भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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प्र० १४०-१४१ : अ० ३ ] पश्चात्कोप और प्रकृति कोप ६०३

(१) बलवान् वा राजा पश्चात्कोपावग्रहसमर्थः पुरस्ताल्लाभमादातुं यायात् । अभ्यन्तरकोपशङ्कायां शङ्कितानादाय यायात् ।

(२) बाह्यकोपशङ्कायां वा पुत्रदारमेषामभ्यन्तरावग्रहं कृत्वा शून्यपालमनेकबलवर्गमनेकमुख्यं च स्थापयित्वा यायात् । न वा यायात् । 'अभ्यन्तरकोपो बाह्यकोपात्पापीयान्' इत्युक्तं पुरस्तात् ।

(३) मन्त्रिपुरोहितसेनापतियुवराजानामन्यतमकोपोऽभ्यन्तरकोपः । तमात्मदोषत्यागेन परशक्त्यपराधवशेन वा साधयेत् ।

(४) महापराधेऽपि पुरोहिते संरोधनमवस्रावणं वा सिद्धिः, युवराजे संरोधनं निग्रहो वा गुणवत्यन्यस्मिन्सति पुत्रे ।


( १ ) अथवा जो शक्तिसंपन्न राजा पश्चात्कोप का प्रतीकार करने में समर्थ हो और उसका यह विश्वास हो कि वह पश्चात्कोप को पूरी तरह शांत कर सकेगा, तो थोड़ी-सी सेना पीछे छोड़कर विजिगीषु स्वयं भी यात्रा में जा सकता है । यदि ऐसी स्थिति में भीतरी कोप की आशंका हो तो उन आशंकित व्यक्तियों को साथ लेकर विजिगीषु को युद्ध में जाना चाहिए ।

( २ ) अथवा यदि बाह्यकोप की आशंका हो तो विजिगीषु के लिए उचित है वह उन बाह्यकोपकारी अंतपाल आदि के पुत्र तथा स्त्रियों को अपने अमात्यों के अधीन करके युद्ध में जाय । यदि बाह्य और आभ्यन्तर दोनों की ओर से उपद्रव की आशंका हो तो पीछे बताई गई मौलभृत आदि सात प्रकार की सेनाओं तथा अनेक मुख्य सेनापतियों से युक्त शून्यपाल को राजधानी की रक्षा के लिए नियुक्त करके विजययात्रा करनी चाहिए । इतने इन्तजाम में भी यदि आभ्यन्तर विद्रोह की आशंका बनी रहे तो विजिगीषु कदापि न जाय क्योंकि आभ्यन्तर कोप, बाह्यकोप की अपेक्षा अत्यन्त हानिकर होता है, इस बात को पहिले ही कहा जा चुका है ।

( ३ ) मन्त्री, पुरोहित, सेनापति और युवराज इन चारों में से किसी एक के द्वारा किए जाने वाले उपद्रव को आभ्यन्तरकोप कहते हैं । यह आभ्यन्तरकोप यदि विजिगीषु के किसी दोष के कारण पैदा हुआ हो तो उस दोष का परित्याग कर आभ्यन्तर कोप को शान्त करना चाहिए । यदि वह मन्त्री, पुरोहित आदि के कारण उत्पन्न हुआ हो तो उनको अपराध के अनुसार प्राणदण्ड, बन्धन तथा अर्थदण्ड आदि के द्वारा सीधा करना चाहिए ।

( ४ ) यदि पुरोहित से ऐसा कोई महान् अपराध हो जाय तो भी उसका वध नहीं करना चाहिए, क्योंकि ब्राह्मण का वध निषिद्ध है । इसलिए उसको या तो कैद में डाल दिया जाय अथवा देश-निर्वासन का दण्ड दिया जाय । यदि युवराज इस तरह