्तिः श्रेयसी । प्रज्ञाशास्त्रचक्षुर्हि राजा अल्पेनापि प्रयत्नेन मन्त्रमाधातुं शक्तः, परानुत्साहप्रभाववतश्च सामादिभि-र्योगोपनिषद्भूयां चातिसन्धातुम् । एवमुत्साहप्रभावमन्त्रशक्तीनामुत्तरोत्तरा-धिकोऽतिसन्धत्ते । (३) देशः पृथिवी । तस्यां हिमवत्समुद्रान्तरमुदीचीनं योजनसहस्रपरि-माणं तिर्यक् चक्रवर्तिक्षेत्रम् । तत्रारण्यो ग्राम्यः पार्वत औदको भौमः समो


बहादुर आदमियों को भत्ता, वेतन, धन आदि देकर वह अपने वश में कर सकता है । घोड़ा, हाथी, रथ तथा शस्त्रास्त्र आदि साधनों से युक्त उसकी सेना निःशंक होकर विचरण कर सकती है । इतिहास हमें बताता है कि स्त्री, बालक, लँगड़े और अन्धे प्रभावशक्तिसम्पन्न राजाओं ने अपने प्रभाव के कारण उत्साहशक्तिसम्पन्न राजाओं को जीतकर अथवा अपने वश में करके पृथिवी पर विजय प्राप्त की थी ।'

( १ ) प्राचीन आचार्यों का अभिमत है कि 'प्रभावशक्तिसम्पन्न और मन्त्रशक्ति-सम्पन्न इन दोनों राजाओं में से प्रभावशक्तिसम्पन्न राजा अधिक श्रेष्ठ है, क्योंकि मन्त्रशक्तिसम्पन्न होकर भी राजा यदि प्रभावशक्ति रहित हुआ तो उसका मन्त्र सफल नहीं होता । उसके सुविचारित कार्य उसी प्रकार नष्ट हो जाते हैं जैसे वृष्टि की अपेक्षा रखता हुआ गर्भस्थ धान्य वर्षा न होने के कारण नष्ट हो जाता है ।'

( २ ) उक्त मत के विरुद्ध आचार्य कौटिल्य का कहना है कि 'प्रभावशक्ति की अपेक्षा मन्त्रशक्ति ही श्रेष्ठ है, क्योंकि जिस राजा के पास बुद्धि तथा शास्त्ररूपी नेत्र हैं वह थोड़ा प्रयत्न करने पर ही मन्त्र का अच्छी तरह अनुष्ठान कर सकता है और उत्साह, प्रभाव, साम तथा औपनिषदिक उपायों द्वारा शत्रुओं को वश में कर सकता है । इसी प्रकार उत्साह, प्रभाव और मन्त्र, तीनों शक्तियाँ उत्तरोत्तर बलवान् हैं । अर्थात् उत्तरोत्तर शक्ति से सम्पन्न राजा पूर्व-पूर्व शक्ति से सम्पन्न राजा को वश में कर सकता है ।'

( ३ ) देश : देश कहते हैं पृथिवी को । हिमालय से लेकर दक्षिण समुद्र पर्यन्त-पूर्व-पश्चिम दिशाओं में एक हजार योजन तक फैला हुआ और पूर्व-पश्चिम की सीमाओं के बीच का भू-भाग चक्रवर्ती क्षेत्र कहलाता है, अर्थात् इतनी पृथिवी पर राज्य करने वाला राजा चक्रवर्ती होता है । उस चक्रवर्ती क्षेत्र में जंगल, आबादी, पहाड़ी इलाका,

