कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्र० १३७-१३९ : अ० २ ] शक्ति के अनुसार व्यवहार ६०१
(१) तदेवाश्वानां प्रतिबलम् । (२) वर्मिणो वा हस्तिनोऽश्वा वा वर्मिणः कवचिनो रथा आवरणिनः पत्तयश्चतुरङ्गबलस्य प्रतिबलम् । (३) एवं बलसमुद्दानं परसैन्यनिवारणम् । विभवेन स्वसैन्यानां कुर्यादङ्गविकल्पशः ।।
इति अभियास्यत्कर्मणि नवमेऽधिकरणे बलोपादानकालाः सन्नाहगुणाः प्रतिबलकर्म नाम द्वितीयोऽध्याय; आदितो द्वाविंशत्युत्तरशततमः ।
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( १ ) इसी सेना को सड़सवार ( अश्वबल ) सेना का भी प्रतिबल समझना चाहिए ।
( २ ) कवचधारी हाथी या कवचधारी घोड़े, मजबूत लोहे की पत्तों से मढ़े हुए रथ और कवचधारी पैदल सेना, इन चारों को क्रमशः, हस्तिबल, अश्वारोही, रथारोही और पदाति, इस चतुरंग सेना का प्रतिबल समझना चाहिए ।
( ३ ) इस प्रकार पूर्वोक्त रीति से सेनाओं की पारस्परिक श्रेष्ठता, गुरुता, लघुता का विचार करके ही उपयुक्त सेनाओं का संग्रह करना चाहिए । इसी प्रकार मौलभृत आदि अपनी सेनाओं की शक्ति के अनुसार एवं सेनाओं के अंगभूत साधन हाथी, घोड़े, शस्त्र आदि की अधिकता-अल्पता को दृष्टि में रख कर अलग-अलग विभागों के अनुसार ही सेना का संग्रह तथा शत्रु का प्रतिकार करना चाहिए ।
अभियास्यत्कर्म नामक नवम अधिकरण में बलप्रतिबलकर्म नामक दूसरा अध्याय समाप्त ।
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