कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ५९६ | कौटिल्य का अर्थशास्त्र | [ नौवां अधिकरण |
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(१) प्रभूतं मे भृतबलमल्पं च मौलबलमिति, परस्याल्पं विरक्तं वा मौलबलं फल्गुप्रायमसारं वा भृतसैन्यमिति, मन्त्रेण योद्धव्यमल्पव्यायामे-नेति, ह्रस्वो देशः कालो वा तनुक्षयव्ययः इति, अल्पसम्पातं शान्तोपजापं विश्वस्तं वा मे सैन्यमिति, परस्याल्पः प्रसारो हन्तव्यः इति, भृतबलकालः। (२) प्रभूतं मे श्रेणीबलं शक्यं मूले यात्रायां चाधातुमिति, ह्रस्वप्रवासः, श्रेणीबलप्रायः प्रतियोद्धा, मन्त्रव्यायामाभ्यां प्रतियोद्धुकामो दण्डबलव्यव-हारः, इति श्रेणीबलकालः । (३) प्रभूतं मे मित्रबलं शक्यं मूले यात्रायां चाधातुम्, अल्पः प्रवासो मन्त्रयुद्धाच्च भूयो व्यायामयुद्धम् इति, मित्रबलेन वा पूर्वमटवीं नगरी-स्थानमासारं वा योधयित्वा पश्चात्स्वबलेन योधयिष्यामि, मित्रसाधारणं
( १ ) भृतकबल : यदि विजिगीषु राजा यह समझे कि मौलबल की अपेक्षा मेरा भृतकबल अधिक है, अथवा शत्रु का मौलबल थोड़ा तथा अविश्वासी है, अथवा शत्रु का भृतकबल कमजोर या न होने के बराबर है, अथवा इस समय शत्रु के साथ तूष्णी युद्ध करना पड़ेगा, अथवा थोड़े ही श्रम से कार्य संपन्न हो जायगा, अथवा युद्ध का गंतव्य देश दूर नहीं है, समय भी थोड़ा ही लगेगा और अधिक क्षय-व्यय की भी संभावना नहीं है, अथवा शत्रु के गुप्तचर मेरी सेना में बहुत कम प्रवेश कर सकेंगे और वे भी भेद न डाल सकेंगे, यदि उन्होंने भेद डाल भी दिया तो अपनी विश्वस्त सेना को मैं अपने काबू में कर सकूँगा अथवा शत्रु के थोड़े ही कार्यों की क्षति करनी है'—तो ऐसी स्थितियों में एवं अवसरों पर भृतकबल को साथ लेकर उसको युद्ध में जाना चाहिए ।
( २ ) श्रेणीबल : यदि विजिगीषु को यह विश्वास हो कि 'मेरे पास श्रेणीबल इतना पोख्ता है कि उसको राजधानी की रक्षा में भी लगाया जा सकता है और शत्रु के साथ युद्ध करने के समय भी उनको साथ लिया जा सकता है, अथवा सफर कम है, मुकाबले की सेना भी प्रायः श्रेणीबल के साथ युद्ध करने लायक है, अथवा शत्रु तूष्णी-युद्ध ( मन्त्र ) अथवा प्रकाशयुद्ध ( व्यायाम ) से मुकाबला करना चाहता है, अथवा दण्ड से डरा हुआ होने के कारण शत्रु अपनी सेना को किसी राजा के अधीन करने की सोच रहा है'—ऐसी स्थितियों एवं ऐसे अवसरों पर श्रेणीबल को साथ लेकर युद्ध करना चाहिए ।
( ३ ) मित्रबल : यदि विजिगीषु राजा यह समझे कि 'उसका मित्रबल इतना पोख्ता है कि वह राजधानी की रक्षा करने में और शत्रु पर चढ़ाई करने में भी समर्थ है, अथवा सफर भी कम है, तूष्णी युद्ध की अपेक्षा वहाँ प्रकाश युद्ध ही अधिक होगा, जिससे क्षय-व्यय की कम संभावना है, अथवा शत्रुसेना या शत्रु के देश में सभी आट-