कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
पृष्ठ 679, कुल 918 में से
संदर्भ में पढ़ें| प्रकरण १३७-१३९<br>अध्याय २ | बलोपादानकालाः सन्नाहगुणाः<br>प्रतिबलकर्म च |
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(१) मौलभृतकश्रेणीमित्रामित्राटवीबलानां समुद्दानकालाः । (२) मूलरक्षणादतिरिक्तं मौलबलम्, अत्यावापयुक्ता वा मौला मूले विकुर्वीरन्निति, बहुलानुरक्तमौलबलः सारबलो वा प्रतियोद्धा व्यायामेन योद्धव्यमिति, प्रकृष्टेऽध्वनि काले वा क्षयव्ययसहत्वान्मौलानामिति, बहुलानुरक्तसम्पाते च यातव्यस्योपजापभयादन्यसैन्यानां भृतादीनामविश्वासे, बलक्षये वा सर्वसैन्यानामिति मौलबलकालः ।
सैन्य-संग्रह का समय; सैन्य-संगठन; और शत्रुसेना से मुकाबला
( १ ) इस अध्याय में—मौलवल (राजधानी की रक्षा करने वाली सेना), भृतक वल ( सवैतनिक सेना ), श्रेणीवल (विभिन्न कार्यों में नियुक्त शस्त्रास्त्र में निपुण सेना), मित्रबल ( मित्र राजा की सेना ) अमित्रबल ( शत्रु राजा की सेना ) और अटवीबल ( आटविक सेना ), इन विभिन्न सेनाओं को किस-किस अवसर पर युद्ध के लिए तैयार करना चाहिए—इसका निरूपण किया जायेगा ।
( २ ) मौलबल : मूलस्थान अर्थात् राजधानी की रक्षा के लिए जितनी सेना की अपेक्षा हो, उसके अतिरिक्त सेना को युद्ध में ले जाना चाहिए, अथवा मौलबल के बगावत कर देने की संभावना हो तो उसको युद्ध आदि कार्यों में साथ ले जाना चाहिए, या मुकाबले में आगे हुए शत्रु पर मौलबल के अनुराग की संभावना जान पड़े तो उसको साथ ले जाना चाहिए; अथवा शत्रु किसी शक्तिशाली सैन्य को लेकर युद्ध करने के लिए आया है, तब भी मौलबल को साथ ले जाना चाहिए, अथवा दूर देश, दीर्घकालीनं युद्ध, क्षय-व्यय की अवस्था में भी मौलबल को साथ रखना चाहिए, अथवा स्वामिभक्त शत्रु के दूत मेरी सेना में भेद डालने का यत्न करेंगे तथा दूसरी सेनाओं पर पूरा विश्वास न होने की स्थिति में भी मौलबल को लेकर युद्ध में जाना चाहिए, क्योंकि मौलबल अत्यन्त स्वामिभक्त होने के कारण फोड़ा नहीं जा सकता है, अथवा अन्य सेनाओं के प्रधान पुरुषों का नाश हो जाने पर यदि विजिगीषु के सेना के खेत छोड़कर भाग जाने का भय हो तो मौलबल को युद्धक्षेत्र में साथ ले जाना चाहिए ।