कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ५८० | कौटिल्य का अर्थशास्त्र | [ आठवां अधिकरण |
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(१) आभ्यन्तरो मुख्यस्तम्भो बाह्यो मित्राटवीस्तम्भः । इति स्तम्भ-वर्गः ।
(२) ताभ्यां पीडनैर्यथोक्तैश्च पीडितः सक्तो मुख्येषु परिहारोपहतः प्रकीर्णो मिथ्यासंहतः सामन्ताटवीहृत इति कोषसङ्गः ।
(३) पीडनानामनुत्पत्तावुत्पन्नानां च वारणे । यतेत देशवृद्धयर्थं नाशे च स्तम्भसंगयोः ॥ १ ॥
इति व्यसनाधिकारिकेऽष्टमेऽधिकरणे पीडनवर्ग-स्तम्भवर्ग-कोषसंगवर्गो नाम चतुर्थोऽध्यायः; आदित एकनविंशतिशततमः ।
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( १ ) स्तंभवर्ग : स्तंभ दो प्रकार का होता है । आभ्यन्तर और बाह्य । अपने ही मुख्य सरकारी कर्मचारियों के द्वारा अर्थ का रोका जाना आभ्यंतर स्तम्भ और भिन्न तथा आटविक पुरुषों द्वारा अर्थ का रोका जाना बाह्य स्तंभ कहलाता है । इस प्रकार स्तंभवर्ग का निरूपण हुआ ।
( २ ) कोषसंग : उक्त दोनों प्रकार के स्तम्भों तथा सरकारी कर्मचारियों के द्वारा उचित आमदनी की मात्रा से घटाया हुआ, छोटे कर्मचारियों से कर वसूली लेकर मुख्य कर्मचारियों द्वारा गवन किया हुआ, राजाज्ञा से माफी के कारण कम हुआ, इधर-उधर बिखरा हुआ, उचित परिमाण से कम-ज्यादा रूप में इकट्ठा किया हुआ और सामन्त तथा आटविक पुरुषों के द्वारा अपहरण किया हुआ धन खजाने में न पहुँच कर बीच ही में नष्ट हो जाता है । उसी का नाम कोषसंग है । इस प्रकार कोषसंग वर्ग का निरूपण किया गया ।
( ३ ) देश की सुख-समृद्धि के लिए राजा को चाहिए कि वह अपने राज्य में पीडनवर्ग को उत्पन्न न होने दे, अथवा उत्पन्न होने पर उनका निवारण करे । स्तम्भवर्ग और कोषसंग को नष्ट करने के लिए भी राजा को सतत यत्नवान् रहना चाहिए ।
इति व्यसनाधिकारिक नामक आठवें अधिकरण में पीडनवर्ग-स्तंभवर्ग-कोषसंगवर्ग नामक चौथा अध्याय समाप्त ।
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