भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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पृष्ठ 677

प्र० १३५-१३६ : अ० १ ] शक्त्यादिज्ञान और यात्राकाल ५९३

(१) स्वसैन्यव्यायामयोग्यं परस्यायोग्यं वर्षति यायात् । (२) मार्गशीर्षं तैषीं चान्तरेण दीर्घकालां यात्रां यायात् । चैत्रं वैशाखं चान्तरेण मध्यमकालां, ज्येष्ठामूलीयमाषाढं चान्तरेण ह्रस्वकालामुपोषि-ष्यन् । व्यसने चतुर्थीम् । व्यसनाभियानं विगृह्ययाने व्याख्यातम् । (३) प्रायशश्चाचार्याः परव्यसने यातव्यमित्युपदिशन्ति । (४) शक्त्युदये यातव्यमनैकान्तिकत्वाद्व्यसनानाम् इति कौटिल्यः । (५) यदा वा प्रयात: कर्शयितुमुच्छेत्तुं वा शक्नुयादमित्रं, तदा यायात् । (६) अत्युष्णोपक्षीणे कालेऽहस्तिबलप्रायो यायात् । हस्तिनो ह्यन्तः-स्वेदाः कुष्ठिनो भवन्ति । अनवगाहमानास्तोयमपिबन्तश्चान्तरवक्षारान्धा-न्धीभवन्ति । तस्मात्प्रभूतोदके देशे, वर्षति च हस्तिबलप्रायो यायात् । विपर्यये खरोष्ट्राश्वबलप्रायः । देशमल्पवर्षपङ्कम् वर्षति मरुप्रायं चतुरङ्ग-बलो यायात् ।


( १ ) जो अपनी सेना के कवायद करने के लिए उपयुक्त और शत्रुसेना के लिए अनुपयुक्त हो ऐसे देश पर वर्षाऋतु में आक्रमण करना चाहिए ।

( २ ) जब किसी दूर देश के आक्रमण में अधिक समय लग जाने की संभावना हो तो वहाँ मार्गशीर्ष और पौष इन दो महीनों में यात्रा करनी चाहिए । मध्यम-कालीन यात्रा चैत्र-वैशाख के बीच करनी चाहिए । जहाँ अल्पकालिक यात्रा हो वहाँ ज्येष्ठ-आषाढ़ में प्रस्थान किया जाना चाहिए । जब कभी शत्रु पर व्यसन आया दिखाई दे तब समय की बिना अपेक्षा किये चढ़ाई कर देनी चाहिए । यह चौथी यात्रा है । व्यसन पीड़ित शत्रु पर आक्रमण करने के सम्बन्ध में विगृह्ययान नामक प्रकरण में निर्देश किया जा चुका है ।

( ३ ) प्राचीन आचार्यों का प्रायः कहना यही है कि 'जब भी शत्रु पर आपत्ति आई जान पड़े तभी आक्रमण कर देना चाहिए ।'

( ४ ) इसके ठीक विपरीत आचार्य कौटिल्य का कहना है कि विजिगीषु जब भी अधिक शक्तिसम्पन्नावस्था में हो तभी आक्रमण करना चाहिए ।

( ५ ) अथवा जिस समय भी शत्रु को निर्बल किया जा सके या शत्रु को विनष्ट किया जा सके तभी चढ़ाई कर देनी चाहिए ।

( ६ ) अत्यन्त गर्मी के मौसम में हाथियों को छोड़कर ऊँट आदि की सेना लेकर आक्रमण करना चाहिए । क्योंकि पानी के अभाव में अत्यधिक उष्ण प्रदेशों में हाथी कोढ़ी हो जाया करते हैं, स्नान के अभाव से और पीने के लिए पर्याप्त पानी न मिलने के कारण अन्दर का दाह बढ़ जाने से हाथी अंधे हो जाते हैं । इसलिए जिस देश में पर्याप्त जल हो और वर्षा होती हो वहीं हाथियों की सेना लेकर आक्रमण करना चाहिए ।

३८ कौ०

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