कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| प्रकरण १४४ | दूष्यशत्रुसंयुक्ताः |
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| अध्याय ६ |
(१) दूष्येभ्यः शत्रुभ्यश्च द्विविधाः शुद्धाः ।
(२) दूष्यशुद्धायां पौरेषु जानपदेषु वा दण्डवर्जनुपायान् प्रयुञ्जीत । दण्डो महाजने क्षेप्तुमशक्यः, क्षिप्तो वा तं चार्थं न कुर्यात् । अन्यं चानर्थ-मुत्पादयेत् । मुख्येषु त्वेषां दाण्डकर्मिकवच्चेष्टेतेति ।
(३) शत्रुशुद्धायां यतः शत्रुः प्रधानः कार्यो वा, ततः सामादिभिः सिद्धिं लिप्सेत ।
(४) स्वामिन्यायत्ता प्रधानसिद्धिः, मन्त्रिष्वायत्तायत्तसिद्धिः, उभया-यत्ता प्रधानायत्तसिद्धिः ।
राजद्रोही और शत्रुजन्य आपत्तियाँ
( १ ) राजद्रोहियों और शत्रुओं द्वारा उत्पन्न दो प्रकार की आपत्तियाँ हैं एक दूष्यशुद्धा और दूसरी शत्रुशुद्धा ।
( २ ) दूष्यशुद्धा आपत्तियों के प्रतीकार के लिए नगरनिवासियों को तथा जनपद निवासियों को, राजद्रोहियों पर, दण्ड को छोड़ कर बाकी सभी साम, दान, भेद आदि उपायों का प्रयोग करना चाहिए; क्योंकि बड़े आदमियों पर सहसा दण्ड का प्रयोग कर देना असंभव हुआ करता है । यदि उन पर दण्ड का प्रयोग किया भी जाय तो उससे अभीष्ट की सिद्धि नहीं हो पाती, वरन् उससे कुछ दूसरा ही अनर्थ हो जाता है । इस प्रकार यदि साम आदि उपायों द्वारा उन प्रमुख राजद्रोहियों को शांत न किया जा सके तो उन पर दाण्डकर्मिक प्रकरण में निर्दिष्ट नियमों के अनुसार उपांशु-दण्ड का प्रयोग किया जाय ।
( ३ ) शत्रुशुद्धा अर्थात् शत्रुद्वारा उत्पन्न की गई किसी भी प्रकारकी आपत्ति को दूर करने के लिए उन सामंतों पर साम आदि उपायों का प्रयोग किया जाय, शत्रु-मंत्री या अमात्य आदि जिनके अधीन हों ।
( ४ ) मंत्री द्वारा उत्पन्न की गई आपत्ति का प्रतीकार स्वयं राजा को ही करना चाहिए । आयत्तसिद्धि अर्थात् कार्य शब्द से कहे गये अमात्य आदि की आपत्ति का प्रतीकार मंत्रियों द्वारा की जानी चाहिए । इसी प्रकार मंत्री और अमात्य, दोनों के द्वारा की गई आपत्ति का प्रतीकार राजा और मंत्री को करना चाहिए ।