कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
| ५९४ | कौटिल्य का अर्थशास्त्र | [ नौवां अधिकरण |
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(१) समविषमनिम्नस्थलह्रस्वदीर्घवशेन वाऽध्वनो यात्रां विभजेत् । (२) सर्वा वा ह्रस्वकालाः स्युर्यातव्याः कार्यलाघवात् । दीर्घाः कार्यगुरुत्वाद्वा वर्षावासः परत्र च ॥
इति अभियास्यत्कर्मणि नवमाऽधिकरणे शक्तिदेशकालवलाबलज्ञानं यात्राकालाः नाम प्रथमोऽध्यायः; आदित एकविंशत्युत्तरशततमः ।
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जहाँ जल का स्थायी प्रबन्ध न हो और वर्षा भी न होती हो ऐसे देशों में गधा, ऊँट तथा घोड़ों की सेना लेकर आक्रमण करना चाहिए । जिस देश में वर्षा होने पर भी कीचड़ कम होता हो, ऐसे रेगिस्तानी देशों में हाथी, घोड़े, रथ और पैदल चतुरंग सेना को लेकर भी आक्रमण किया जा सकता है ।
( १ ) अथवा समतल, ऊबड़-खावड़, जलमय, स्थलमय, अल्पकालीन और दीर्घकालीन आदि परिस्थितियों को देखकर यात्राकाल को विभक्त किया जा सकता है ।
( २ ) थोड़े कार्यों की सिद्धि के लिए समय की भी कम आवश्यकता होती है । इसी प्रकार बड़े कार्यों को सम्पन्न करने के लिए यात्रा भी दीर्घकालीन होती है । कभी-कभी वर्षा ऋतु में भी कार्याधिक्य के कारण दूसरे देश में रहना पड़ता है । इसलिए कार्यों के छोटे-बड़े होने के हिसाब से यात्राएँ भी छोटी-बड़ी समझनी चाहिए ।
अभियास्यत्कर्म नामक नवम अधिकरण में शक्त्यादिज्ञान और यात्राकाल नामक पहला अध्याय समाप्त ।
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| प्रकरण १३७-१३९<br>अध्याय २ | बलोपादानकालाः सन्नाहगुणाः<br>प्रतिबलकर्म च |
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(१) मौलभृतकश्रेणीमित्रामित्राटवीबलानां समुद्दानकालाः । (२) मूलरक्षणादतिरिक्तं मौलबलम्, अत्यावापयुक्ता वा मौला मूले विकुर्वीरन्निति, बहुलानुरक्तमौलबलः सारबलो वा प्रतियोद्धा व्यायामेन योद्धव्यमिति, प्रकृष्टेऽध्वनि काले वा क्षयव्ययसहत्वान्मौलानामिति, बहुलानुरक्तसम्पाते च यातव्यस्योपजापभयादन्यसैन्यानां भृतादीनामविश्वासे, बलक्षये वा सर्वसैन्यानामिति मौलबलकालः ।
सैन्य-संग्रह का समय; सैन्य-संगठन; और शत्रुसेना से मुकाबला
( १ ) इस अध्याय में—मौलवल (राजधानी की रक्षा करने वाली सेना), भृतक वल ( सवैतनिक सेना ), श्रेणीवल (विभिन्न कार्यों में नियुक्त शस्त्रास्त्र में निपुण सेना), मित्रबल ( मित्र राजा की सेना ) अमित्रबल ( शत्रु राजा की सेना ) और अटवीबल ( आटविक सेना ), इन विभिन्न सेनाओं को किस-किस अवसर पर युद्ध के लिए तैयार करना चाहिए—इसका निरूपण किया जायेगा ।
( २ ) मौलबल : मूलस्थान अर्थात् राजधानी की रक्षा के लिए जितनी सेना की अपेक्षा हो, उसके अतिरिक्त सेना को युद्ध में ले जाना चाहिए, अथवा मौलबल के बगावत कर देने की संभावना हो तो उसको युद्ध आदि कार्यों में साथ ले जाना चाहिए, या मुकाबले में आगे हुए शत्रु पर मौलबल के अनुराग की संभावना जान पड़े तो उसको साथ ले जाना चाहिए; अथवा शत्रु किसी शक्तिशाली सैन्य को लेकर युद्ध करने के लिए आया है, तब भी मौलबल को साथ ले जाना चाहिए, अथवा दूर देश, दीर्घकालीनं युद्ध, क्षय-व्यय की अवस्था में भी मौलबल को साथ रखना चाहिए, अथवा स्वामिभक्त शत्रु के दूत मेरी सेना में भेद डालने का यत्न करेंगे तथा दूसरी सेनाओं पर पूरा विश्वास न होने की स्थिति में भी मौलबल को लेकर युद्ध में जाना चाहिए, क्योंकि मौलबल अत्यन्त स्वामिभक्त होने के कारण फोड़ा नहीं जा सकता है, अथवा अन्य सेनाओं के प्रधान पुरुषों का नाश हो जाने पर यदि विजिगीषु के सेना के खेत छोड़कर भाग जाने का भय हो तो मौलबल को युद्धक्षेत्र में साथ ले जाना चाहिए ।
| ५९६ | कौटिल्य का अर्थशास्त्र | [ नौवां अधिकरण |
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(१) प्रभूतं मे भृतबलमल्पं च मौलबलमिति, परस्याल्पं विरक्तं वा मौलबलं फल्गुप्रायमसारं वा भृतसैन्यमिति, मन्त्रेण योद्धव्यमल्पव्यायामे-नेति, ह्रस्वो देशः कालो वा तनुक्षयव्ययः इति, अल्पसम्पातं शान्तोपजापं विश्वस्तं वा मे सैन्यमिति, परस्याल्पः प्रसारो हन्तव्यः इति, भृतबलकालः। (२) प्रभूतं मे श्रेणीबलं शक्यं मूले यात्रायां चाधातुमिति, ह्रस्वप्रवासः, श्रेणीबलप्रायः प्रतियोद्धा, मन्त्रव्यायामाभ्यां प्रतियोद्धुकामो दण्डबलव्यव-हारः, इति श्रेणीबलकालः । (३) प्रभूतं मे मित्रबलं शक्यं मूले यात्रायां चाधातुम्, अल्पः प्रवासो मन्त्रयुद्धाच्च भूयो व्यायामयुद्धम् इति, मित्रबलेन वा पूर्वमटवीं नगरी-स्थानमासारं वा योधयित्वा पश्चात्स्वबलेन योधयिष्यामि, मित्रसाधारणं
( १ ) भृतकबल : यदि विजिगीषु राजा यह समझे कि मौलबल की अपेक्षा मेरा भृतकबल अधिक है, अथवा शत्रु का मौलबल थोड़ा तथा अविश्वासी है, अथवा शत्रु का भृतकबल कमजोर या न होने के बराबर है, अथवा इस समय शत्रु के साथ तूष्णी युद्ध करना पड़ेगा, अथवा थोड़े ही श्रम से कार्य संपन्न हो जायगा, अथवा युद्ध का गंतव्य देश दूर नहीं है, समय भी थोड़ा ही लगेगा और अधिक क्षय-व्यय की भी संभावना नहीं है, अथवा शत्रु के गुप्तचर मेरी सेना में बहुत कम प्रवेश कर सकेंगे और वे भी भेद न डाल सकेंगे, यदि उन्होंने भेद डाल भी दिया तो अपनी विश्वस्त सेना को मैं अपने काबू में कर सकूँगा अथवा शत्रु के थोड़े ही कार्यों की क्षति करनी है'—तो ऐसी स्थितियों में एवं अवसरों पर भृतकबल को साथ लेकर उसको युद्ध में जाना चाहिए ।
