कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ५९४ | कौटिल्य का अर्थशास्त्र | [ नौवां अधिकरण |
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(१) समविषमनिम्नस्थलह्रस्वदीर्घवशेन वाऽध्वनो यात्रां विभजेत् । (२) सर्वा वा ह्रस्वकालाः स्युर्यातव्याः कार्यलाघवात् । दीर्घाः कार्यगुरुत्वाद्वा वर्षावासः परत्र च ॥
इति अभियास्यत्कर्मणि नवमाऽधिकरणे शक्तिदेशकालवलाबलज्ञानं यात्राकालाः नाम प्रथमोऽध्यायः; आदित एकविंशत्युत्तरशततमः ।
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जहाँ जल का स्थायी प्रबन्ध न हो और वर्षा भी न होती हो ऐसे देशों में गधा, ऊँट तथा घोड़ों की सेना लेकर आक्रमण करना चाहिए । जिस देश में वर्षा होने पर भी कीचड़ कम होता हो, ऐसे रेगिस्तानी देशों में हाथी, घोड़े, रथ और पैदल चतुरंग सेना को लेकर भी आक्रमण किया जा सकता है ।
( १ ) अथवा समतल, ऊबड़-खावड़, जलमय, स्थलमय, अल्पकालीन और दीर्घकालीन आदि परिस्थितियों को देखकर यात्राकाल को विभक्त किया जा सकता है ।
( २ ) थोड़े कार्यों की सिद्धि के लिए समय की भी कम आवश्यकता होती है । इसी प्रकार बड़े कार्यों को सम्पन्न करने के लिए यात्रा भी दीर्घकालीन होती है । कभी-कभी वर्षा ऋतु में भी कार्याधिक्य के कारण दूसरे देश में रहना पड़ता है । इसलिए कार्यों के छोटे-बड़े होने के हिसाब से यात्राएँ भी छोटी-बड़ी समझनी चाहिए ।
अभियास्यत्कर्म नामक नवम अधिकरण में शक्त्यादिज्ञान और यात्राकाल नामक पहला अध्याय समाप्त ।
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