कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्र० १३३-१३४ : अ० ५ ] सेनाव्यसन और मित्रव्यसन ५८३
(१) कुपितमूलभिन्नगर्भयोः कुपितमूलं प्रशमितकोपं सामादिभिर्युध्येत, न भिन्नगर्भमन्योन्यस्माद् भिन्नम् ।
(२) अपसृतातिक्षिप्तयोरपसृतमेकराज्यातिक्रान्तं मन्त्रव्यायामाभ्यां सत्रमित्रापाश्रयं युध्येत, नातिक्षिप्तमनेकराज्यातिक्रान्तं बह्वाबाधत्वात् ।
(३) उपनिविष्टसमाप्तयोरुपनिविष्टं पृथग्यानस्थानमतिसन्धातारं युध्येत, न समाप्तमरिणैकस्थानयानम् ।
(४) उपरुद्धपरिक्षिप्तयोरुपरुद्धमन्यतो निष्क्रम्योपरोधद्वारं प्रतियुध्येत, न परिक्षिप्तं सर्वतः प्रतिरुद्धम् ।
(५) छिन्नधान्यपुरुषवीवधयोः छिन्नधान्यमन्यतो धान्यमानीय जङ्गम-स्थावराहारं वा युध्येत, न छिन्नपुरुषवीवधमनभिसारम् ।
( १ ) कुपितमूल ( क्रोधीली सेना ) और भिन्नगर्भ ( आपसी वैर रखने वाली सेना ) इन दोनों में से कुपितमूल सेना को साम आदि के द्वारा शान्त करके युद्ध के तैयार किया जा सकता है, किन्तु भिन्नगर्भ सेना को नहीं, क्योंकि उसकी आपस में ही अनबन रहती है ।
( २ ) अपसृत ( एक ही राज्य में दूसरी सेना द्वारा कष्ट पायी सेना ) और अतिक्षिप्त ( अनेक राज्यों में दूसरी अनेक सेनाओं द्वारा कष्ट पायी हुई सेना ), इन दोनों में से अपसृत सेना को, विशेष उपायों तथा कवायद आदि के द्वारा जंगल और मित्र का सहारा देकर, युद्ध के लिए तैयार किया जा सकता है, किन्तु अतिक्षिप्त सेना को नहीं, क्योंकि उसे अनेक राज्यों के बहुत-से कष्टों का अनुभव रहता है ।
( ३ ) उपनिविष्ट ( शत्रु के समीप ठहरने वाली किन्तु शत्रु-विमुख सेना ) और समाप्त ( शत्रु के साथ ही ठहरने तथा आक्रमण करने वाली सेना ), इन दोनों में से उपनिविष्ट सेना भिन्न-भिन्न स्थानों में युद्ध करने का अनुभव प्राप्त करने से छावनी के अतिरिक्त अन्यत्र भी युद्ध कर सकती है, किन्तु समाप्त सेना नहीं, क्योंकि शत्रु के सहयोग में रहने के कारण उसके सब भेद शत्रु को मालूम होते हैं ।
( ४ ) उपरुद्ध ( एक ओर से घिरी हुई ) और परिक्षिप्त ( चारों ओर से घिरी हुई ), इन दोनों में से उपरुद्ध सेना दूसरी ओर से निकल कर आक्रमण कर सकती है, किन्तु परिक्षिप्त सेना नहीं, क्योंकि वह चारों ओर से घिरी होती है ।
( ५ ) छिन्नधान्य ( जिस सेना का अपने देश से धान्य आदि मँगाने का सम्बन्ध टूट गया हो ) और विच्छिन्नपुरुषवीवध ( जिस सेना का अपने देश से खाद्य पदार्थ तथा सैनिक सम्बन्ध टूट गया हो ), इन दोनों में से छिन्नधान्य सेना अन्यत्र से अनाज, साग-सब्जी तथा मांस आदि मँगाकर युद्ध कर सकती है, किन्तु विच्छिन्नपुरुषवीवध सेना नहीं, क्योंकि वह सब तरह से असहाय होती है ।