( २ ) श्रेणीबल : यदि विजिगीषु को यह विश्वास हो कि 'मेरे पास श्रेणीबल इतना पोख्ता है कि उसको राजधानी की रक्षा में भी लगाया जा सकता है और शत्रु के साथ युद्ध करने के समय भी उनको साथ लिया जा सकता है, अथवा सफर कम है, मुकाबले की सेना भी प्रायः श्रेणीबल के साथ युद्ध करने लायक है, अथवा शत्रु तूष्णी-युद्ध ( मन्त्र ) अथवा प्रकाशयुद्ध ( व्यायाम ) से मुकाबला करना चाहता है, अथवा दण्ड से डरा हुआ होने के कारण शत्रु अपनी सेना को किसी राजा के अधीन करने की सोच रहा है'—ऐसी स्थितियों एवं ऐसे अवसरों पर श्रेणीबल को साथ लेकर युद्ध करना चाहिए ।
( ३ ) मित्रबल : यदि विजिगीषु राजा यह समझे कि 'उसका मित्रबल इतना पोख्ता है कि वह राजधानी की रक्षा करने में और शत्रु पर चढ़ाई करने में भी समर्थ है, अथवा सफर भी कम है, तूष्णी युद्ध की अपेक्षा वहाँ प्रकाश युद्ध ही अधिक होगा, जिससे क्षय-व्यय की कम संभावना है, अथवा शत्रुसेना या शत्रु के देश में सभी आट-
प्र० १३७-१३९ : अ० २ ] सेना सम्बन्धी कार्य ५९७
वा मे कार्यं, मित्रायत्ता वा मे कार्यसिद्धिः, आसन्नमनुग्राह्यं वा मे मित्रम्, अत्यावापं वास्य साधयिष्यामि इति मित्रबलकालः। (१) प्रभूतं मे शत्रुबलं शत्रुबलेन योधयिष्यामि नगरस्थानम्, अटवीं वा। तत्र मे श्ववराहयोः कलहे चण्डालस्येवान्यतरसिद्धिर्भविष्यति; आसाराणामटवीनां वा कण्टकमर्दनमेतत्करिष्यामि; अत्युपचितं वा कोपभयान्नित्यमासन्नमरिबले वासयेदन्यत्राभ्यन्तरकोपशङ्कायाः, शत्रुयुद्धावरयुद्धकालश्च । इत्यमित्रबलकालः । (२) तेनाटवीबलकालो व्याख्यातः। (३) मार्गदेशिकं परभूमियोग्यमरियुद्धप्रतिलोममटवीबलप्रायः शत्रुर्वाद्विल्वं बिल्वेन हन्यताम् अल्पः प्रसारो हन्तव्यः इत्यटवीबलकालः ।
विक सेना या मित्रसेना को पहिले अपनी मित्र-सेना से भिड़ा कर फिर अपनी सेना से लड़ाऊँगा, अथवा इस युद्धादि कार्य में मित्र का तथा अपना समान प्रयोजन है, इस कार्य की सिद्धि मित्र के हाथ में है, अथवा अपने समीपस्थ अन्तरंग मित्र का अवश्य ही उपकार करना है, अथवा अपने मित्र से द्रोह रखने वाली सेना ( दूष्य सेना ) को शत्रु सेना के साथ भिड़ा कर मरवा डालूँगा'—ऐसे अवसरों या ऐसी स्थितियों में मित्र सेना को युद्ध में साथ ले जाना चाहिए।
( १ ) अमित्रबल : यदि विजिगीषु यह समझे कि उसकी शत्रु सेना अत्यधिक है, जो कि उसके नगर में ही ठहरी हुई है और जिसको वह अपने दूसरे शत्रु के साथ भिड़ा सकता है, अथवा उसको आटविक सेना के साथ भिड़ा सकता है, इस प्रकार दोनों शत्रु सेनाओं के लड़ जाने पर उसका अभीष्ट सिद्ध हो जायेगा वैसे ही जैसे कि कुत्ते और सुअर की लड़ाई में किसी भी एक के मर जाने पर चाण्डाल का लाभ होता है, अथवा अपने मित्र तथा आटविक की सेना के कंटकों का इस रीति से उन्मूलन हो सकेगा; अथवा बहुत बढ़ी हुई शत्रु सेना को विजिगीषु कुपित हो जाने के भय से सदा ही अपने पास रखे, किन्तु उसको पास रखने में यदि अमात्य, पुरोहित आदि के कुपित हो जाने का भय हो तो उसे अपने पास न रखे, अथवा यदि विजिगीषु का शत्रु अपने किसी दूसरे शत्रु के साथ युद्ध कर रहा हो तो उस युद्ध के समाप्त हो जाने पर दूसरे युद्ध के अवसर पर शत्रुसेना को ही दूसरे शत्रु के मुकाबले में भिड़ा दे'— ऐसी स्थितियों एवं ऐसे अवसरों पर शत्रुसेना को ही युद्ध में भेजना चाहिए।
( २ ) अटवीबल : उक्त विवेचन के अनुसार ही आटविक सेना को युद्ध में भेजने के सम्बन्ध में भी समझ लेना चाहिए।
( ३ ) यदि विजिगीषु यह समझे कि गंतव्य स्थान को बताने के लिए प्रथ-प्रदर्शक की आवश्यकता होगी, अथवा आटविक सेना शत्रु की युद्धभूमि में लड़ने योग्य आयुधों
५९४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ नौवां अधिकरण
(१) सैन्यमनेकमनेकजातीयस्थमुक्तमनुक्तं वा विलोपार्थं यदुत्तिष्ठति, तदौत्साहिकम् । भक्तवेतनविलोपविष्टप्रतापकरं भेद्यं परेषाम्, अभेद्यं तुल्यदेशजातिशिल्पप्रायं संहतं महत् । इति बलोपादानकालाः । (२) तेषां कुप्यभृतममित्र्राटवीबलं विलोपभृतं वा कुर्यात् । (३) अमित्रस्य वा बलकाले प्रत्युत्पन्ने शत्रुमवगृह्णीयात् । अन्यत्र वा प्रेषयेत् । अफलं वा कुर्यात् । विक्षिप्तं वा वासयेत् । काले वातिक्रान्ते विसृजेत् । परस्य चैतद्बलसमुत्थानं विघातयेद्, आत्मनः सम्पादयेत् ।
की शिक्षा में निपुण है, अथवा विजिगीषु की बिना आज्ञा से ही आटविक सेना शत्रुसेना के साथ युद्ध में प्रवृत्त हो सकेगी, जैसे एक विल्वफल दूसरे विल्वफल के साथ टकरा कर फोड़ा जाता है वैसे ही शत्रु-सेना से आटविक सेना ही मुठभेड़ करने में समर्थ है, अथवा शत्रु भी आटविक सेना को लेकर ही युद्धभूमि में उतर रहा है, अथवा शत्रु के अल्प अनिष्ट के लिए आटविक सेना ही उपयुक्त होगी'—ऐसी स्थितियों एवं ऐसे अवसरों पर आटविक सेना को लेकर युद्ध में जाना चाहिए।
(१) औत्साहिकबल : उक्त छह सेनाओं के अतिरिक्त औत्साहिक नामक सातवीं सेना भी होती है। नेतृत्वहीन, भिन्न-भिन्न देशों में रहने वाली, राजा की स्वीकृति या अस्वीकृति से ही दूसरे देशों पर लूटमार करने वाली सेना को ही औत्साहिक बल कहते हैं। उसके दो भेद हैं, भेद्य और अभेद्य। दैनिक भत्ता या मासिक वेतन लेकर शत्रु के देश में लूटपाट करने वाली; दुर्गों में काम करने वाली, और राजा की सामयिक आज्ञाओं का पालन करने वाली औत्साहिक सेना भेद्य कहलाती है। भेद्य अर्थात् अधिक भत्ता देकर भेद (फोड़ने) किये जाने योग्य। किन्तु जो औत्साहिक सेना प्रायः एक ही देश की; एक ही जाति की और एक ही व्यवसाय की होती है वह अभेद्य कहलाती है। उसको वेतन आदि का प्रलोभन देकर फोड़ा नहीं जा सकता है। उसे अपने देश का अधिक ध्यान रहता है। वह बड़ी संगठित होती है। इसलिए इस सेना को उपयुक्त समय के लिए संग्रह करके रखना चाहिए।
(२) उक्त सात प्रकार की सेनाओं में से शत्रु सेना तथा आटविक सेना को नियमित मासिक वेतन न देकर उसके ओढ़ने, बिछाने तथा पहनने के लिए शत्रु देश से जीता हुआ या लूटा हुआ माल ही वेतन के रूप में देना चाहिए।
