कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्र० १३०-१३२ : अ० ४ ] पीडनवर्ग, स्तंभवर्ग, कोषसंगवर्ग ५७९
(१) नेति कौटिल्यः। प्रतिरोधकाः प्रमत्तस्यापहरन्ति, अल्पाः कुण्ठाः सुखा ज्ञातुं ग्रहीतुं च। स्वदेशस्थाः प्रभूता विक्रान्ताश्चाटविकाः। प्रकाशयोधिनोऽपहर्तारो हन्तारश्च देशानां राजसधर्माण इति।
(२) मृगहस्तिवनयोर्मृगाः प्रभूताः प्रभूतमांसचर्मोपकारिणो मन्दग्रासावक्लेशिनः सुनियम्याश्च। विपरीता हस्तिनो गृह्यमाणा दुष्टाश्च देशविनाशायेति।
(३) स्वपरस्थानीयोपकारयोः स्वस्थानीयोपकारो धान्यपशुहिरण्यकुप्योपकारो जानपदानामापद्यात्मधारणः। विपरीत: परस्थानीयोपकारः। इति पीडनानि।
करने वाले, सदा ही पास रहने वाले, सैकड़ों-हजारों का धन अपहरण करने वाले और राज्य के प्रमुख व्यक्तियों को लूट के द्वारा कंपित कर देने वाले होते हैं। इसके विपरीत आटविक दूर रहने वाले, सीमा के जंगलों में घूमने वाले, प्रकट रूप में रहने वाले होते हैं। उनसे देश के किसी एक ही भाग को नुकसान पहुँचाता है और पता चल जाने पर लोग उनसे अपनी रक्षा भी कर सकते हैं।'
( १ ) किन्तु आचार्य कौटिल्य का कहना है कि 'प्रतिरोधक पुरुष असावधान व्यक्ति के यहाँ से ही चोरी करते हैं। ये लोग अल्प संख्या में होने के कारण सरलता से पहिचाने जा सकते हैं। किन्तु आटविकों के अपने देश होते हैं और संख्या में भी वे अधिक होते हैं। बहादुर होने के कारण वे बड़ी कठिनाई से कब्जे में आते हैं। वे प्रकट रूप में युद्ध करते हैं, प्राणों का अपहरण करने वाले होते हैं और निरंकुश होने के कारण उनकी स्थिति राजाओं के समान होती है।'
( २ ) मृगवन और हस्तिवन इन दोनों में से मृगवन उत्तम होता है क्योंकि मृगों में मांस और चाम अधिक मात्रा में मिलता है। वे थोड़ा खाने वाले, भागते समय जल्दी थक जाने वाले और पकड़े जाने पर जल्दी ही वश में आने वाले होते हैं। उनके विपरीत हाथी संख्या में कम होते हैं; उन पर बहुत कम चमड़ा और मांस निकलता है; वे अधिक खाते हैं; थकते भी नहीं हैं; मुश्किल में पकड़े जाते हैं और पकड़े जाने पर मार भी डालते हैं।
( ३ ) अपने नगर का उपकार करना और पराये नगर का अपकार करना, इन दोनों में से अपने नगर का उपकार करना; अर्थात् धान्य, पशु, हिरण्य और कुप्य आदि पदार्थों का क्रय-विक्रय करना; जनपदवासियों के विपत्तिकाल में उनकी आत्मरक्षा करना—श्रेष्ठ है। किन्तु दूसरे नगर में क्रय-विक्रय का व्यवहार करके उसे लाभ पहुँचाने से विपरीत ही परिणाम होता है। यहाँ तक पीडनवर्ग का निरूपण किया गया।