कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्र० १४३ : अ० ५ ] बाह्याभ्यन्तर आपत्तियाँ ६१५
योग उपजपितुः सिद्धिर्विशेषवती । दोषशुद्धौ हि दूष्या न विद्यन्ते । दूष्य-शुद्धौ हि दोषः पुनरन्यान् दूषयति ।
(१) तस्माद्बाह्येषूपजपत्सु भेददण्डौ प्रयुञ्जीत । सत्रिणो मित्रव्यञ्जना वा ब्रूयुः-‘अयं वो राजा स्वयमादातुकामः, विगृहीताः स्थ अनेन राज्ञा, बुध्यध्वम्' इति । प्रतिजपितुर्वा ततो दूतदण्डाननुप्रविष्टास्तीक्ष्णाः शस्त्ररसादिभिरेषां छिद्रेषु प्रहरेयुः । ततः सत्रिणः प्रतिजपितारमभिशंसेयुः ।
(२) अभ्यन्तरानभ्यन्तरेषूपजपत्सु यथार्हमुपायं प्रयुञ्जीत । तुष्टलिङ्गमत्तुष्टं विपरीतं वा साम प्रयुञ्जीत ।
(३) शौचसामर्थ्यापदेशेन व्यसनाभ्युदयापेक्षणेन वा प्रतिपूजनमिति दानम् ।
(४) मित्रव्यञ्जनो वा ब्रूयादेतान्–'चित्तज्ञानार्थमुपधास्यति वो राजा,
पिता हो उसे अपने पक्ष में कर लेना लाभप्रद होता है, क्योंकि उसके न रहने पर षड्यन्त्र आगे नहीं बढ़ पाता है । दूष्य व्यक्तियों को यदि शान्त किया जाय तो उनके दोष दूसरे अनेक लोगों को राजद्रोही बनाने में सहायक होते हैं ।
( १ ) इसलिए षड्यंत्रकारी बाह्य लोगों को भेद और दण्ड के द्वारा दबाना चाहिए । विद्रोहियों के मित्रवेष में रहने वाले गुप्तचर उनसे कहें 'आपको समझ लेना चाहिए कि यह राजा आप लोगों को दूसरे लोगों के द्वारा गिरफ्तार कराना चाहता है । इसलिए आप लोगों को उचित है कि इस राजा से विग्रह कर दें ।' अथवा षड्यन्त्रकारी के पास किसी बहाने से जाकर छद्मवेष गुप्तचर शस्त्र या विष आदि के द्वारा उसको मार डालें । उसके बाद गुप्तचर इस बात का प्रचार करे कि उपजापिताओं को प्रतिजापिताओं ने मारा है, जिससे कि उनमें परस्पर अविश्वास पैदा हो जाय ।
( २ ) इसी प्रकार भीतरी लोगों के साथ षड्यंत्र रचनेवाले भीतरी लोगों में भी आवश्यकतानुसार साम आदि उपायों का प्रयोग किया जाय । अवस्था को देखते हुए उन पर संतोष के सूचक, पर वस्तुतः असंतोषप्रद साम का अथवा असंतोष के सूचक, पर वस्तुतः संतोषजनक साम का प्रयोग किया जाय ।
( ३ ) शौच या सामर्थ्य के बहाने, तथा बंधु-वियोग आदि के दुःखमय अवसर पर या पुत्रोत्सव आदि के सुखमय अवसर पर वस्त्र तथा आभरण के द्वारा किया गया सत्कार ही दान के प्रयोग का तरीका कहलाता है ।
( ४ ) अथवा बनावटी मित्र बने हुए खुफिया लोग उन आभ्यंतर षड्यंत्रकारियों से कहें 'तुम्हारे हृदयस्थ भावों को जानने के लिए धन देकर राजा तुम्हारी परीक्षा