(३) सेना के सम्बन्ध में जो स्थितियाँ और जैसे अवसर विजिगीषु के लिए ऊपर बताये गए हैं; यदि वही स्थितियाँ और वैसे ही अवसर शत्रु के लिए भी अपेक्ष्य हों तो उस समय विजिगीषु को चाहिए कि जो शत्रुसेना उसके पास सहायता के लिए आयी है उसको वह अपने अधीन रखे या किसी कार्य का बहाना बना कर उसको वह अन्यत्र भेज दे। यदि ऐसे अवसरों पर शत्रु की सेना को छोड़ना ही
प्र० १३७-१३९ : अ० २ ] सेना सम्बन्धी कार्य ५९९
(१) पूर्वं पूर्वं चैषां श्रेयः सन्नाहयितुम् । (२) तद्भावभावित्वान्नित्यसत्कारानुगमाच्च मौलबलं भृतबलाच्छ्रेयः। (३) नित्यानन्तरं क्षिप्रोतथायि वश्यं च भृतबलं श्रेणीबलाच्छ्रेयः । (४) जानपदमेकार्थोपगतं तुल्यसंघर्षामर्षसिद्धिलाभं च श्रेणीबलं मित्रबलाच्छ्रेयः । (५) अपरिमितदेशकालमेकार्थोपगमाच्च मित्रबलममित्रबलाच्छ्रेयः । (६) आर्याधिष्ठितममित्रबलमटवीबलाच्छ्रेयः । तदुभयं विलोपार्थम् । अविलोपे व्यसने च ताभ्यामहिभयं स्यात् ।
पड़ जाय तो, कार्य करने के बदले में उसको जो सहायता देने की पहिले प्रतिज्ञा की गई थी उसको न देकर ही छोड़ दे; अथवा उसको छोटे-छोटे फिरकों में बाँट कर अलग-अलग छावनियों में रख दे; अथवा जब शत्रु की सहायता का समय बीत जाये तब उस सेना को छोड़ दे; अथवा जब-जब शत्रु अपने सेना-संग्रह का आयोजन करे तभी-तभी विजिगीषु उसके मार्ग में बाधायें खड़ी कर दे और शत्रु द्वारा खड़ी की गयी बाधाओं का प्रतीकार करते हुए वह अपनी सेना का संगठन करता रहे ।
(१) उक्त सात प्रकार की सेना में उत्तर-उत्तर की अपेक्षा पूर्व-पूर्व की सेना का संग्रह करना अधिक लाभप्रद है ।
(२) सदैव अपने स्वामी के साथ बने रहने के कारण तथा सदा ही सेना के सम्बन्ध में स्वामी की सत्कार बुद्धि होने के कारण और सदा ही स्वामी के सम्बन्ध में सेना का अनुराग होने के कारण भृतकबल की अपेक्षा मौलबल श्रेष्ठ होता है ।
(३) इसी प्रकार श्रेणीबल की अपेक्षा भृतकबल अधिक श्रेष्ठ होता है; क्योंकि वह सदैव राजा के समीप रहता है, अविलम्ब ही युद्ध के लिए तैयार हो सकता है और राजा के अधीन रहता है; किन्तु श्रेणीबल में ये बातें नहीं होती हैं ।
(४) मित्रबल की अपेक्षा श्रेणीबल अधिक उत्तम होता है; क्योंकि वह अपने राजा के देश का होता है; एक ही प्रयोजन के लिए उसका संग्रह किया जाता है; मालिक का जिसके साथ संघर्ष तथा क्रोध होता है श्रेणीबल की भी उसके साथ संघर्ष तथा वैर होता है; वह अपने मालिक की अभीष्ट सिद्धि में ही अपनी अभीष्टसिद्धि समझता है । परन्तु मित्रबल में ये बातें नहीं होती हैं ।
(५) अमित्रबल की अपेक्षा मित्रबल अधिक श्रेयस्कर होता है; क्योंकि मित्रबल हर समय हर स्थिति में सहायक होता है; विजिगीषु के प्रयोजन के अनुसार ही मित्रबल का भी प्रयोजन होता है । इसके विपरीत अमित्रबल में ये बातें नहीं होती हैं ।
(६) अटवीबल की अपेक्षा अमित्रबल अधिक श्रेष्ठ होता है; क्योंकि वह
| ६०० | कौटिल्य का अर्थशास्त्र | [ नौवां अधिकरण |
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(१) ब्राह्मणक्षत्रियवैश्यशूद्रसैन्यानां तेजःप्राधान्यात्पूर्वं पूर्वं श्रेयः सन्नाह-यितुमित्याचार्याः ।
(२) नेति कौटिल्यः । प्रणिपातेन ब्राह्मणबलं परोऽभिहारयेत् । प्रहरण-विद्याविनीतं तु क्षत्रियबलं श्रेयः, बहुलसारं वा वैश्यशूद्रबलमिति ।
(३) तस्माद् 'एवंबलः परः, तस्यैतत्प्रतिबलम्' इति बलसमुद्दानं कुर्यात् ।
(४) हस्तियन्त्रशकटगर्भकुन्तप्रासहाटकवेणुशल्यवद्धस्तिबलस्य प्रति-बलम् ।
(५) तदेव पाषाणलगुडावरणाङ्कुशकचग्रहणीप्रायं रथबलस्य प्रतिबलम्।
आर्यगुणों से संपन्न एवं विश्वस्त पुरुषों के नेतृत्व में रहता है; किन्तु अटवीबल के सम्बन्ध में ऐसा नहीं है । ये दोनों सेनायें शत्रुदेश को लूटने के लिए बड़ी उपयुक्त हैं । क्योंकि यदि उन्हें युद्ध में लगाया जाय या विपत्ति में सहायतार्थ नियुक्त किया जाय, तो आस्तीन के साँप की तरह सदा ही उनसे भय बना रहता है ।
( १ ) प्राचीन आचार्यों का मत है कि तेज की अतिशयता होने के कारण ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र, इन चारों वर्णों की सेनाओं में उत्तर-उत्तर की अपेक्षा पूर्व-पूर्व की सेना अधिक श्रेष्ठ है ।
( २ ) इसके विपरीत आचार्य कौटिल्य का मत है कि 'शत्रुपक्ष ब्राह्मणसेना के समक्ष नमस्कार कर या शिर झुका कर उसको अपने वश में कर लेता है । इसलिए युद्धविद्या में निपुण क्षत्रिय सेना को ही सर्वाधिक श्रेष्ठ समझना चाहिए, अथवा वैश्य सेना तथा शूद्रसेना को भी श्रेष्ठ समझना चाहिए, यदि उनमें वीर पुरुषों की अधिकता हो ।
( ३ ) सेनाओं के संबन्ध में पूर्वोक्त पारस्परिक श्रेष्ठता को समझने के बाद शत्रु-सेना के संबन्ध में भी विचार कर लेना चाहिए और अमुक शत्रुसेना के साथ अमुक सेना उपयुक्त होगी, इन सभी बातों का विचार कर उपयुक्त सेनाओं का संग्रह करना चाहिए ।
( ४ ) हस्तिसेना के मुकाबले के लिए हाथी, जामदग्न्य यन्त्र, शकटगर्भ ( शकट के समान मध्यभाग वाला अस्त्र ), भाला ( कुन्त ), बरछा ( प्रास ), त्रिशूल ( हाटक ), लाठी ( वेणु ), बल्लभ ( शल्य ) आदि साधनों से युक्त सेना की आवश्यकता होती है ।
( ५ ) उक्त हस्तिसेना यदि पाषाण, गदा ( लगुड ), कवच ( आवरण ), अंकुश और कचग्राही ( लंबी लोहे की छड़, जिसके अग्रभाग में बाल पकड़ने का हुक लगा रहता है ) आदि साधनों से युक्त हो तो वह रथ-सवार सेना का मुकाबला (प्रतिबल) करनेवाली समझना चाहिए ।
अभियास्यत्कर्म नामक नवम अधिकरण में बलप्रतिबलकर्म नामक दूसरा अध्याय समाप्त ।
प्र० १३७-१३९ : अ० २ ] शक्ति के अनुसार व्यवहार ६०१
