भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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प्रकरण १४०-१४१# पश्चात्कोपचिन्ता, बाह्यान्तर-प्रकृतिकोपप्रतीकारश्च #
अध्याय ३

(१) अल्पः पश्चात्कोपो महान् पुरस्ताल्लाभ इति । अल्पः पश्चात्कोपो गरीयान् । अल्पं पश्चात्कोपं प्रयातस्य दूष्यामित्राटविका हि सर्वतः समेधयन्ति, प्रकृतिकोपो वा । लब्धमपि च महान्तं पुरस्ताल्लाभमेवंभूते भृत्यमित्रक्षयव्यया ग्रसन्ते । तस्मात्साहस्रैकीयः पुरस्ताल्लाभस्यायोगः शतैकीयो वा पश्चात्कोप इति न यायात् । सूचीमुखा ह्यनर्था इति लोकप्रवादः । (२) पश्चात्कोपे सामदानभेददण्डान्प्रयुञ्जीत । पुरस्ताल्लाभे सेनापतिं कुमारं वा दण्डचारिणं कुर्वीत ।


पाश्चात्कोपचिन्ता और बाह्याभ्यन्तर प्रकृति के कोप का प्रतीकार

( १ ) यदि थोड़ा पश्चात्कोप और अधिक भावी लाभ हो तो दोनों में से थोड़ा पश्चात्कोप ही गुरुतर है, क्योंकि विजिगीषु के युद्ध में चले जाने के कारण थोड़े पश्चात्कोप को भी राजद्रोही और आटविक बहुत बढ़ा देते हैं, अथवा विजिगीषु की अनुपस्थिति में उसका कुपित प्रकृतिवर्ग थोड़े भी पश्चात्कोप को अधिक बढ़ा देता है । यदि पश्चात्कोप की लापरवाही करके आक्रमण से होने वाले बड़े लाभ को प्राप्त कर लिया जाय तो उस बढ़े हुए पश्चात्कोप के प्रतीकार के लिए जो भृत्य तथा मित्रसंबंधी क्षय-व्यय करना पड़ता है, उसमें वह महान लाभ सब बराबर हो जाता है । इसलिए जब भावी लाभ की सफलता प्रति सहस्र एक अंश मात्र होनेवाली हो तो उसकी अपेक्षा पश्चात्कोप से होने वाला अनर्थ प्रतिशत एक अंश समझना चाहिए, अर्थात् पश्चात्कोपजन्य अनर्थ की अपेक्षा भावी लाभ में दसगुनी असारता होती है । लोकप्रसिद्धि है कि अनर्थ सदा सूचीमुख हुआ करते हैं, अर्थात् पहिले तो उनका रूप सुई के मुँह जितना सूक्ष्म होता है, किन्तु बाद में वे भयावह रूप धारण कर लेते हैं ।

( २ ) यदि पश्चात्कोप की अधिक संभावना हो तो साम, दाम, दण्ड, भेद आदि उपायों से किसी भी प्रकार उसका प्रतीकार करना चाहिए । यदि भावी लाभ को भी न छोड़ना हो तो सेनापति या युवराज के संरक्षण में सेना को विजययात्रा के लिए भेजना चाहिए ।