कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्र० १३७-१३९ : अ० २ ] सेना सम्बन्धी कार्य ५९९
(१) पूर्वं पूर्वं चैषां श्रेयः सन्नाहयितुम् । (२) तद्भावभावित्वान्नित्यसत्कारानुगमाच्च मौलबलं भृतबलाच्छ्रेयः। (३) नित्यानन्तरं क्षिप्रोतथायि वश्यं च भृतबलं श्रेणीबलाच्छ्रेयः । (४) जानपदमेकार्थोपगतं तुल्यसंघर्षामर्षसिद्धिलाभं च श्रेणीबलं मित्रबलाच्छ्रेयः । (५) अपरिमितदेशकालमेकार्थोपगमाच्च मित्रबलममित्रबलाच्छ्रेयः । (६) आर्याधिष्ठितममित्रबलमटवीबलाच्छ्रेयः । तदुभयं विलोपार्थम् । अविलोपे व्यसने च ताभ्यामहिभयं स्यात् ।
पड़ जाय तो, कार्य करने के बदले में उसको जो सहायता देने की पहिले प्रतिज्ञा की गई थी उसको न देकर ही छोड़ दे; अथवा उसको छोटे-छोटे फिरकों में बाँट कर अलग-अलग छावनियों में रख दे; अथवा जब शत्रु की सहायता का समय बीत जाये तब उस सेना को छोड़ दे; अथवा जब-जब शत्रु अपने सेना-संग्रह का आयोजन करे तभी-तभी विजिगीषु उसके मार्ग में बाधायें खड़ी कर दे और शत्रु द्वारा खड़ी की गयी बाधाओं का प्रतीकार करते हुए वह अपनी सेना का संगठन करता रहे ।
(१) उक्त सात प्रकार की सेना में उत्तर-उत्तर की अपेक्षा पूर्व-पूर्व की सेना का संग्रह करना अधिक लाभप्रद है ।
(२) सदैव अपने स्वामी के साथ बने रहने के कारण तथा सदा ही सेना के सम्बन्ध में स्वामी की सत्कार बुद्धि होने के कारण और सदा ही स्वामी के सम्बन्ध में सेना का अनुराग होने के कारण भृतकबल की अपेक्षा मौलबल श्रेष्ठ होता है ।
(३) इसी प्रकार श्रेणीबल की अपेक्षा भृतकबल अधिक श्रेष्ठ होता है; क्योंकि वह सदैव राजा के समीप रहता है, अविलम्ब ही युद्ध के लिए तैयार हो सकता है और राजा के अधीन रहता है; किन्तु श्रेणीबल में ये बातें नहीं होती हैं ।
(४) मित्रबल की अपेक्षा श्रेणीबल अधिक उत्तम होता है; क्योंकि वह अपने राजा के देश का होता है; एक ही प्रयोजन के लिए उसका संग्रह किया जाता है; मालिक का जिसके साथ संघर्ष तथा क्रोध होता है श्रेणीबल की भी उसके साथ संघर्ष तथा वैर होता है; वह अपने मालिक की अभीष्ट सिद्धि में ही अपनी अभीष्टसिद्धि समझता है । परन्तु मित्रबल में ये बातें नहीं होती हैं ।
(५) अमित्रबल की अपेक्षा मित्रबल अधिक श्रेयस्कर होता है; क्योंकि मित्रबल हर समय हर स्थिति में सहायक होता है; विजिगीषु के प्रयोजन के अनुसार ही मित्रबल का भी प्रयोजन होता है । इसके विपरीत अमित्रबल में ये बातें नहीं होती हैं ।
(६) अटवीबल की अपेक्षा अमित्रबल अधिक श्रेष्ठ होता है; क्योंकि वह