भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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५८२ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ आठवां अधिकरण

(१) परिश्रान्तपरिक्षीणयोः परिश्रान्तं स्नानभोजनस्वप्नलब्धविश्रमं युध्येत, न परिक्षीणमन्यत्राहवे क्षीणयुग्यपुरुषम् । (२) प्रतिहतहताग्रवेगयोः प्रतिहतमग्रपातभग्नं प्रवीरपुरुषसंहतं युध्यते, न हताग्रवेगमग्रपातहतप्रवीरम् । (३) अनृतुभूमिप्राप्तयोरनृतुप्राप्तं यथर्तुयोग्ययुग्यशस्त्रावरणं युध्येत, नाभूमिस्राप्तमवरुद्धप्रसारव्यायामम् । (४) आशानिर्वेदिपरिसृप्तयोराशानिर्वेदि लब्धाभिप्रायं युध्येत, न परिसृप्तमपसृतमुख्यम् । (५) कलत्रगर्ह्यन्तश्शल्ययोः कलत्रगर्ह्यमुन्मुच्य कलत्रं युध्येत, नान्तश्शल्यमन्तरमित्रम् ।

सेनाओं में नवागत सेना दूसरे अनुभवी व्यक्तियों से जानकारी प्राप्त करके तथा पुराने आदमियों के साथ मिलकर युद्ध कर सकती है, किन्तु दूरायात सेना नहीं, क्योंकि वह लम्बी यात्रा से थकी हुई होने के कारण असमर्थ रहती है ।

(१) परिश्रांत (थकी हुई) और परिक्षीण (योग्य सैनिकों से हीन), इन दोनों सेनाओं में परिश्रांत सेना स्नान, भोजन, निद्रा आदि विश्राम प्राप्त कर युद्ध के लिए तैयार हो सकती है; किन्तु परिक्षीण सेना नहीं, क्योंकि उसके योग्य पुरुषों का नाश हो चुका होता है ।

(२) प्रतिहत (पराजित) और हताग्रवेग (हतोत्साह) इन दोनों सेनाओं में प्रतिहत सेना युद्ध के लिए तैयार हो सकती है, किन्तु हताग्रवेग नहीं, क्योंकि वीर सैनिकों के खो देने से युद्ध में जाने के लिए उसका उत्साह जाता रहता है ।

(३) अनृतुप्राप्त (जिसको युद्ध के योग्य समय न मिले) और अभूमिप्राप्त (जिसको कवायद के लिए भूमि प्राप्त न हो) इन दोनों में अनृतुप्राप्त सेना विपरीत समय में भी युद्धोपयोगी साधन प्राप्त कर युद्ध के लिए तैयार हो सकती है, किन्तु अभूमिप्राप्त सेना नहीं, क्योंकि वह अनुपयुक्त भूमि में फँस कर चलने-फिरने तथा युद्धसम्बन्धी कार्यों को करने में असमर्थ रहती है ।

(४) आशानिर्वेदी (आशारहित) और परिसृप्त (नेतृत्वहीन) इन दोनों सेनाओं में आशानिर्वेदी अपना स्वार्थलाभ देखकर युद्ध के लिए तैयार हो सकती है, किन्तु परिसृप्त नहीं, क्योंकि उसका मुख्य नेता नहीं होता है ।

(५) कलत्रगर्ही (कलत्र आदि की निन्दा करने वाला) और अन्तःशल्य (अन्दर से शत्रुता रखने वाला) इन दोनों सैन्यों में कलत्रगर्ही अपने स्त्री-पुरुषों की समुचित व्यवस्था करके युद्ध के लिए तैयार हो सकता है, किन्तु अन्तःशल्य सैन्य नहीं, क्योंकि वह अन्दर से शत्रुता रखता है ।