भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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प्रकरण १३५-१३६# शक्तिदेशकालबलाबलज्ञानं
अध्याय १### यात्राकालाश्च

(१) विजिगीषुरात्मनः परस्य च बलाबलं शक्तिदेशकालयात्राकाल-बलसमुत्थानकालपश्चात्कोपक्षयव्ययलाभापदां ज्ञात्वा विशिष्टबलो यायात् । अन्यथासीत ।

(२) उत्साहप्रभावयोरुत्साहः श्रेयान् । स्वयं हि राजा शूरो बलवान-रोगः कृतास्त्रो दण्डद्वितीयोऽपि शक्तः प्रभाववन्तं राजानं जेतुम्, अल्पोऽपि चास्य दण्डस्तेजसा कृत्यकरो भवति । निरुत्साहस्तु प्रभाववान् राजा विक्र-माभिपन्नो नश्यति इत्याचार्याः ।

(३) नेति कौटिल्यः । प्रभाववानुत्साहवन्तं राजानं प्रभावेणाति-सन्धत्ते । तद्विशिष्टमन्यं राजानमावाह्य हृत्वा क्रीत्वा प्रवीरपुरुषान् । प्रभूतप्रभावहयहस्तिरथोपकरणसम्पन्नश्चास्य दण्डः सर्वत्राप्रतिहतश्चरति ।


शक्ति, देश, काल के बलाबल का ज्ञान और आक्रमण का समय

( १ ) विजिगीषु को चाहिए कि वह अपने और शत्रु के बीच शक्ति, देश, काल, युद्धकाल, सेना की उन्नति का समय ( बलसमुत्थानकाल ), पश्चात्कोप ( अपनी सेना-रहित राजधानी में पाणिग्राह के आक्रमण की आशंका ), क्षय, व्यय, लाभ और आपत्ति आदि बलाबल के सम्बन्ध में भलीभाँति जानकर शत्रु की अपेक्षा अधिक सेना लेकर उस पर आक्रमण करे । यदि अधिक सैन्यबल का प्रबन्ध न हो सके तो चुपचाप बैठा रहे ।

( २ ) शक्ति : प्राचीन आचार्यों का कहना है कि उत्साहशक्ति और प्रभावशक्ति इन दोनों में से उत्साहशक्ति श्रेष्ठ है, क्योंकि शूर, बलवान्, नीरोग, शस्त्रास्त्र चलाने में निपुण, केवल अपनी ही सेना की सहायता पर निर्भर रहने वाला उत्साहशक्ति-सम्पन्न राजा, प्रभावशक्तिसम्पन्न राजा को अच्छी तरह जीत सकता है । उसके तेज से उसकी थोड़ी सेना भी हर तरह का कार्य करने के लिए तैयार रहती है । प्रभाव-सम्पन्न, किन्तु उत्साहहीन राजा पराक्रम के समय अपनी रक्षा नहीं कर पाता है ।

( ३ ) पूर्वाचार्यों के उक्त मत के विरुद्ध आचार्य कौटिल्य का कहना है कि 'प्रभावशाली राजा उत्साही राजा को अपने प्रभाव से पराभूत कर लेता है । अपने प्रभाव से वह अधिक उत्साही किसी दूसरे राजा को अपने पक्ष में कर सकता है ।