भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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पृष्ठ 688

६०४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ नौवां अधिकरण

(१) ताभ्यां मन्त्रिसेनापती व्याख्यातौ ।

(२) पुत्रं भ्रातरमन्यं वा कुल्यं राज्यग्राहिणमुत्साहेन साधयेत् । उत्साहाभावे गृहीतानुवर्तनसन्धिकर्मभ्यामरिन्सन्धानभयात् । अन्येभ्यस्तद्द्विधेभ्यो वा भूमिदानैर्विश्वासयेदेनम् । तद्विशिष्टं स्वयंग्राहं दण्डं वा प्रेषयेत्, सामन्ताटविकान् वा । तैर्विगृहीतमतिसन्दध्यात् । अवरुद्धादानं पारग्रामिकं वा योगमातिष्ठेत् ।

(३) एतेन मन्त्रिसेनापती व्याख्यातौ ।

(४) मन्त्र्यादिवर्जनामन्तरमात्यानामन्यतमकोपोऽन्तरमात्यकोपः । तत्रापि यथार्हमुपायान् प्रयुञ्जीत ।


का महान् अपराध कर डाले तो उसे या तो आजन्म कैद में डाल दिया जाय या प्राणदण्ड दिया जाय, किन्तु यह प्राणदण्ड उसी दशा में दिया जाय जब कि दूसरा कोई गुणवान् पुत्र विद्यमान हो ।

( १ ) पुरोहित और युवराज के समान ही मन्त्री और सेनापति का भी उनके अपराध के अनुसार वध या बन्धन का दण्ड समझना चाहिए ।

( २ ) विजिगीषु को चाहिए कि वह अपने पुत्र, भाई या किसी खानदानी व्यक्ति को, जो राज्य लेने की इच्छा करे, उसको उसके योग्य उच्च अधिकारपदों पर नियुक्त कर के अपने वश में करे । क्योंकि यदि उन्हें वश में न किया गया तो यह आशंका नित्य ही बनी रहती है कि कहीं वे शत्रु राजा के साथ जाकर न मिल जाँय । अथवा इसी तरह के दूसरे खानदानी व्यक्तियों को जमीन आदि देकर अपने अधीन कर लेना चाहिए । अथवा ऐसे व्यक्तियों को स्वयं ग्राह सेना का सेनापति बनाकर कहीं बाहर युद्ध के लिए भेज देना चाहिए । अथवा उन्हें सामंत तथा आटविकों की सेना का अध्यक्ष नियुक्त कर के बाहर भेज देना चाहिए और फिर उस स्वयं ग्राह सेना तथा उन सामंत आटविकों के साथ झगड़ा कराके उसको कैद में डाल देना चाहिए । स्वयं ग्राह सेना द्वारा गिरफ्तार उस व्यक्ति को राजा स्वयं ले ले अथवा दुर्गलम्भोपाय प्रकरण में निर्दिष्ट उपायों द्वारा उसे वश में करे ।

( ३ ) इसी प्रकार मन्त्री और सेनापति के द्वारा पैदा किये गये उपद्रव तथा उसके प्रतीकार का भी व्याख्यान समझ लेना चाहिए ।

( ४ ) मन्त्री, पुरोहित, युवराज और सेनापति के अतिरिक्त अन्य अन्तरमात्य अर्थात् द्वारपाल या रनिवास के कर्मचारी आदि में से किसी एक द्वारा उठाये गये कोप को अन्तरमात्यकोप कहते हैं । ऐसे कोप को शान्त करने के लिए उपर्युक्त उपायों को ही काम में लाना चाहिए ।