प्र० १३५-१३६ : अ० १ ] शक्त्यादिज्ञान और यात्राकाल ५९१

विषम इति विशेषाः । तेषु यथास्वबलवृद्धिकरं कर्म प्रयुञ्जीत । यत्रात्मनः सैन्यव्यायामानां भूमिरभूमिः परस्य, स उत्तमो देशः । विपरीतोऽधमः । साधारणो मध्यमः । (१) कालः शीतोष्णवर्षात्मा । तस्य रात्रिरहः पक्षो मास ऋतुरयनं संवत्सरो युगमिति विशेषाः । तेषु यथास्वबलवृद्धिकरं कर्म प्रयुञ्जीत । यत्रात्मनः सैन्यव्यायामानामृतुरनृतुः परस्य स उत्तमः कालः । विपरीतोऽधमः । साधारणो मध्यमः । (२) शक्तिदेशकालानां तु शक्तिः श्रेयसीत्याचार्याः । शक्तिमान् हि निम्नस्थलवतो देशस्य शीतोष्णवर्षवतश्च कालस्य शक्तः प्रतीकारे भवति । (३) देशः श्रेयानित्येके, स्थलगती हि श्वा नक्रं विकर्षति, निम्नगतो नक्रः श्वानमिति । (४) कालः श्रेयानित्येके । दिवा काकः कौशिकं हन्ति, रात्रौ कौशिकः काकम् इति ।


जल, स्थल, समतल और ऊबड़-खाबड़ आदि विशेष भाग होते हैं। इन भू-भागों को इस प्रकार व्यवस्थित किया जाय जिससे अपनी बल-वृद्धि में निरन्तर विकास होता रहे। जिस प्रदेश में अपनी सेना की कवायद के लिए सुविधा तथा शत्रुसेना की कवायद के लिए असुविधा हो वह उत्तम देश, जो इसके सर्वथा विपरीत हो वह अधम देश और जो अपने तथा शत्रु के लिए एक समान सुविधा-असुविधा वाला हो वह मध्यम देश कहलाता है ।

( १ ) काल : काल के तीन विभाग हैं : सर्दी, गर्मी और वर्षा । काल का यह प्रत्येक भाग रात, दिन, पक्ष, मास, ऋतु, अयन, संवत्सर तथा युग आदि विशेषताओं में विभक्त है । समय के इन विशेष भागों में अपनी शक्ति को बढ़ाने योग्य कार्य करने चाहिए । जो ऋतु अपनी सेना के व्यायाम के लिए अनुकूल हो वह उत्तम ऋतु जो इसके विपरीत हो वह अधम ऋतु, और जो सामान्य हो वह मध्यम ऋतु कहलाती है ।

( २ ) प्राचीन आचार्यों का मत है कि ‘शक्ति, देश और काल, इन तीनों में शक्ति ही सर्वोच्च है, क्योंकि शक्तिसम्पन्न राजा ऊबड़-खाबड़ प्रदेश और वर्षा, गर्मी आदि प्रतिकूल समय में विपरीत परिस्थितियों का प्रतीकार करने में समर्थ होता है ।’

( ३ ) कुछ पूर्वाचार्यों का यह कहना है कि ‘इन तीनों में देश ही श्रेष्ठ है, क्योंकि जमीन पर तो कुत्ता घड़ियाल को खींच लेता है और पानी में वही घड़ियाल कुत्ते को खींच लेता है ।’

( ४ ) इसके विपरीत कुछ आचार्य समय को ही श्रेष्ठ बताते हैं । उनका कहना

५९२कौटिल्य का अर्थशास्त्र[ नौवां अधिकरण

(१) नेति कौटिल्यः । परस्परसाधका हि शक्तिदेशकालाः । (२) तैरभ्युच्चितः तृतीयं चतुर्थं वा दण्डस्यांशं मूले पाष्ण्यां प्रत्यन्ताट-वीषु च रक्षां विधाय कार्यसाधनसहं कोशदण्डं चादाय क्षीणपुराणभक्तम-गृहीतनवभक्तमसंस्कृतदुर्गममित्रं, वार्षिकं चास्य सस्यं हैमनं च मुष्टिमुप-हन्तुं मार्गशीर्षी यात्रां यायात् । क्षीणतृणकाष्ठोदकमसंस्कृतदुर्गममित्रं वास-न्तिकं चास्य सस्यं वार्षिकीं वा मुष्टिमुपहन्तुं ज्येष्ठामूलीयां यात्रां यायात् । (३) अत्युष्णमल्पयवसेन्धनोदकं वा देशं हेमन्ते यायात् । (४) तुषारदुर्दिनमगाधनिम्नप्रायं गहनतृणवृक्षं वा देशं ग्रीष्मे यायात् ।


है 'क्योंकि यह समय का ही प्रभाव है कि दिन में कौवा उल्लू को मार लेता है, रात में उल्लू कौए को।'