(१) तदेवाश्वानां प्रतिबलम् । (२) वर्मिणो वा हस्तिनोऽश्वा वा वर्मिणः कवचिनो रथा आवरणिनः पत्तयश्चतुरङ्गबलस्य प्रतिबलम् । (३) एवं बलसमुद्दानं परसैन्यनिवारणम् । विभवेन स्वसैन्यानां कुर्यादङ्गविकल्पशः ।।
इति अभियास्यत्कर्मणि नवमेऽधिकरणे बलोपादानकालाः सन्नाहगुणाः प्रतिबलकर्म नाम द्वितीयोऽध्याय; आदितो द्वाविंशत्युत्तरशततमः ।
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( १ ) इसी सेना को सड़सवार ( अश्वबल ) सेना का भी प्रतिबल समझना चाहिए ।
( २ ) कवचधारी हाथी या कवचधारी घोड़े, मजबूत लोहे की पत्तों से मढ़े हुए रथ और कवचधारी पैदल सेना, इन चारों को क्रमशः, हस्तिबल, अश्वारोही, रथारोही और पदाति, इस चतुरंग सेना का प्रतिबल समझना चाहिए ।
( ३ ) इस प्रकार पूर्वोक्त रीति से सेनाओं की पारस्परिक श्रेष्ठता, गुरुता, लघुता का विचार करके ही उपयुक्त सेनाओं का संग्रह करना चाहिए । इसी प्रकार मौलभृत आदि अपनी सेनाओं की शक्ति के अनुसार एवं सेनाओं के अंगभूत साधन हाथी, घोड़े, शस्त्र आदि की अधिकता-अल्पता को दृष्टि में रख कर अलग-अलग विभागों के अनुसार ही सेना का संग्रह तथा शत्रु का प्रतिकार करना चाहिए ।
अभियास्यत्कर्म नामक नवम अधिकरण में बलप्रतिबलकर्म नामक दूसरा अध्याय समाप्त ।
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| प्रकरण १४०-१४१ | # पश्चात्कोपचिन्ता, बाह्यान्तर-प्रकृतिकोपप्रतीकारश्च # |
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| अध्याय ३ |
(१) अल्पः पश्चात्कोपो महान् पुरस्ताल्लाभ इति । अल्पः पश्चात्कोपो गरीयान् । अल्पं पश्चात्कोपं प्रयातस्य दूष्यामित्राटविका हि सर्वतः समेधयन्ति, प्रकृतिकोपो वा । लब्धमपि च महान्तं पुरस्ताल्लाभमेवंभूते भृत्यमित्रक्षयव्यया ग्रसन्ते । तस्मात्साहस्रैकीयः पुरस्ताल्लाभस्यायोगः शतैकीयो वा पश्चात्कोप इति न यायात् । सूचीमुखा ह्यनर्था इति लोकप्रवादः । (२) पश्चात्कोपे सामदानभेददण्डान्प्रयुञ्जीत । पुरस्ताल्लाभे सेनापतिं कुमारं वा दण्डचारिणं कुर्वीत ।
पाश्चात्कोपचिन्ता और बाह्याभ्यन्तर प्रकृति के कोप का प्रतीकार
( १ ) यदि थोड़ा पश्चात्कोप और अधिक भावी लाभ हो तो दोनों में से थोड़ा पश्चात्कोप ही गुरुतर है, क्योंकि विजिगीषु के युद्ध में चले जाने के कारण थोड़े पश्चात्कोप को भी राजद्रोही और आटविक बहुत बढ़ा देते हैं, अथवा विजिगीषु की अनुपस्थिति में उसका कुपित प्रकृतिवर्ग थोड़े भी पश्चात्कोप को अधिक बढ़ा देता है । यदि पश्चात्कोप की लापरवाही करके आक्रमण से होने वाले बड़े लाभ को प्राप्त कर लिया जाय तो उस बढ़े हुए पश्चात्कोप के प्रतीकार के लिए जो भृत्य तथा मित्रसंबंधी क्षय-व्यय करना पड़ता है, उसमें वह महान लाभ सब बराबर हो जाता है । इसलिए जब भावी लाभ की सफलता प्रति सहस्र एक अंश मात्र होनेवाली हो तो उसकी अपेक्षा पश्चात्कोप से होने वाला अनर्थ प्रतिशत एक अंश समझना चाहिए, अर्थात् पश्चात्कोपजन्य अनर्थ की अपेक्षा भावी लाभ में दसगुनी असारता होती है । लोकप्रसिद्धि है कि अनर्थ सदा सूचीमुख हुआ करते हैं, अर्थात् पहिले तो उनका रूप सुई के मुँह जितना सूक्ष्म होता है, किन्तु बाद में वे भयावह रूप धारण कर लेते हैं ।
( २ ) यदि पश्चात्कोप की अधिक संभावना हो तो साम, दाम, दण्ड, भेद आदि उपायों से किसी भी प्रकार उसका प्रतीकार करना चाहिए । यदि भावी लाभ को भी न छोड़ना हो तो सेनापति या युवराज के संरक्षण में सेना को विजययात्रा के लिए भेजना चाहिए ।
प्र० १४०-१४१ : अ० ३ ] पश्चात्कोप और प्रकृति कोप ६०३
(१) बलवान् वा राजा पश्चात्कोपावग्रहसमर्थः पुरस्ताल्लाभमादातुं यायात् । अभ्यन्तरकोपशङ्कायां शङ्कितानादाय यायात् ।
(२) बाह्यकोपशङ्कायां वा पुत्रदारमेषामभ्यन्तरावग्रहं कृत्वा शून्यपालमनेकबलवर्गमनेकमुख्यं च स्थापयित्वा यायात् । न वा यायात् । 'अभ्यन्तरकोपो बाह्यकोपात्पापीयान्' इत्युक्तं पुरस्तात् ।
(३) मन्त्रिपुरोहितसेनापतियुवराजानामन्यतमकोपोऽभ्यन्तरकोपः । तमात्मदोषत्यागेन परशक्त्यपराधवशेन वा साधयेत् ।
(४) महापराधेऽपि पुरोहिते संरोधनमवस्रावणं वा सिद्धिः, युवराजे संरोधनं निग्रहो वा गुणवत्यन्यस्मिन्सति पुत्रे ।
( १ ) अथवा जो शक्तिसंपन्न राजा पश्चात्कोप का प्रतीकार करने में समर्थ हो और उसका यह विश्वास हो कि वह पश्चात्कोप को पूरी तरह शांत कर सकेगा, तो थोड़ी-सी सेना पीछे छोड़कर विजिगीषु स्वयं भी यात्रा में जा सकता है । यदि ऐसी स्थिति में भीतरी कोप की आशंका हो तो उन आशंकित व्यक्तियों को साथ लेकर विजिगीषु को युद्ध में जाना चाहिए ।
( २ ) अथवा यदि बाह्यकोप की आशंका हो तो विजिगीषु के लिए उचित है वह उन बाह्यकोपकारी अंतपाल आदि के पुत्र तथा स्त्रियों को अपने अमात्यों के अधीन करके युद्ध में जाय । यदि बाह्य और आभ्यन्तर दोनों की ओर से उपद्रव की आशंका हो तो पीछे बताई गई मौलभृत आदि सात प्रकार की सेनाओं तथा अनेक मुख्य सेनापतियों से युक्त शून्यपाल को राजधानी की रक्षा के लिए नियुक्त करके विजययात्रा करनी चाहिए । इतने इन्तजाम में भी यदि आभ्यन्तर विद्रोह की आशंका बनी रहे तो विजिगीषु कदापि न जाय क्योंकि आभ्यन्तर कोप, बाह्यकोप की अपेक्षा अत्यन्त हानिकर होता है, इस बात को पहिले ही कहा जा चुका है ।
( ३ ) मन्त्री, पुरोहित, सेनापति और युवराज इन चारों में से किसी एक के द्वारा किए जाने वाले उपद्रव को आभ्यन्तरकोप कहते हैं । यह आभ्यन्तरकोप यदि विजिगीषु के किसी दोष के कारण पैदा हुआ हो तो उस दोष का परित्याग कर आभ्यन्तर कोप को शान्त करना चाहिए । यदि वह मन्त्री, पुरोहित आदि के कारण उत्पन्न हुआ हो तो उनको अपराध के अनुसार प्राणदण्ड, बन्धन तथा अर्थदण्ड आदि के द्वारा सीधा करना चाहिए ।
