भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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प्र० १४४ : अं० ६ ] दूष्य और शत्रु-जन्य आपत्तियाँ ६१९

चोपतप्तं शौचेनान्यं लिप्समानमन्यस्माद्वा शङ्कमानं मैत्रीप्रधानं वा कल्याण-बुद्धिं साम्ना साधयेत् ।
(१) लुब्धं क्षीणं वा तपस्विमुख्यावस्थापनापूर्वं दानेन साधयेत् ।
(२) तत् पञ्चविधम्—देयविसर्गो, गृहीतानुवर्तनम्, आत्तप्रतिदानम्, स्वद्रव्यदानमपूर्वम्, परस्वेषु स्वयंग्राहदानं चेति दानकर्म ।
(३) परस्परद्वेषवैरभूमिहरणशङ्कितमतोऽन्यतमेन भेदयेत् । भीरुं वा प्रतिघातेन, 'कृतसन्धिरेश त्वयि कर्म करिष्यति, मित्रमस्य निसृष्टं; सन्धौ वा नाभ्यन्तर' इति ।
(४) यस्य वा स्वदेशादन्यदेशाद्वा पण्यानि पण्यागारतयागच्छेयुः, तान्यस्य 'यातव्याल्लब्धानि' इति सत्रिणश्चारयेयुः । बहुलीभूते शासनमभिव्यक्तेन प्रेषयेत्—'एतत्ते पण्यं, पण्यागारं वा मया ते प्रेषितं, सामवायि-

ईमानदारी से किसी दूसरे राजा को अपना मित्र बनाने को इच्छुक, दूसरे पर विश्वास न करने वाले और सबके साथ मित्र-भाव का व्यवहार करने वाले कल्याणबुद्धि राजा को साम उपाय के द्वारा ही शांत करना चाहिए ।

( १ ) लोभी अथवा निर्धन राजा को तपस्वी और अन्य प्रतिष्ठित व्यक्तियों को जामिन बनाकर दान के द्वारा वश में करना चाहिए ।

( २ ) वह दान पाँच प्रकार का होता है १. देयविसर्ग ( ग्रहण की हुई भूमि में ब्राह्मण आदि के लिए छोड़ा गया कुछ भाग ) २. गृहीतानुवर्तन ( पूर्वजों द्वारा गृहीत भूमियोग के लिए प्रतिषेध न करना ) ३. आत्त प्रतिदान ( गृहीत भूमि को फिर वापस दे देना ) ४. नये सिरे से स्वयं ही देना और ५. शत्रुदेश से लूटे हुए धन को लूटने वालों को ही दे देना ।

( ३ ) जो राजा आपसी द्वेष, वैर रखता हो तथा जिसके प्रति भूमि का अपहरण करने की आशंका हो उसे इन्हीं द्वेष्य आदि किसी एक के द्वारा भिन्न कर देना चाहिए । भीरु राजा को प्राणघात का भय देकर भिन्न कर देना चाहिए; अथवा यह कह कर उसको अलग कर देना चाहिए कि इस समय तो बलवान् राजा तुमसे संधि कर लेगा पर बाद में तुम्हीं पर आक्रमण कर देगा । क्योंकि संधि करने के लिए विजिगीषु के पास भी उसने अपना आदमी भेज दिया है । अथवा यह कह कर अलग कर दे कि शत्रु तथा मित्र के साथ संधि करते समय उसने तुम्हारा बहिष्कार कर दिया था ।'

( ४ ) अपने देश या शत्रु के देश से बाजार में बिकने के लिए यदि कोई चीज आये तो सत्री गुप्तचर उसके संबंध में यह अफवाह उड़ा दें कि यह सामान छिपे तौर पर संधि करने की इच्छा रखने वाले यातव्य से आया है । जब यह अफवाह सर्वत्र फैल जाय तब वध के लिए निश्चित पुरुष ( अभिव्यक्त ) के हाथ एक जाली पत्र