( १ ) किन्तु आचार्य कौटिल्य इस प्रकार के भेद को नहीं मानता है। उसका कहना है कि 'शक्ति, देश, काल, ये तीनों ही प्रबल और एक-दूसरे के पूरक हैं।'

( २ ) यात्राकाल : विजिगीषु राजा को चाहिए कि वह शक्ति, देश, काल से सम्पन्न होकर आवश्यकतानुसार सेना के तिहाई या चौथाई भाग को अपनी राजधानी, अपने पार्ष्णि और अपने सरहदी इलाकों की रक्षा के लिए नियुक्त कर यथेष्ट कोष तथा सेना को साथ लेकर शत्रु पर विजय करने के लिए अगहन मास में युद्ध के लिए प्रस्थान करे, क्योंकि इस समय शत्रु का पुराना अन्न-संचय समाप्ति पर होता है, नई फसल के अन्न को संग्रह करने का समय वही होता है, और वर्षा के बाद किलों की मरम्मत नहीं हुई रहती है। यही समय है जब कि वर्षा ऋतु से उत्पन्न फसल को और आगे हेमंत ऋतु में पैदा होने वाली फसल दोनों को नष्ट किया जा सकता है। इसी प्रकार हेमंत ऋतु की पैदावार को आगे वसंतऋतु में होने वाली पैदावार को नष्ट करने के लिए उपयुक्त युद्ध प्रमाण-काल चैत्रमास में है। यात्रा का यह दूसरा समय है। इसी प्रकार वसन्त की पैदावार को और आगे की होने वाली वर्षाकाल की फसल को नष्ट करने का उपयुक्त समय ज्येष्ठ मास में है। क्योंकि इस समय घास, फूस, लकड़ी, जल आदि सभी क्षीण हुए रहते हैं और इसलिए शत्रु अपने दुर्ग की मरम्मत नहीं कर पाता है। यात्राकाल का यह तीसरा अवसर है। ये तीनों यात्रा-काल शत्रु को हानि पहुँचाने के लिए अत्यन्त उपयोगी हैं।

( ३ ) जो देश अत्यन्त गरम हो, जहाँ यवस (पशुओं की खाद्य सामग्री), ईंधन तथा जल की कमी हो वहाँ हेमंत ऋतु में युद्ध के लिए प्रस्थान करना चाहिए।

( ४ ) जिस देश में लगातार वरफ पड़ती या वारिस होती हो, जहाँ बड़े-बड़े तालाब एवं घने जंगल हों वहाँ ग्रीष्म ऋतु में युद्ध के लिए जाना चाहिए।

प्र० १३५-१३६ : अ० १ ] शक्त्यादिज्ञान और यात्राकाल ५९३

(१) स्वसैन्यव्यायामयोग्यं परस्यायोग्यं वर्षति यायात् । (२) मार्गशीर्षं तैषीं चान्तरेण दीर्घकालां यात्रां यायात् । चैत्रं वैशाखं चान्तरेण मध्यमकालां, ज्येष्ठामूलीयमाषाढं चान्तरेण ह्रस्वकालामुपोषि-ष्यन् । व्यसने चतुर्थीम् । व्यसनाभियानं विगृह्ययाने व्याख्यातम् । (३) प्रायशश्चाचार्याः परव्यसने यातव्यमित्युपदिशन्ति । (४) शक्त्युदये यातव्यमनैकान्तिकत्वाद्व्यसनानाम् इति कौटिल्यः । (५) यदा वा प्रयात: कर्शयितुमुच्छेत्तुं वा शक्नुयादमित्रं, तदा यायात् । (६) अत्युष्णोपक्षीणे कालेऽहस्तिबलप्रायो यायात् । हस्तिनो ह्यन्तः-स्वेदाः कुष्ठिनो भवन्ति । अनवगाहमानास्तोयमपिबन्तश्चान्तरवक्षारान्धा-न्धीभवन्ति । तस्मात्प्रभूतोदके देशे, वर्षति च हस्तिबलप्रायो यायात् । विपर्यये खरोष्ट्राश्वबलप्रायः । देशमल्पवर्षपङ्कम् वर्षति मरुप्रायं चतुरङ्ग-बलो यायात् ।


( १ ) जो अपनी सेना के कवायद करने के लिए उपयुक्त और शत्रुसेना के लिए अनुपयुक्त हो ऐसे देश पर वर्षाऋतु में आक्रमण करना चाहिए ।