( ४ ) यदि पुरोहित से ऐसा कोई महान् अपराध हो जाय तो भी उसका वध नहीं करना चाहिए, क्योंकि ब्राह्मण का वध निषिद्ध है । इसलिए उसको या तो कैद में डाल दिया जाय अथवा देश-निर्वासन का दण्ड दिया जाय । यदि युवराज इस तरह
६०४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ नौवां अधिकरण
(१) ताभ्यां मन्त्रिसेनापती व्याख्यातौ ।
(२) पुत्रं भ्रातरमन्यं वा कुल्यं राज्यग्राहिणमुत्साहेन साधयेत् । उत्साहाभावे गृहीतानुवर्तनसन्धिकर्मभ्यामरिन्सन्धानभयात् । अन्येभ्यस्तद्द्विधेभ्यो वा भूमिदानैर्विश्वासयेदेनम् । तद्विशिष्टं स्वयंग्राहं दण्डं वा प्रेषयेत्, सामन्ताटविकान् वा । तैर्विगृहीतमतिसन्दध्यात् । अवरुद्धादानं पारग्रामिकं वा योगमातिष्ठेत् ।
(३) एतेन मन्त्रिसेनापती व्याख्यातौ ।
(४) मन्त्र्यादिवर्जनामन्तरमात्यानामन्यतमकोपोऽन्तरमात्यकोपः । तत्रापि यथार्हमुपायान् प्रयुञ्जीत ।
का महान् अपराध कर डाले तो उसे या तो आजन्म कैद में डाल दिया जाय या प्राणदण्ड दिया जाय, किन्तु यह प्राणदण्ड उसी दशा में दिया जाय जब कि दूसरा कोई गुणवान् पुत्र विद्यमान हो ।
( १ ) पुरोहित और युवराज के समान ही मन्त्री और सेनापति का भी उनके अपराध के अनुसार वध या बन्धन का दण्ड समझना चाहिए ।
( २ ) विजिगीषु को चाहिए कि वह अपने पुत्र, भाई या किसी खानदानी व्यक्ति को, जो राज्य लेने की इच्छा करे, उसको उसके योग्य उच्च अधिकारपदों पर नियुक्त कर के अपने वश में करे । क्योंकि यदि उन्हें वश में न किया गया तो यह आशंका नित्य ही बनी रहती है कि कहीं वे शत्रु राजा के साथ जाकर न मिल जाँय । अथवा इसी तरह के दूसरे खानदानी व्यक्तियों को जमीन आदि देकर अपने अधीन कर लेना चाहिए । अथवा ऐसे व्यक्तियों को स्वयं ग्राह सेना का सेनापति बनाकर कहीं बाहर युद्ध के लिए भेज देना चाहिए । अथवा उन्हें सामंत तथा आटविकों की सेना का अध्यक्ष नियुक्त कर के बाहर भेज देना चाहिए और फिर उस स्वयं ग्राह सेना तथा उन सामंत आटविकों के साथ झगड़ा कराके उसको कैद में डाल देना चाहिए । स्वयं ग्राह सेना द्वारा गिरफ्तार उस व्यक्ति को राजा स्वयं ले ले अथवा दुर्गलम्भोपाय प्रकरण में निर्दिष्ट उपायों द्वारा उसे वश में करे ।
( ३ ) इसी प्रकार मन्त्री और सेनापति के द्वारा पैदा किये गये उपद्रव तथा उसके प्रतीकार का भी व्याख्यान समझ लेना चाहिए ।
( ४ ) मन्त्री, पुरोहित, युवराज और सेनापति के अतिरिक्त अन्य अन्तरमात्य अर्थात् द्वारपाल या रनिवास के कर्मचारी आदि में से किसी एक द्वारा उठाये गये कोप को अन्तरमात्यकोप कहते हैं । ऐसे कोप को शान्त करने के लिए उपर्युक्त उपायों को ही काम में लाना चाहिए ।
प्र० १४०-१४१ : अ० ३ ] पश्चात्कोप और प्रकृति कोप ६०५
(१) राष्ट्रमुख्यान्तपालाटविकदण्डोपनतानामन्यतमकोपो बाह्यकोपः। तमन्योन्येनावग्राहयेत्। अतिदुर्गप्रतिस्तब्धं वा सामन्ताटविकतत्कुलीनाव-रुद्धानामन्यतमेनावग्राहयेत्। मित्रेणोपग्राहयेद्वा, यथा नामित्रं गच्छेत्। (२) अमित्रार्द्वा सत्री भेदयेदेनम्—'अयं त्वा योगपुरुषं मन्यमानो भर्त-र्यैव विक्रमयिष्यति, अवाप्तार्थो दण्डचारिणममित्राटविकेषु कृच्छ्रे वा प्रवासे योक्ष्यति, विपुत्रदारमन्ते वा वासयिष्यति, प्रतिहतविक्रमं त्वां भर्तरि पण्यं करिष्यति, त्वया वा सन्धिं कृत्वा भर्तारमेव प्रसादयिष्यति, मित्रमुपकृष्टं वास्य गच्छेद्' इति। (३) प्रतिपन्नमिष्टाभिप्रायैः पूजयेत्। (४) अप्रतिपन्नस्य संश्रयं भेदयेद्—'असौ ते योगपुरुषः प्रणिहितः' इति।
(१) राष्ट्र के प्रमुख व्यक्ति, अन्तपाल, आटविक और बलपूर्वक अधीन किये गये व्यक्ति (दण्डोपनत) आदि में से किसी एक के द्वारा उठाये गये उपद्रव को बाह्यकोप कहते हैं। ऐसे कोप को शान्त करने का यही तरीका है कि उन कोपकारों को एक-दूसरे के साथ लड़ा कर शान्त किया जाय। बाह्यकोप को उठाने वाले राष्ट्र-मुख या अन्तपाल आदि को सामन्त, आटविक या उनके कुल के किसी गिरफ्तार राजकुमार द्वारा पकड़वा दिया जाय, अथवा अपने मित्र के साथ उसकी मित्रता जोड़ दी जाय, जिससे कि वह शत्रुपक्ष में न मिल जाय।
(२) सत्री नामक गुप्तचर को चाहिए कि वह बाह्य कोपकारी राष्ट्रमुख आदि व्यक्तियों को यह कह कर मित्र बनाये रखे कि 'तुम जिसके साथ मिलना चाहते हो वह तुमको विजिगीषु का गुप्तचर समझ कर तुमको तुम्हारे मित्र से लड़ने को कहेगा और उस आक्रमण के परिणाम को देख कर तुमको अपनी सेना का नायक बनाकर अपने शत्रु या आटविक के मुकाबले में किसी दुष्कर आक्रमण के लिए नियुक्त करेगा, अथवा तुमको तुम्हारे स्त्री-पुत्रों से वियुक्त कर अपने किसी सरहदी इलाके में नियुक्त कर देगा, अथवा अपने ही मालिक के मुकाबले में यदि तुम हार गए तो तुम्हारे मालिक से धन लेकर वह उसी के हाथ तुम्हें बेच देगा, अथवा तुम्हारे स्वामी के हाथ तुम्हें ही शर्तनामा के रूप में गिरवी रख कर सन्धि कर लेगा, अथवा तुम्हें शर्त में रखकर अपने किसी मित्र के साथ तुम्हारे स्वामी की सन्धि करा देगा।'
(३) यदि सत्री के इस भेद भरे उपदेश को वह बाह्यकोपकारी स्वीकार कर ले तो उसको उसकी मनचाही वस्तुएं देकर सम्मानित किया जाय।
(४) यदि स्वीकार न करे तो संश्रयनीति के द्वारा उसे यह कहकर भिन्न कर
| ६०६ | कौटिल्य का अर्थशास्त्र | [ नौवां अधिकरण |
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(१) सत्री चैनमभित्यक्तशासनैर्घातयेद् गूढपुरुषैर्वा । सहप्रस्थायिनो वास्य प्रवीरपुरुषान् यथाभिप्रायकरणेनावाहयेत् । तेन प्रणिहितान् सत्री ब्रूयात् । इति सिद्धिः । परस्य चैनान्कोपानुत्थापयेत् । आत्मनश्च शमयेत् । (२) यः कोपं कर्तुं शमयितुं वा शक्तः, तत्रोपजापः कार्यः । यः सत्य-सन्धः शक्तः कर्मणि फलावाप्तौ चानुग्रहीतुं विनिपाते च त्रातुं, तत्र प्रति-जापः कार्यः । तर्कयितव्यश्च—कल्याणबुद्धिरुताहो शठ इति । (३) शठो हि बाह्योऽभ्यन्तरमेवमुपजपति—भर्तारं चेद्धत्वा मां प्रति-पादयिष्यति शत्रुवधो भूमिलाभश्च मे द्विविधो लाभो भविष्यति, अथवा
