भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

पृष्ठ 674, कुल 918 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 674

५९० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ नौवां अधिकरण

उत्साहवतश्च प्रभाववन्तो जित्वा क्रीत्वा च स्त्रियो बालाः पङ्गवोऽन्धाश्च पृथिवीं जिग्युः इति । (१) प्रभावमन्त्रयोः प्रभावः श्रेयान् । मन्त्रशक्तिसम्पन्नो हि वन्ध्यबुद्धि-रप्रभावो भवति, मन्त्रकर्म चास्य निश्चितमप्रभावो गर्भधान्यमवृष्टिरिवोप-हन्ति इत्याचार्याः । (२) नेति कौटिल्यः । मन्त्रशक्तिः श्रेयसी । प्रज्ञाशास्त्रचक्षुर्हि राजा अल्पेनापि प्रयत्नेन मन्त्रमाधातुं शक्तः, परानुत्साहप्रभाववतश्च सामादिभि-र्योगोपनिषद्भूयां चातिसन्धातुम् । एवमुत्साहप्रभावमन्त्रशक्तीनामुत्तरोत्तरा-धिकोऽतिसन्धत्ते । (३) देशः पृथिवी । तस्यां हिमवत्समुद्रान्तरमुदीचीनं योजनसहस्रपरि-माणं तिर्यक् चक्रवर्तिक्षेत्रम् । तत्रारण्यो ग्राम्यः पार्वत औदको भौमः समो


बहादुर आदमियों को भत्ता, वेतन, धन आदि देकर वह अपने वश में कर सकता है । घोड़ा, हाथी, रथ तथा शस्त्रास्त्र आदि साधनों से युक्त उसकी सेना निःशंक होकर विचरण कर सकती है । इतिहास हमें बताता है कि स्त्री, बालक, लँगड़े और अन्धे प्रभावशक्तिसम्पन्न राजाओं ने अपने प्रभाव के कारण उत्साहशक्तिसम्पन्न राजाओं को जीतकर अथवा अपने वश में करके पृथिवी पर विजय प्राप्त की थी ।'

( १ ) प्राचीन आचार्यों का अभिमत है कि 'प्रभावशक्तिसम्पन्न और मन्त्रशक्ति-सम्पन्न इन दोनों राजाओं में से प्रभावशक्तिसम्पन्न राजा अधिक श्रेष्ठ है, क्योंकि मन्त्रशक्तिसम्पन्न होकर भी राजा यदि प्रभावशक्ति रहित हुआ तो उसका मन्त्र सफल नहीं होता । उसके सुविचारित कार्य उसी प्रकार नष्ट हो जाते हैं जैसे वृष्टि की अपेक्षा रखता हुआ गर्भस्थ धान्य वर्षा न होने के कारण नष्ट हो जाता है ।'

( २ ) उक्त मत के विरुद्ध आचार्य कौटिल्य का कहना है कि 'प्रभावशक्ति की अपेक्षा मन्त्रशक्ति ही श्रेष्ठ है, क्योंकि जिस राजा के पास बुद्धि तथा शास्त्ररूपी नेत्र हैं वह थोड़ा प्रयत्न करने पर ही मन्त्र का अच्छी तरह अनुष्ठान कर सकता है और उत्साह, प्रभाव, साम तथा औपनिषदिक उपायों द्वारा शत्रुओं को वश में कर सकता है । इसी प्रकार उत्साह, प्रभाव और मन्त्र, तीनों शक्तियाँ उत्तरोत्तर बलवान् हैं । अर्थात् उत्तरोत्तर शक्ति से सम्पन्न राजा पूर्व-पूर्व शक्ति से सम्पन्न राजा को वश में कर सकता है ।'

( ३ ) देश : देश कहते हैं पृथिवी को । हिमालय से लेकर दक्षिण समुद्र पर्यन्त-पूर्व-पश्चिम दिशाओं में एक हजार योजन तक फैला हुआ और पूर्व-पश्चिम की सीमाओं के बीच का भू-भाग चक्रवर्ती क्षेत्र कहलाता है, अर्थात् इतनी पृथिवी पर राज्य करने वाला राजा चक्रवर्ती होता है । उस चक्रवर्ती क्षेत्र में जंगल, आबादी, पहाड़ी इलाका,