( २ ) जब किसी दूर देश के आक्रमण में अधिक समय लग जाने की संभावना हो तो वहाँ मार्गशीर्ष और पौष इन दो महीनों में यात्रा करनी चाहिए । मध्यम-कालीन यात्रा चैत्र-वैशाख के बीच करनी चाहिए । जहाँ अल्पकालिक यात्रा हो वहाँ ज्येष्ठ-आषाढ़ में प्रस्थान किया जाना चाहिए । जब कभी शत्रु पर व्यसन आया दिखाई दे तब समय की बिना अपेक्षा किये चढ़ाई कर देनी चाहिए । यह चौथी यात्रा है । व्यसन पीड़ित शत्रु पर आक्रमण करने के सम्बन्ध में विगृह्ययान नामक प्रकरण में निर्देश किया जा चुका है ।

( ३ ) प्राचीन आचार्यों का प्रायः कहना यही है कि 'जब भी शत्रु पर आपत्ति आई जान पड़े तभी आक्रमण कर देना चाहिए ।'

( ४ ) इसके ठीक विपरीत आचार्य कौटिल्य का कहना है कि विजिगीषु जब भी अधिक शक्तिसम्पन्नावस्था में हो तभी आक्रमण करना चाहिए ।

( ५ ) अथवा जिस समय भी शत्रु को निर्बल किया जा सके या शत्रु को विनष्ट किया जा सके तभी चढ़ाई कर देनी चाहिए ।

( ६ ) अत्यन्त गर्मी के मौसम में हाथियों को छोड़कर ऊँट आदि की सेना लेकर आक्रमण करना चाहिए । क्योंकि पानी के अभाव में अत्यधिक उष्ण प्रदेशों में हाथी कोढ़ी हो जाया करते हैं, स्नान के अभाव से और पीने के लिए पर्याप्त पानी न मिलने के कारण अन्दर का दाह बढ़ जाने से हाथी अंधे हो जाते हैं । इसलिए जिस देश में पर्याप्त जल हो और वर्षा होती हो वहीं हाथियों की सेना लेकर आक्रमण करना चाहिए ।

३८ कौ०

५९४कौटिल्य का अर्थशास्त्र[ नौवां अधिकरण

(१) समविषमनिम्नस्थलह्रस्वदीर्घवशेन वाऽध्वनो यात्रां विभजेत् । (२) सर्वा वा ह्रस्वकालाः स्युर्यातव्याः कार्यलाघवात् । दीर्घाः कार्यगुरुत्वाद्वा वर्षावासः परत्र च ॥

इति अभियास्यत्कर्मणि नवमाऽधिकरणे शक्तिदेशकालवलाबलज्ञानं यात्राकालाः नाम प्रथमोऽध्यायः; आदित एकविंशत्युत्तरशततमः ।

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जहाँ जल का स्थायी प्रबन्ध न हो और वर्षा भी न होती हो ऐसे देशों में गधा, ऊँट तथा घोड़ों की सेना लेकर आक्रमण करना चाहिए । जिस देश में वर्षा होने पर भी कीचड़ कम होता हो, ऐसे रेगिस्तानी देशों में हाथी, घोड़े, रथ और पैदल चतुरंग सेना को लेकर भी आक्रमण किया जा सकता है ।

( १ ) अथवा समतल, ऊबड़-खावड़, जलमय, स्थलमय, अल्पकालीन और दीर्घकालीन आदि परिस्थितियों को देखकर यात्राकाल को विभक्त किया जा सकता है ।

( २ ) थोड़े कार्यों की सिद्धि के लिए समय की भी कम आवश्यकता होती है । इसी प्रकार बड़े कार्यों को सम्पन्न करने के लिए यात्रा भी दीर्घकालीन होती है । कभी-कभी वर्षा ऋतु में भी कार्याधिक्य के कारण दूसरे देश में रहना पड़ता है । इसलिए कार्यों के छोटे-बड़े होने के हिसाब से यात्राएँ भी छोटी-बड़ी समझनी चाहिए ।

अभियास्यत्कर्म नामक नवम अधिकरण में शक्त्यादिज्ञान और यात्राकाल नामक पहला अध्याय समाप्त ।

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