कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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(१) ब्राह्मणक्षत्रियवैश्यशूद्रसैन्यानां तेजःप्राधान्यात्पूर्वं पूर्वं श्रेयः सन्नाह-यितुमित्याचार्याः ।
(२) नेति कौटिल्यः । प्रणिपातेन ब्राह्मणबलं परोऽभिहारयेत् । प्रहरण-विद्याविनीतं तु क्षत्रियबलं श्रेयः, बहुलसारं वा वैश्यशूद्रबलमिति ।
(३) तस्माद् 'एवंबलः परः, तस्यैतत्प्रतिबलम्' इति बलसमुद्दानं कुर्यात् ।
(४) हस्तियन्त्रशकटगर्भकुन्तप्रासहाटकवेणुशल्यवद्धस्तिबलस्य प्रति-बलम् ।
(५) तदेव पाषाणलगुडावरणाङ्कुशकचग्रहणीप्रायं रथबलस्य प्रतिबलम्।
आर्यगुणों से संपन्न एवं विश्वस्त पुरुषों के नेतृत्व में रहता है; किन्तु अटवीबल के सम्बन्ध में ऐसा नहीं है । ये दोनों सेनायें शत्रुदेश को लूटने के लिए बड़ी उपयुक्त हैं । क्योंकि यदि उन्हें युद्ध में लगाया जाय या विपत्ति में सहायतार्थ नियुक्त किया जाय, तो आस्तीन के साँप की तरह सदा ही उनसे भय बना रहता है ।
( १ ) प्राचीन आचार्यों का मत है कि तेज की अतिशयता होने के कारण ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र, इन चारों वर्णों की सेनाओं में उत्तर-उत्तर की अपेक्षा पूर्व-पूर्व की सेना अधिक श्रेष्ठ है ।
( २ ) इसके विपरीत आचार्य कौटिल्य का मत है कि 'शत्रुपक्ष ब्राह्मणसेना के समक्ष नमस्कार कर या शिर झुका कर उसको अपने वश में कर लेता है । इसलिए युद्धविद्या में निपुण क्षत्रिय सेना को ही सर्वाधिक श्रेष्ठ समझना चाहिए, अथवा वैश्य सेना तथा शूद्रसेना को भी श्रेष्ठ समझना चाहिए, यदि उनमें वीर पुरुषों की अधिकता हो ।
( ३ ) सेनाओं के संबन्ध में पूर्वोक्त पारस्परिक श्रेष्ठता को समझने के बाद शत्रु-सेना के संबन्ध में भी विचार कर लेना चाहिए और अमुक शत्रुसेना के साथ अमुक सेना उपयुक्त होगी, इन सभी बातों का विचार कर उपयुक्त सेनाओं का संग्रह करना चाहिए ।
( ४ ) हस्तिसेना के मुकाबले के लिए हाथी, जामदग्न्य यन्त्र, शकटगर्भ ( शकट के समान मध्यभाग वाला अस्त्र ), भाला ( कुन्त ), बरछा ( प्रास ), त्रिशूल ( हाटक ), लाठी ( वेणु ), बल्लभ ( शल्य ) आदि साधनों से युक्त सेना की आवश्यकता होती है ।
( ५ ) उक्त हस्तिसेना यदि पाषाण, गदा ( लगुड ), कवच ( आवरण ), अंकुश और कचग्राही ( लंबी लोहे की छड़, जिसके अग्रभाग में बाल पकड़ने का हुक लगा रहता है ) आदि साधनों से युक्त हो तो वह रथ-सवार सेना का मुकाबला (प्रतिबल) करनेवाली समझना चाहिए ।