कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ६०८ | कौटिल्य का अर्थशास्त्र | [ नौवां अधिकरण |
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(१) परे परेभ्यः स्वे स्वेभ्यः स्वे परेभ्यः स्वतः परे । रक्ष्याः स्वेभ्यः परेभ्यश्च नित्यमात्मा विपश्चिता ॥
इति अभियास्यत्कर्मणि नवमेऽधिकरणे पश्चात्कोपचिन्ता बाह्याभ्यन्तरप्रकृति-कोपप्रतीकारश्चेति तृतीयोऽध्यायः; आदितस्त्रयोविंशत्युत्तरशततमः ।
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( १ ) कार्यतत्त्व को जानने वाले विद्वान् विजिगीषु को चाहिए कि वह जिन दूसरों को शठ समझता है उनकी बात को दूसरों पर प्रकट न होने दे । और जो अपने शठ हैं उनकी बात अपनों पर भी प्रकट न होने दे, इसी प्रकार दोनों प्रकार के शठों पर एक दूसरे की बात को प्रकट न होने दे, अपने शठों की वह परायों से रक्षा करे और उनके अनुकूल या प्रतिकूल अभिप्राय को वह अपनी ओर से प्रकट न करे ।
अभियास्यत्कर्म नामक नौवें अधिकरण में आभ्यन्तर-वाह्यकोपप्रतीकार नामक तीसरा अध्याय समाप्त ।
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