भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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प्र० १३७-१३९ : अ० २ ] सेना सम्बन्धी कार्य ५९७

वा मे कार्यं, मित्रायत्ता वा मे कार्यसिद्धिः, आसन्नमनुग्राह्यं वा मे मित्रम्, अत्यावापं वास्य साधयिष्यामि इति मित्रबलकालः। (१) प्रभूतं मे शत्रुबलं शत्रुबलेन योधयिष्यामि नगरस्थानम्, अटवीं वा। तत्र मे श्ववराहयोः कलहे चण्डालस्येवान्यतरसिद्धिर्भविष्यति; आसाराणामटवीनां वा कण्टकमर्दनमेतत्करिष्यामि; अत्युपचितं वा कोपभयान्नित्यमासन्नमरिबले वासयेदन्यत्राभ्यन्तरकोपशङ्कायाः, शत्रुयुद्धावरयुद्धकालश्च । इत्यमित्रबलकालः । (२) तेनाटवीबलकालो व्याख्यातः। (३) मार्गदेशिकं परभूमियोग्यमरियुद्धप्रतिलोममटवीबलप्रायः शत्रुर्वाद्विल्वं बिल्वेन हन्यताम् अल्पः प्रसारो हन्तव्यः इत्यटवीबलकालः ।


विक सेना या मित्रसेना को पहिले अपनी मित्र-सेना से भिड़ा कर फिर अपनी सेना से लड़ाऊँगा, अथवा इस युद्धादि कार्य में मित्र का तथा अपना समान प्रयोजन है, इस कार्य की सिद्धि मित्र के हाथ में है, अथवा अपने समीपस्थ अन्तरंग मित्र का अवश्य ही उपकार करना है, अथवा अपने मित्र से द्रोह रखने वाली सेना ( दूष्य सेना ) को शत्रु सेना के साथ भिड़ा कर मरवा डालूँगा'—ऐसे अवसरों या ऐसी स्थितियों में मित्र सेना को युद्ध में साथ ले जाना चाहिए।

( १ ) अमित्रबल : यदि विजिगीषु यह समझे कि उसकी शत्रु सेना अत्यधिक है, जो कि उसके नगर में ही ठहरी हुई है और जिसको वह अपने दूसरे शत्रु के साथ भिड़ा सकता है, अथवा उसको आटविक सेना के साथ भिड़ा सकता है, इस प्रकार दोनों शत्रु सेनाओं के लड़ जाने पर उसका अभीष्ट सिद्ध हो जायेगा वैसे ही जैसे कि कुत्ते और सुअर की लड़ाई में किसी भी एक के मर जाने पर चाण्डाल का लाभ होता है, अथवा अपने मित्र तथा आटविक की सेना के कंटकों का इस रीति से उन्मूलन हो सकेगा; अथवा बहुत बढ़ी हुई शत्रु सेना को विजिगीषु कुपित हो जाने के भय से सदा ही अपने पास रखे, किन्तु उसको पास रखने में यदि अमात्य, पुरोहित आदि के कुपित हो जाने का भय हो तो उसे अपने पास न रखे, अथवा यदि विजिगीषु का शत्रु अपने किसी दूसरे शत्रु के साथ युद्ध कर रहा हो तो उस युद्ध के समाप्त हो जाने पर दूसरे युद्ध के अवसर पर शत्रुसेना को ही दूसरे शत्रु के मुकाबले में भिड़ा दे'— ऐसी स्थितियों एवं ऐसे अवसरों पर शत्रुसेना को ही युद्ध में भेजना चाहिए।

( २ ) अटवीबल : उक्त विवेचन के अनुसार ही आटविक सेना को युद्ध में भेजने के सम्बन्ध में भी समझ लेना चाहिए।

( ३ ) यदि विजिगीषु यह समझे कि गंतव्य स्थान को बताने के लिए प्रथ-प्रदर्शक की आवश्यकता होगी, अथवा आटविक सेना शत्रु की युद्धभूमि में लड़ने योग्य आयुधों