कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६१८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ नौवां अधिकरण
(१) दूष्यादूष्याणामामिश्रितत्वादा मिश्रा । आमिश्रायामदूष्यतः सिद्धिः । आलम्बनाभावे ह्यालम्बिता न विद्यते । मित्रामित्राणामेकीभावात्परमिश्रा । परमिश्रायां मित्रतः सिद्धिः । सुकरो हि मित्रेण सन्धिर्नामित्रेणेति ।
(२) मित्रं चेन्न सन्धिमिच्छेद्भीक्ष्णमुपजपेत्, ततः सत्रिभिरमित्राद्भेद-यित्वा मित्रं लभेत । मित्रामित्रसङ्घस्य वा योऽन्तस्थायी तं लभेत । अन्त-स्थायिनि लब्धे मध्यस्थायिनो भिद्यन्ते । मध्यस्थायिनं वा लभेत । मध्य-स्थायिनि वा लब्धे नान्तस्थायिनः संहन्यन्ते । यथा चैषामाश्रयभेदस्तानु-पायान्प्रयुञ्जीत ।
(३) धार्मिकं जातिकुलश्रुतवृत्तस्तवेन सम्बन्धेन पूर्वेषां त्रैकाल्योपका-रानपकाराभ्यां वा सान्त्वयेत् ।
(४) निवृत्तोत्साहं विग्रहश्रान्तं प्रतिहतोपायं क्षयव्ययाभ्यां प्रवासेन
( १ ) दूष्य और अदूष्य, दोनों के द्वारा उत्पन्न की गई आपत्ति को आमिश्र या मिश्रित कहते हैं । आमिश्र आपत्ति का प्रतीकार करने के लिए अदूष्य को ही साम आदि उपायों के द्वारा अनुकूल बनाना चाहिए, क्योंकि अदूष्यों ( राजभक्तों ) का सहारा लेकर ही दूष्य ( राजद्रोही ) आपत्तिजनक होता है । उनका सहारा न पाकर दूष्य अपने आप शांत हो जाता है । मित्र और शत्रु, इन दोनों के द्वारा उत्पन्न की गई आपत्ति को परमिश्र या शत्रुमिश्र कहते हैं । परमिश्र आपत्ति में शत्रु के द्वारा ही सिद्धि प्राप्त की जा सकती है; क्योंकि मित्र के साथ संधि हो जाना सरल होता है और शत्रु के साथ इस तरह संधि होना कठिन रहता है ।
( २ ) मित्र यदि संधि करने के लिए राजी न हो तो बार-बार उसे शत्रु से भिन्न करने का उपाय करना चाहिए । सत्री आदि गुप्तचरों के द्वारा भेद डलवाकर मित्र को अपनी ओर करना चाहिए । मित्र और शत्रु संधि के अंत में रहने वाले सामंत को अपनी ओर मिलाना चाहिए; क्योंकि अंत में रहने वाले सामंत के वश में हो जाने पर मध्यस्थ राजा अपने आप फूट जाते हैं । अथवा मध्यस्थ सामंत को ही अपने वश में कर लेना चाहिए; क्योंकि उसको वश में कर लेने पर अंत में रहने वाले राजा आपस में नहीं मिल पाते हैं । अथवा जिस उपाय से भी शत्रु और मित्र अपने शक्ति-शाली आश्रयदाता से भिन्न रह सकें वैसा उपाय करना चाहिए ।
( ३ ) जाति, कुल, श्रुत ( शास्त्र-ज्ञान ) और वृत्त ( सदाचार ) आदि के स्तुति वचनों से तथा उनके कुलवृद्धों का सदा उपकार या अनपकार के द्वारा धार्मिक राजा को शांत करना चाहिए ।
( ४ ) उत्साहहीन, युद्धविमुख, निष्फल उपाय, क्षय, व्यय और प्रवास से संतप्त,