भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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प्र० १४०-१४१ : अ० ३ ] पाश्चात्कोप और प्रकृति कोप ६०७

शत्रुरेनमाहनिष्यति हतबन्धुपक्षस्तुल्यदोषदण्डेन वा उद्विग्नश्च, मे भूयान् कृत्यपक्षो भविष्यति तद्विधे वान्यस्मिन्नपि शङ्कितो भविष्यति अन्यमन्यं चास्य मुख्यमभित्यक्तशासनेन घातयिष्यामि इति । (१) अभ्यन्तरो वा शठो बाह्यमेवमुपजपति—कोषमस्य हरिष्यामि, दण्डं वास्य हनिष्यामि, दुष्टं वा भर्तारमनेन घातयिष्यामि, प्रतिपन्नं बाह्यममित्र्राटविकेषु विक्रमयिष्यामि चक्रमस्य सज्जतां वैरमस्य प्रसज्यतां ततः स्वाधीनो मे भविष्यति, ततो भर्तारमेव प्रसादयिष्यामि, स्वयं वा राज्यं ग्रहीष्यामि, बद्ध्वा वा बाह्यभूमिं चोभयमवाप्स्यामि, विरुद्धं वावाहयित्वा बाह्यं विश्वस्तं घातयिष्यामि शून्यं वास्य मूलं हरिष्यामि इति । (२) कल्याणबुद्धिस्तु सहजीव्यर्थमुपजपति । कल्याणबुद्धिना सन्दधीत । शठं 'तथा' इति प्रतिगृह्यातिसन्दध्यात् । इति ॥ (३) एवमुपलभ्य,


साथ हो जायेंगे, अथवा यदि शत्रु ही मंत्री को मार डालेगा तो मंत्री का बन्धुवर्ग तथा दूसरे क्रुद्ध या लुब्ध लोग राजा के शत्रु बन जायेंगे और तब बड़ी सरलता से उन्हें मैं अपने वश में कर सकूँगा, इस प्रकार दूसरे कर्मचारियों पर से भी राजा का विश्वास उठ जायगा और उस दशा में मैं, एक-एक करके सभी प्रमुख कर्मचारियों के नाम अभित्यक्त व्यक्तियों के हाथ जाली पत्र भेजकर, उनको भी मरवा डालूँगा।'

(१) इसी प्रकार जो अभ्यन्तर शठ होते हैं वे बाह्य के प्रति यह सोचकर उपजाप करते हैं कि, 'इस बाह्य के कोष का मैं अपहरण कर सकूँगा अथवा इसकी सेना को मार डालूँगा, या अपने दुष्ट राजा को इसके द्वारा मरवा डालूँगा, या जब यह मेरे राजा को मारना स्वीकार कर लेगा तो उस समय इसे शत्रुओं तथा आटविकों के साथ युद्ध करने के लिए भेज दूँगा, तब इसकी सारी सेना वहीं युद्ध में फँसी रहेगी, उसका आपस में वैर बढ़ता रहेगा, उस अवस्था में यह मेरे अधीन हो जायेगा और ऐसा कार्य करके मैं अपने मालिक को प्रसन्न कर लूँगा, अथवा बाह्य को वश में करके उसका राज्य मैं स्वयं हड़प लूँगा, अथवा उसको कैद में डालकर उसकी भूमि को और अपने मालिक की भूमि को अपने अधिकार में कर लूँगा, अथवा बाह्य के किसी विरोधी से मिलकर उसके द्वारा इस बाह्य को मरवा डालूँगा, अथवा जब यह युद्ध में फँसा हो तब इसकी सूनी राजधानी को लूटूँगा।

(२) जो कल्याणबुद्धि होता है वह अपनी आजीविका को सुरक्षित रखते हुए साथी बनकर ही उपजाप किया करता है। इसलिए विजिगीषु जो चाहिए कि वह कल्याणबुद्धि के साथ सन्धि कर ले शठबुद्धि की बात को मानकर पीछे अवसर आने पर धोखा दे दे।

(३) इस प्रकार कल्याणबुद्धि और शठबुद्धि का निश्चय करके,