कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
पृष्ठ 670, कुल 918 में से
संदर्भ में पढ़ें५८६ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ आठवां अधिकरण
(१) उपेक्षितमशक्त्या वा प्रार्थयित्वा विरोधितम् । कृच्छ्रेण साध्यते मित्रं सिद्धं चाशु विरज्यति ॥ (२) कृतप्रयासं मान्यं वा मोहान्मित्रममानितम् । मानितं वा न सदृशं भक्तितो वा निवारितम् ॥ (३) मित्रोपघातत्रस्तं वा शङ्कितं वारिसंहितात् । दूष्यैर्वा भेदितं मित्रं साध्यं सिद्धं च तिष्ठति ॥ (४) तस्मान्नोत्पादयेदेनान् दोषान् मित्रोपघातकान् । उत्पन्नान् वा प्रशमयेद् गुणैर्दोषोपघातिभिः ॥ (५) यतो निमित्तं व्यसनं प्रकृतीनामवाप्नुयात् । प्रागेव प्रतिकुर्वीत तन्निमित्तमतन्द्रितः ॥
इति व्यसनाधिकारिकेऽष्टमेऽधिकरणे बलव्यसन-मित्रव्यसनवर्गो नाम पञ्चमोऽध्यायः; आदितो विंशतिशततमः ।
समाप्तमिदमष्टमं व्यसनाधिकारिकं नामाधिकरणम् ।
—: ० :—
( १ ) असमर्थ होने के कारण ठुकराया गया मित्र, अथवा मित्रता के लिए प्रार्थना करके फिर विरुद्ध किया गया मित्र बड़ी कठिनाई से वश में आता है ।
( २ ) जिस मित्र ने विजिगीषु के लिए अत्यन्त कठिन संग्राम किया हो, भ्रम या प्रमाद से तिरस्कृत हुआ ऐसा पूजा योग्य मित्र अथवा परिश्रम के योग्य सत्कार न किया हुआ मित्र, अथवा विजिगीषु में अनुराग होने के कारण विजिगीषु के शत्रुओं से दुत्कारा गया मित्र, शीघ्र ही फिर विजिगीषु के वश में हो जाता है ।
( ३ ) विजिगीषु के द्वारा किसी दूसरे मित्र पर किये गये आघात को देखकर डरा हुआ मित्र अथवा विजिगीषु द्वारा शत्रु के साथ सन्धि कर लेने पर शंकित हुआ मित्र, शीघ्र ही विजिगीषु के वश में हो जाता है ।
( ४ ) इसलिए विजिगीषु को चाहिए कि वह मित्रों के साथ भेद डालने वाले उक्त दोषों को अपने में कभी पनपने ही न दे । यदि कोई दोष पैदा भी हो जायँ तो उन्हें दोषनाशक गुणों के द्वारा तत्काल ही शान्त कर देना चाहिए ।
( ५ ) विजिगीषु को चाहिए कि वह आलस्य का परित्याग कर अपने प्रकृतिवर्ग में, व्यसनों के पैदा होने से पहिले ही, उनके कारणों का प्रतिकार कर दे ।
इति व्यसनाधिकारिक नामक आठवें अधिकरण में बलव्यसन-मित्रव्यसनवर्ग-नामक पाँचवां अध्याय समाप्त ।
—: ० :—