दिया जाय कि 'जो व्यक्ति तुम्हारे आश्रय में है वह दूसरे का गुप्तचर है, उससे तुम्हें सम्भल कर रहना चाहिए ।'
( १ ) अथवा सत्री को चाहिए कि वध के लिए नियुक्त व्यक्ति ( अभित्यक्त ) के हाथ जाली पत्र भेजवा कर— जिसमें शत्रु को छिपकर मार डालने का निर्देश हो—शत्रु के मन में सन्देह पैदा कर उसी के द्वारा उस बाह्यकोपकारी का वध करा दे, अथवा गुप्तचरों के द्वारा ही उसका वध करा दिया जाय । अथवा शत्रु का आश्रय लेने के लिए उन बाह्यकोपकारी राष्ट्रमुख्य, अन्तपाल आदि के साथ जो वीर पुरुष जाने को तैयार हों, उनकी मनचाही मुराद पूरी कर के उन्हें अपनी ओर मिला ले । यदि वे वीर पुरुष मिलने के लिए तैयार न हों तो उनके सम्बन्ध में शत्रु राजा के यहाँ जाकर सत्री इस प्रकार कहे 'ये सभी वीर पुरुष विजिगीषु ने तुम्हारे वध के लिए भेजे हैं, ये सभी गुप्तचर हैं' और इस प्रकार शत्रु को समझा कर उसी के द्वारा उनको मरवा डाले । शत्रु के पक्ष में अन्तर-बाह्यकोप पैदा करे और अपने पक्ष के कोपों का प्रतीकार करे ।
( २ ) जो व्यक्ति कोप को उत्पन्न करने और शान्त करने में समर्थ हो उसी पर उपजाप का प्रयोग कर दूसरे के साथ उसकी फूट डाल देनी चाहिए । जो पुरुष सत्य-प्रतिज्ञ हो, कार्य तथा फलसिद्धि के समय अनुग्रह करने वाला हो और आपत्ति के समय रक्षा कर सके उसके साथ प्रतिजाप ( उपजाप को स्वीकार कर लेना प्रतिजाप है ) का प्रयोग करना चाहिए । यदि उपजाप करने वाले व्यक्ति के प्रति उपजाप को स्वीकार कर लेने वाले व्यक्ति को यह आशंका हो कि कहीं वह ठगने के लिए तो ऐसा नहीं कह रहा है तो उसकी कल्याण बुद्धि या शठबुद्धि की परीक्षा लेकर भली भाँति विचार-विनिमय कर ले ।
( ३ ) जो बाह्य शठबुद्धि होते हैं वे अभ्यंतर के प्रति यह सोचकर उपजाप करते हैं कि मेरे द्वारा बहकाया गया मंत्री यदि अपने राजा को मारकर उसके स्थान पर मुझे राजा बना देगा तो शत्रु का नाश और भूमि का लाभ, ये दोनों फायदे मुझे एक
प्र० १४०-१४१ : अ० ३ ] पाश्चात्कोप और प्रकृति कोप ६०७
शत्रुरेनमाहनिष्यति हतबन्धुपक्षस्तुल्यदोषदण्डेन वा उद्विग्नश्च, मे भूयान् कृत्यपक्षो भविष्यति तद्विधे वान्यस्मिन्नपि शङ्कितो भविष्यति अन्यमन्यं चास्य मुख्यमभित्यक्तशासनेन घातयिष्यामि इति । (१) अभ्यन्तरो वा शठो बाह्यमेवमुपजपति—कोषमस्य हरिष्यामि, दण्डं वास्य हनिष्यामि, दुष्टं वा भर्तारमनेन घातयिष्यामि, प्रतिपन्नं बाह्यममित्र्राटविकेषु विक्रमयिष्यामि चक्रमस्य सज्जतां वैरमस्य प्रसज्यतां ततः स्वाधीनो मे भविष्यति, ततो भर्तारमेव प्रसादयिष्यामि, स्वयं वा राज्यं ग्रहीष्यामि, बद्ध्वा वा बाह्यभूमिं चोभयमवाप्स्यामि, विरुद्धं वावाहयित्वा बाह्यं विश्वस्तं घातयिष्यामि शून्यं वास्य मूलं हरिष्यामि इति । (२) कल्याणबुद्धिस्तु सहजीव्यर्थमुपजपति । कल्याणबुद्धिना सन्दधीत । शठं 'तथा' इति प्रतिगृह्यातिसन्दध्यात् । इति ॥ (३) एवमुपलभ्य,
साथ हो जायेंगे, अथवा यदि शत्रु ही मंत्री को मार डालेगा तो मंत्री का बन्धुवर्ग तथा दूसरे क्रुद्ध या लुब्ध लोग राजा के शत्रु बन जायेंगे और तब बड़ी सरलता से उन्हें मैं अपने वश में कर सकूँगा, इस प्रकार दूसरे कर्मचारियों पर से भी राजा का विश्वास उठ जायगा और उस दशा में मैं, एक-एक करके सभी प्रमुख कर्मचारियों के नाम अभित्यक्त व्यक्तियों के हाथ जाली पत्र भेजकर, उनको भी मरवा डालूँगा।'
(१) इसी प्रकार जो अभ्यन्तर शठ होते हैं वे बाह्य के प्रति यह सोचकर उपजाप करते हैं कि, 'इस बाह्य के कोष का मैं अपहरण कर सकूँगा अथवा इसकी सेना को मार डालूँगा, या अपने दुष्ट राजा को इसके द्वारा मरवा डालूँगा, या जब यह मेरे राजा को मारना स्वीकार कर लेगा तो उस समय इसे शत्रुओं तथा आटविकों के साथ युद्ध करने के लिए भेज दूँगा, तब इसकी सारी सेना वहीं युद्ध में फँसी रहेगी, उसका आपस में वैर बढ़ता रहेगा, उस अवस्था में यह मेरे अधीन हो जायेगा और ऐसा कार्य करके मैं अपने मालिक को प्रसन्न कर लूँगा, अथवा बाह्य को वश में करके उसका राज्य मैं स्वयं हड़प लूँगा, अथवा उसको कैद में डालकर उसकी भूमि को और अपने मालिक की भूमि को अपने अधिकार में कर लूँगा, अथवा बाह्य के किसी विरोधी से मिलकर उसके द्वारा इस बाह्य को मरवा डालूँगा, अथवा जब यह युद्ध में फँसा हो तब इसकी सूनी राजधानी को लूटूँगा।
(२) जो कल्याणबुद्धि होता है वह अपनी आजीविका को सुरक्षित रखते हुए साथी बनकर ही उपजाप किया करता है। इसलिए विजिगीषु जो चाहिए कि वह कल्याणबुद्धि के साथ सन्धि कर ले शठबुद्धि की बात को मानकर पीछे अवसर आने पर धोखा दे दे।
(३) इस प्रकार कल्याणबुद्धि और शठबुद्धि का निश्चय करके,
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(१) परे परेभ्यः स्वे स्वेभ्यः स्वे परेभ्यः स्वतः परे । रक्ष्याः स्वेभ्यः परेभ्यश्च नित्यमात्मा विपश्चिता ॥
इति अभियास्यत्कर्मणि नवमेऽधिकरणे पश्चात्कोपचिन्ता बाह्याभ्यन्तरप्रकृति-कोपप्रतीकारश्चेति तृतीयोऽध्यायः; आदितस्त्रयोविंशत्युत्तरशततमः ।
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( १ ) कार्यतत्त्व को जानने वाले विद्वान् विजिगीषु को चाहिए कि वह जिन दूसरों को शठ समझता है उनकी बात को दूसरों पर प्रकट न होने दे । और जो अपने शठ हैं उनकी बात अपनों पर भी प्रकट न होने दे, इसी प्रकार दोनों प्रकार के शठों पर एक दूसरे की बात को प्रकट न होने दे, अपने शठों की वह परायों से रक्षा करे और उनके अनुकूल या प्रतिकूल अभिप्राय को वह अपनी ओर से प्रकट न करे ।
