भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

पृष्ठ 668, कुल 918 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 668

५८४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ आठवां अधिकरण

(१) स्वविक्षिप्तमित्रविक्षिप्तयोः स्वविक्षिप्तं स्वभूमौ विक्षिप्तं सैन्य- मापदि शक्यमवस्त्रावयितुं, न मित्रविक्षिप्तं विप्रकृष्टदेशकालत्वात् । (२) दूष्ययुक्तदुष्टपाष्णिग्राहयोर्दूष्ययुक्तमाप्तपुरुषाधिष्ठितमसंहतं यु- ध्येत, न दुष्टपाष्णिग्राहं पृष्ठाभिघातत्रस्तम् । (३) शून्यमूलस्वामिसंहतयोः शून्यमूलं कृतपौरजानपदारक्षं सर्वसन्दो- हेन युध्येत, नास्वामिसंहतं राजसेनापतिहीनम् । (४) भिन्नकूटान्धयोभिन्नकूटमन्याधिष्ठितं युध्येत, नान्धमदेशिक- मिति । (५) दोषशुद्धिर्बलावापः सत्रस्थानातिसंहतम् । सन्धिश्चोत्तरपक्षस्य बलव्यसनसाधनम् ॥ (६) रक्षेत् स्वदण्डं व्यसने शत्रुभ्यो नित्यमुत्थितः । प्रहरेद् दण्डरन्ध्रेषु शत्रूणां नित्यमुत्थितः ॥


( १ ) स्वविक्षिप्त ( अपने ही देश में इधर-उधर भेजी ) और मित्रविक्षिप्त ( मित्र देश को भेजी हुई ), इन दोनों सेनाओं में से स्वविक्षिप्त सेना आवश्यकतानुसार आसानी से एकत्र की जा सकती है, किन्तु मित्रविक्षिप्त सेना नहीं, क्योंकि दूर होने के कारण वह समय पर काम नहीं आ सकती ।

( २ ) दूष्ययुक्त ( राजद्रोहियों से सम्बद्ध ) और दुष्ट पाष्णिग्राह ( जिसके पीछे दुष्ट सेना हो ) इन दोनों में से दूष्ययुक्त सेना, दूष्य पुरुषों की सेवा में विश्वस्त पुरुषों को नियुक्त कर, युद्ध के लिए तैयार हो सकती है, किन्तु दुष्टपाष्णिग्राह नहीं, क्योंकि उसको पीछे के आक्रमण का सदा भय बना रहता है ।

( ३ ) शून्यमूल ( राजधानी की अत्यल्प सेना ) और अस्वामिसंहत ( राजा तथा सेनापति रहित सेना ), इन दोनों में से शून्यमूल सेना नगरनिवासियों तथा जनपद-निवासियों की सहायता से युद्ध कर सकती है, किन्तु अस्वामिसंहत सेना नहीं, क्योंकि वह अपने नेता से रहित होती है ।

( ४ ) भिन्नकूट ( प्रधान सेनापति से रहित ) और अन्ध ( शत्रु के व्यवहारों से सर्वथा अपरिचित ), इन दोनों सेनाओं में से भिन्नकूट सेना किसी दूसरे सेनापति के शासन से युद्ध के लिए तैयार हो सकती है, किन्तु अन्ध सेना नहीं, क्योंकि उसमें शत्रु के व्यवहारों से सर्वथा अपरिचित सैनिक रहते हैं ।

( ५ ) सैनिक व्यसनों के परिहार का उपाय : अमानन, विमानन, आदि दोषों का प्रायश्चित करना, दोषरहित सेना को दूसरी सेना के साथ ठहराना, जंगली स्थानों में सेना की स्थिति बनाये रखना, क्रूर उपायों से शत्रुसेना का भेदन करना और अपने से बलवान् पक्ष के साथ सन्धि करना, ये सेनासम्बन्धी व्यसनों (बल-व्यसनों) को दूर करने के उपाय हैं ।

( ६ ) विजिगीषु को चाहिए कि सदा सजग रहता हुआ वह व्यसनकाल में शत्रु