भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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५९४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ नौवां अधिकरण

(१) सैन्यमनेकमनेकजातीयस्थमुक्तमनुक्तं वा विलोपार्थं यदुत्तिष्ठति, तदौत्साहिकम् । भक्तवेतनविलोपविष्टप्रतापकरं भेद्यं परेषाम्, अभेद्यं तुल्यदेशजातिशिल्पप्रायं संहतं महत् । इति बलोपादानकालाः । (२) तेषां कुप्यभृतममित्र्राटवीबलं विलोपभृतं वा कुर्यात् । (३) अमित्रस्य वा बलकाले प्रत्युत्पन्ने शत्रुमवगृह्णीयात् । अन्यत्र वा प्रेषयेत् । अफलं वा कुर्यात् । विक्षिप्तं वा वासयेत् । काले वातिक्रान्ते विसृजेत् । परस्य चैतद्बलसमुत्थानं विघातयेद्, आत्मनः सम्पादयेत् ।


की शिक्षा में निपुण है, अथवा विजिगीषु की बिना आज्ञा से ही आटविक सेना शत्रुसेना के साथ युद्ध में प्रवृत्त हो सकेगी, जैसे एक विल्वफल दूसरे विल्वफल के साथ टकरा कर फोड़ा जाता है वैसे ही शत्रु-सेना से आटविक सेना ही मुठभेड़ करने में समर्थ है, अथवा शत्रु भी आटविक सेना को लेकर ही युद्धभूमि में उतर रहा है, अथवा शत्रु के अल्प अनिष्ट के लिए आटविक सेना ही उपयुक्त होगी'—ऐसी स्थितियों एवं ऐसे अवसरों पर आटविक सेना को लेकर युद्ध में जाना चाहिए।

(१) औत्साहिकबल : उक्त छह सेनाओं के अतिरिक्त औत्साहिक नामक सातवीं सेना भी होती है। नेतृत्वहीन, भिन्न-भिन्न देशों में रहने वाली, राजा की स्वीकृति या अस्वीकृति से ही दूसरे देशों पर लूटमार करने वाली सेना को ही औत्साहिक बल कहते हैं। उसके दो भेद हैं, भेद्य और अभेद्य। दैनिक भत्ता या मासिक वेतन लेकर शत्रु के देश में लूटपाट करने वाली; दुर्गों में काम करने वाली, और राजा की सामयिक आज्ञाओं का पालन करने वाली औत्साहिक सेना भेद्य कहलाती है। भेद्य अर्थात् अधिक भत्ता देकर भेद (फोड़ने) किये जाने योग्य। किन्तु जो औत्साहिक सेना प्रायः एक ही देश की; एक ही जाति की और एक ही व्यवसाय की होती है वह अभेद्य कहलाती है। उसको वेतन आदि का प्रलोभन देकर फोड़ा नहीं जा सकता है। उसे अपने देश का अधिक ध्यान रहता है। वह बड़ी संगठित होती है। इसलिए इस सेना को उपयुक्त समय के लिए संग्रह करके रखना चाहिए।

(२) उक्त सात प्रकार की सेनाओं में से शत्रु सेना तथा आटविक सेना को नियमित मासिक वेतन न देकर उसके ओढ़ने, बिछाने तथा पहनने के लिए शत्रु देश से जीता हुआ या लूटा हुआ माल ही वेतन के रूप में देना चाहिए।

(३) सेना के सम्बन्ध में जो स्थितियाँ और जैसे अवसर विजिगीषु के लिए ऊपर बताये गए हैं; यदि वही स्थितियाँ और वैसे ही अवसर शत्रु के लिए भी अपेक्ष्य हों तो उस समय विजिगीषु को चाहिए कि जो शत्रुसेना उसके पास सहायता के लिए आयी है उसको वह अपने अधीन रखे या किसी कार्य का बहाना बना कर उसको वह अन्यत्र भेज दे। यदि ऐसे अवसरों पर शत्रु की सेना को छोड़ना ही