अभियास्यत्कर्म नामक नौवें अधिकरण में आभ्यन्तर-वाह्यकोपप्रतीकार नामक तीसरा अध्याय समाप्त ।
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| प्रकरण १४२ |
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| अध्याय ४ |
क्षयव्ययलाभविपरिमर्शः
(१) युग्यपुरुषापचयः क्षयः । हिरण्यधान्यापचयो व्ययः । (२) ताभ्यां बहुगुणविशिष्टे लाभे यायात् । (३) आदेयः, प्रत्यादेयः, प्रसादकः प्रकोपको, ह्रस्वकालः, तनुक्षयः, अल्पव्ययो, महान्, वृद्धयुदयः, कल्यो, धर्म्यः, पुरोगश्चेति लाभसम्पत् । (४) सुप्राप्यानुपाल्यः परेषामप्रत्यादेय इत्यादेयः । (५) विपर्यये प्रत्यादेयः । तमाददानस्तत्रस्थो वा विनाशं प्राप्नोति । (६) यदि वा पश्येत्—'प्रत्यादेयमादाय कोशदण्डनिचयरक्षाविधानान्यवस्त्रावयिष्यामि, खनिद्रव्यहस्तिवनसेतुबन्धवणिक्पथानुद्धृतसारान्करि-
क्षय, व्यय और लाभ का विचार
(१) हाथी-घोड़े आदि सवारियों और राज-कर्मचारियों के नाश को क्षय कहते हैं। हिरण्य और धान्य आदि के नाश को व्यय कहते हैं।
(२) विजिगीषु को चाहिए कि क्षय और व्यय का ध्यान रखकर जिस समय वह बहुगुणविशिष्ट लाभ की सम्भावना समझे उस समय युद्ध के लिए प्रस्थान कर दे।
(३) लाभ के विशिष्ट बारह गुणों के नाम हैं : १. आदेय २. प्रत्यादेय ३. प्रसादक ४. प्रकोपक ५. हस्तकाल ६. तनुक्षय ७. अल्पव्यय ८. महान् ९. वृद्धयुदय १०. कल्प ११. धर्म्य और १२. पुरोग।
(४) जो बड़ी सरलता से प्राप्त किया जा सके, प्राप्ति के बाद सरलता से जिसकी रक्षा की जा सके और कालान्तर में भी जिसको शत्रु छीन न सके। ऐसे लाभ को आदेय कहते हैं।
(५) आदेय से विपरीत लाभ को प्रत्यादेय कहते हैं। जो इस प्रकार के लाभ को प्राप्त करता है अथवा उसी पर जीवन-निर्वाह करता है वह अवश्य ही विनाश को प्राप्त होता है।
(६) यदि विजिगीषु यह समझे कि : ‘प्रत्यादेय लाभ को प्राप्त कर मैं अपने शत्रु के कोष, सेना; अन्न-संचय और दुर्ग आदि के संरक्षण साधनों को नष्ट कर सकूँगा, अथवा शत्रु के खान, द्रव्यवन, हस्तिवन, सेतुबंध और व्यापारी मार्ग आदि का शोषण
३९ कौ०
६१० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ नौवां अधिकरण
ष्यामि; प्रकृतीरस्य कर्षयिष्यामि; आवाहयिष्यामि, आयोगेनाराधयि- ष्यामि वा, ताः परः प्रतियोगेन कोपयिष्यति; प्रतिपक्षे वास्य पण्यमेनं करिष्यामि; मित्रमवरुद्धं वास्य प्रतिपादयिष्यामि; मित्रस्य स्वस्व वा देशस्य पीडामन्त्रस्थस्तस्करेभ्यः परेभ्यश्च प्रतिकरिष्यामि; मित्रमाश्रयं वास्य वैगुण्यं ग्राहयिष्यामि, तदमित्रविरक्तं तत्कुलीनं प्रतिपत्स्यते; सत्कृत्य वास्मै भूमिं दास्यामि, इति, संहितसमुत्थितं मित्रं मे चिराय भविष्यति' इति प्रत्यादेयमपि लाभमाददीत । इत्यादेयप्रत्यादेयौ व्याख्यातौ ।
(१) अधार्मिकाद्धार्मिकस्य लाभो लभ्यमानः स्वेषां परेषां च प्रसादको भवति । विपरीतः प्रकोपक इति । मन्त्रिणामुपदेशाल्लाभोऽलभ्यमानः कोपको भवति, 'अयमस्माभिः क्षयव्ययौ ग्राहितः' इति । दूष्यमन्त्रिणाम- नादराल्लाभो लभ्यमानः कोपको भवति, 'सिद्धार्थोऽयमस्मान् विनाश- यिष्यति' इति । विपरीतः प्रसादकः । इति प्रसादककोपकौ व्याख्यातौ ।
कर उन्हें सारहीन बना दूँगा, या शत्रु के प्रकृतिमंडल को कष्ट पहुँचा कर निर्बल बना दूँगा, या शत्रु की भूमि को प्राप्त करके उसके उपभोग के लिए शत्रु की प्रजा को लाकर बसा दूँगा, अथवा इच्छानुसार सुख-साधनों की सुविधा देकर उन्हें अपने वश में कर लूँगा, या मेरे द्वारा प्राप्त भूमि के पुनः छिन जाने पर अपने प्रतिकूल आचरण से शत्रु वहाँ की प्रजा को कुपित कर देगा, या उस प्राप्त भूमि को शत्रु के हाथ बेच दूँगा, अथवा विशेष लाभ रहित उस भूमि में अपने मित्र या अपने पुत्र को स्थापित कर दूँगा, अथवा स्वयं ही उस भूमि का शासन करता हुआ मैं चोरों और शत्रुओं से अपने मित्र देश की रक्षा करूँगा, अथवा इस शत्रु के मित्र तथा आश्रय को इसके विरुद्ध उभार दूंगा, अथवा उस भूमि का शासन कर मैं ठीक-ठीक कर लेकर शत्रु की अयोग्यता और प्रजा की पीड़ा के सम्बन्ध में आश्रयभूत राजा से बहुत कुछ कहूँगा, जिससे किसी दूसरे योग्य व्यक्ति को वहाँ का राज्यसिंहासन मिलेगा, अथवा उस प्राप्त भूमि को मैं ही सम्मानपूर्वक शत्रु को वापिस कर दूँगा, इस संधि के कारण वह मेरा पक्का मित्र बन जायेगा'—ऐसी अवस्थाओं में विजिगीषु को चाहिए कि वह प्रत्यादेय लाभ को भी ले ले। यहाँ तक आदेय और प्रत्यादेय लाभ के सम्बन्ध में निरूपण किया गया ।
(१) जो लाभ अधार्मिक राजा से धार्मिक राजा को प्राप्त हो तथा जो अपने तथा पराये लोगों की प्रसन्नता का कारण हो उसे प्रसादक कहते हैं। इसके विपरीत लाभ को प्रकोपक कहते हैं। प्रकोपक लाभ भी दो प्रकार का होता है :—मंत्रियों के अनुसार कार्य करने पर भी लाभ का न होना प्रकोपक कहलाता है और जिस कार्य में व्यर्थ का क्षय-व्यय करके मंत्रियों को पश्चाताप करना पड़े वह लाभ ग्राहित कह-
प्र० १४२ : अ० ४ ] क्षय-व्यय-लाभ विचार ६११
(१) गमनमात्रसाध्यत्वाद्ध्रस्वकालः ।
(२) मन्त्रसाध्यत्वात्तनुकशयः ।
(३) भक्तमात्रव्ययत्वादल्पव्ययः ।
(४) तदात्ववैपुल्यान्महान् ।
(५) अर्थानुबन्धकत्वाद् वृद्ध्युदयः ।
(६) निराबाधकत्वात्कल्यः ।
(७) प्रशस्तोपादानाद्धर्म्यः ।
(८) सामवायिकानामनिबन्धगामित्वात्पुरोग इति ।
(९) तुल्ये लाभे, देशकालौ शक्त्युपायौ प्रियाप्रियौ जवाजवौ सामीप्य-विप्रकर्षौ तदात्वानुबन्धौ सारत्वसातत्ये बाहुल्यबाहुगुण्ये च विमृश्य बहुगुणयुक्तं लाभमाददीत ।
लाता है । राजद्रोही मंत्रियों के अनादर से जो लाभ प्राप्त हो वह भी प्रकोपक है, क्योंकि मंत्रियों के मन में यह शंका हो जाती है कि सिद्धिलाभ करके अवश्य ही राजा उनको नष्ट कर देगा । प्रकोपक लाभ से विपरीत गुणसंपन्न लाभ प्रसादक है । यहाँ तक प्रसादक और प्रकोपक के सम्बन्ध में निरूपण किया गया ।
