भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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प्र० १३३-१३४ : अ० ५ ] सेनाव्यसन और मित्रव्यसन ५८५

(१) अभियातं स्वयं मित्रं सम्भूयान्यवशेन वा।
परित्यक्तमशक्त्या वा लोभेन प्रणयेन वा॥
(२) विक्रीतमभियुञ्जाने सङ्ग्रामे वांपवर्तिना।
द्वैधीभावेन वा मित्रं यास्यता वान्यमन्यतः॥
(३) पृथग्वा सहयाने वा विश्वासेनातिसंहितम्।
भयावमानालस्यैर्वा व्यसनान्न प्रमोक्षितम्॥
(४) अवरुद्धं स्वभूमिभ्यः समीपाद् वा भयाद् गतम्।
आच्छेदनाददानाद् वा दत्त्वा वाप्यवमानितम्॥
(५) आत्याहारितमर्थं वा स्वयं परमुखेन वा।
अतिभारे नियुक्तं वा भङ्क्त्वा परमवस्थितम्॥


सेना से अपनी सेना की रक्षा करे और बड़ी चतुरता से शत्रुसेना की निर्बलताओं का पता लगा कर उन पर सदा प्रहार करता रहे।

(१) मित्रव्यसन : जब विजिगीषु असमर्थ होने के कारण या लोभ तथा स्नेह के कारण अपने प्रयोजन से अथवा किसी बन्धु आदि के प्रयोजन से शत्रु के साथ मिल कर शत्रु पर आक्रमण करने वाले अपने मित्र की सहायता नहीं करता तो वह बिछुड़ा हुआ मित्र फिर बड़ी मुश्किल से उसके वश में आता है।

(२) युद्ध के दौरान में ही शत्रु से कुछ धन आदि लेकर अपनी सहायता को पूरा न करके विजिगीषु द्वारा बीच ही में छोड़ा हुआ मित्र, अथवा द्वैधीभाव द्वारा अपने यातव्य पर आक्रमण कर देने के कारण बेचा हुआ मित्र, अथवा 'तुम इस ओर आक्रमण करो और मैं इस ओर' इस प्रकार परस्पर अपने मित्र के शत्रु के साथ संधि करके किसी दूसरे ही अपने शत्रु पर आक्रमण करने वाले विजिगीषु से ठगा हुआ मित्र फिर बड़ी मुश्किल से उसके वश में आता है।

(३) पृथक् आक्रमण करने या एक साथ आक्रमण करने पर पहले विश्वास दिलाकर और बाद में छिपे तौर से मित्र के शत्रु के साथ सन्धि करके विजिगीषु द्वारा खोया हुआ मित्र, अथवा मित्र के सम्बन्ध में तिरस्कार की भावना रखने के कारण या अपने ही आलस्य के कारण आपत्ति से न छुड़ाया गया मित्र बड़ी मुश्किल से वश में आता है।

(४) विजिगीषु के देश में जाने से रोका गया मित्र अथवा वध-बन्धन के भय से विजिगीषु के पास से गया हुआ मित्र अथवा बलपूर्वक द्रव्य का अपहरण करने से तिरस्कृत हुआ मित्र, अथवा देने योग्य वस्तु न देने के कारण या देकर फिर तिरस्कृत हुआ मित्र बड़ी कठिनाई से वश में आता है।

(५) विजिगीषु के द्वारा या किसी दूसरे के द्वारा धन का सर्वथा अपहरण किया गया या कराया गया मित्र, अथवा विजिगीषु के शत्रु को जीतकर आया हुआ और तत्काल ही किसी दूसरे दुःसाध्य कार्य पर लगाया हुआ मित्र बिगड़ जाने पर बड़ी मुश्किल से वश में आता है।

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