भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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पृष्ठ 676
५९२कौटिल्य का अर्थशास्त्र[ नौवां अधिकरण

(१) नेति कौटिल्यः । परस्परसाधका हि शक्तिदेशकालाः । (२) तैरभ्युच्चितः तृतीयं चतुर्थं वा दण्डस्यांशं मूले पाष्ण्यां प्रत्यन्ताट-वीषु च रक्षां विधाय कार्यसाधनसहं कोशदण्डं चादाय क्षीणपुराणभक्तम-गृहीतनवभक्तमसंस्कृतदुर्गममित्रं, वार्षिकं चास्य सस्यं हैमनं च मुष्टिमुप-हन्तुं मार्गशीर्षी यात्रां यायात् । क्षीणतृणकाष्ठोदकमसंस्कृतदुर्गममित्रं वास-न्तिकं चास्य सस्यं वार्षिकीं वा मुष्टिमुपहन्तुं ज्येष्ठामूलीयां यात्रां यायात् । (३) अत्युष्णमल्पयवसेन्धनोदकं वा देशं हेमन्ते यायात् । (४) तुषारदुर्दिनमगाधनिम्नप्रायं गहनतृणवृक्षं वा देशं ग्रीष्मे यायात् ।


है 'क्योंकि यह समय का ही प्रभाव है कि दिन में कौवा उल्लू को मार लेता है, रात में उल्लू कौए को।'

( १ ) किन्तु आचार्य कौटिल्य इस प्रकार के भेद को नहीं मानता है। उसका कहना है कि 'शक्ति, देश, काल, ये तीनों ही प्रबल और एक-दूसरे के पूरक हैं।'

( २ ) यात्राकाल : विजिगीषु राजा को चाहिए कि वह शक्ति, देश, काल से सम्पन्न होकर आवश्यकतानुसार सेना के तिहाई या चौथाई भाग को अपनी राजधानी, अपने पार्ष्णि और अपने सरहदी इलाकों की रक्षा के लिए नियुक्त कर यथेष्ट कोष तथा सेना को साथ लेकर शत्रु पर विजय करने के लिए अगहन मास में युद्ध के लिए प्रस्थान करे, क्योंकि इस समय शत्रु का पुराना अन्न-संचय समाप्ति पर होता है, नई फसल के अन्न को संग्रह करने का समय वही होता है, और वर्षा के बाद किलों की मरम्मत नहीं हुई रहती है। यही समय है जब कि वर्षा ऋतु से उत्पन्न फसल को और आगे हेमंत ऋतु में पैदा होने वाली फसल दोनों को नष्ट किया जा सकता है। इसी प्रकार हेमंत ऋतु की पैदावार को आगे वसंतऋतु में होने वाली पैदावार को नष्ट करने के लिए उपयुक्त युद्ध प्रमाण-काल चैत्रमास में है। यात्रा का यह दूसरा समय है। इसी प्रकार वसन्त की पैदावार को और आगे की होने वाली वर्षाकाल की फसल को नष्ट करने का उपयुक्त समय ज्येष्ठ मास में है। क्योंकि इस समय घास, फूस, लकड़ी, जल आदि सभी क्षीण हुए रहते हैं और इसलिए शत्रु अपने दुर्ग की मरम्मत नहीं कर पाता है। यात्राकाल का यह तीसरा अवसर है। ये तीनों यात्रा-काल शत्रु को हानि पहुँचाने के लिए अत्यन्त उपयोगी हैं।

( ३ ) जो देश अत्यन्त गरम हो, जहाँ यवस (पशुओं की खाद्य सामग्री), ईंधन तथा जल की कमी हो वहाँ हेमंत ऋतु में युद्ध के लिए प्रस्थान करना चाहिए।

( ४ ) जिस देश में लगातार वरफ पड़ती या वारिस होती हो, जहाँ बड़े-बड़े तालाब एवं घने जंगल हों वहाँ ग्रीष्म ऋतु में युद्ध के लिए जाना चाहिए।