( १ ) अल्पश्रम और अल्पकालीन लाभ से प्राप्त लाभ ह्रस्वकाल कहा जाता है ।
( २ ) जो लाभ केवल उपजाप आदि से ही प्राप्त हो उसे तनुकशय कहते हैं ।
( ३ ) जो लाभ केवल भोजन-भत्ता व्यय करके ही प्राप्त हो उसे अल्पव्यय कहते हैं ।
( ४ ) जो लाभ अत्यधिक मात्रा में तत्काल ही प्राप्त हो उसे महान् कहते हैं ।
( ५ ) जो लाभ भविष्य में भी अत्यधिक अर्थ-प्राप्ति कराने वाला हो उसे वृद्ध्युदय कहते हैं ।
( ६ ) जिस लाभ में आगे किसी तरह की बाधा उपस्थित न हो उसे कल्य कहते हैं ।
( ७ ) जो लाभ प्रकाशयुद्ध आदि उपादानों से धर्मपूर्वक प्राप्त किया गया हो उसे धर्म्य कहते हैं ।
( ८ ) जो लाभ मित्रराजाओं ने निर्बाध रूप से बिना किसी शर्त के प्राप्त किया हो उसे पुरोग कहते हैं ।
( ९ ) यदि दोनों पक्षों में बराबर लाभ दिखाई दे तो ऐसा बहुगुणविशिष्ट लाभ प्राप्त करना चाहिए जिसमें देश, काल, शक्ति, उपाय, प्रियाप्रिय, जयाजय, समीप-दूर, तात्कालिक, भविष्य में लगातार होना, बहुमूल्य, उपयोगी, अधिक और अत्युत्तम आदि गुण विद्यमान हों ।
६१२ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ नौवां अधिकरण
(१) लाभविघ्ना:—काम: कोप: साध्वसं कारुण्यं ह्री: अनार्यभावो मान: सानुक्रोशता परलोकापेक्षा दाम्भिकत्वम् अत्याशित्वं दैन्यम् असूया हस्तगतावमानो दौरात्मिकमविश्वासो भयमनिकार: शीतोष्णवर्षाणामाक्षम्यं मङ्गलतिथिनक्षत्रेष्टित्वमिति ।
(२) नक्षत्रमतिपृच्छन्तं बालमर्थोऽतिवर्तते ।
अर्थो ह्यर्थस्य नक्षत्रं किं करिष्यन्ति तारका: ॥
(३) नाधना: प्राप्नुवन्त्यर्थान्नरा यत्नशतैरपि ।
अर्थैरर्था: प्रबध्यन्ते गजा: प्रतिगजैरिव ॥
इति अभियास्यत्कर्मणि नवमेऽधिकरणे क्षयव्ययलाभविपरिमर्शो नाम चतुर्थोऽध्याय:, आदितश्चतुर्विंशत्युत्तरशततम: ।
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( १ ) लाभ-विघ्न : लाभ में इस प्रकार के विघ्न उपस्थित हो सकते हैं : काम, क्रोध, अप्रगल्भता ( साध्वस ), करुणा, लज्जा ( ह्री ), विश्वासघात ( अनार्य-भाव ) अहंकार, दयाभाव ( सानुक्रोशता ), परलोकभय ( परलोकापेक्षा ), दंभभाव अन्याय से अधिक लाभ प्राप्त करना ( अत्याशित्व ), दीनता असूया, हाथ में आयी चीज का तिरस्कार करना ( हस्तगतावमान ), दुर्व्यवहार ( दौरात्मिक ), अविश्वास, भय, शत्रु का तिरस्कार न करना ( अतिकार ), सर्दी, गर्मी तथा वर्षा आदि का सहन न करना और मंगल कार्यों के आरम्भ में तिथि, नक्षत्र आदि को देखना—ये सभी बात लाभ के लिए बाधास्वरूप हैं ।
( २ ) कार्य को आरम्भ करने में जो राजा नक्षत्र, तिथि, लग्न, मुहूर्त्त आदि आदि की अनुकूलता को अधिक पूछता है वह प्रमादी राजा कभी भी अपने अभीष्ट को प्राप्त नहीं कर सकता है । प्रत्येक कार्य की सिद्धि के लिए पर्याप्त धन और आवश्यक साधनों को ही नक्षत्र समझना चाहिए, इस नक्षत्र-गणना से कुछ भी बनता-बिगड़ता नहीं है ।
( ३ ) धन और आवश्यक उपायों से रहित व्यक्ति सैकड़ों यत्न करने पर भी अपने अभीष्ट फल को प्राप्त नहीं कर पाते हैं । अर्थों का ही अर्थों के साथ सम्बन्ध होता है, जैसे एक हाथी के द्वारा दूसरे हाथी को वश में किया जाता है ।
अभियास्यत्कर्म नामक नौवें अधिकरण में क्षयव्ययलाभविपरिमर्श नामक चौथा अध्याय समाप्त ।
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| प्रकरण १४३ | बाह्याभ्यन्तराश्चापदः |
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| अध्याय ५ |
(१) सन्ध्यादीनामयथोद्देशावस्थापनमपनयः। तस्मादापदः सम्भवन्ति। (२) बाह्योत्पत्तिरभ्यन्तरप्रतिजापा। अभ्यन्तरोत्पत्तिर्बाह्यप्रतिजापा। बाह्योत्पत्तिर्बाह्यप्रतिजापा। अभ्यन्तरोत्पत्तिरभ्यन्तरप्रतिजापा। इत्यापदः। (३) यत्र बाह्या अभ्यन्तरानुपजपन्ति, अभ्यन्तरा वा बाह्यान् तत्रोभय-योगे प्रतिजपतः सिद्धिर्विशेषवती। सुव्याजा हि प्रतिजपितारो भवन्ति, नोपजपितारः। तेषु प्रशान्तेषु नान्याञ्शक्नुयुरुपजपितुमुपजपितारः। कृच्छ्रोपजापा हि बाह्यानामभ्यन्तरास्तेषामितरे वा। महतश्च प्रयत्नस्य वधः, परेषामर्थानुबन्धश्चात्मनोऽन्य इति।
बाह्य और आभ्यन्तर आपत्तियाँ
(१) सन्धि, विग्रह आदि छः गुणों का उनके उचित स्थानों पर उपयोग न करना ही अपनय है। इस अपनय के कारण ही सारी विपत्तियाँ पैदा होती हैं।
(२) बाह्य और आभ्यन्तर आपत्तियाँ चार तरह से पैदा होती हैं। १. राष्ट्र-मुख्य तथा अन्तपाल आदि बाह्य लोगों के द्वारा उत्पन्न और मन्त्री, पुरोहित आदि आभ्यन्तर लोगों के द्वारा प्रोत्साहित पहिली आपत्ति है, २. आभ्यन्तर लोगों के द्वारा उत्पन्न और बाह्य लोगों के द्वारा प्रोत्साहित दूसरी आपत्ति है, ३. बाह्य लोगों के द्वारा उत्पन्न और उन्हीं के द्वारा प्रोत्साहित तीसरी आपत्ति है, इसी प्रकार ४. आभ्यन्तर लोगों के द्वारा उत्पन्न और उन्हीं से प्रोत्साहित चौथी आपत्ति है।
(३) जहाँ अपने देश के लोग विदेशियों से या विदेशी लोग अपने देश के लोगों से मिलकर षड्यन्त्र रचते हैं, उनमें से जो लोग षड्यन्त्र करने के लिए बहकाये गये (प्रतिजापिता) हैं उनको साम, दाम आदि उपायों से अपने वश में कर लेना अधिक लाभप्रद है, क्योंकि ऐसे लोगों का उद्देश्य धन लेना होता है। किन्तु षड्यन्त्र के लिए बहकाने वाले (उपजपिता) लोगों को सहज ही में वश में नहीं किया जा सकता है, क्योंकि उनके उद्देश्य का पता लगाना बड़ा कठिन होता है। इस प्रकार प्रतिजापित लोगों को यदि एक बार शान्त कर दिया जाय तो उपजपित फिर दूसरे लोगों को, भेद फूट जाने के भय से, उनकी जगह तैयार करने का साहस नहीं कर पाते हैं। ऐसी स्थिति में बाह्य लोगों का आभ्यन्तर लोगों से और आभ्यन्तर लोगों