कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्र० १४५-१४६ : अ० ७] अर्थानर्थ-संशय-विचार ६२९
(१) इतोनर्थ इतरतोऽर्थसंशय इत्युभयतोऽनर्थार्थसंशया । तस्यां पूर्वमनर्थं साधयेत्, तत्सिद्धावर्थसंशयम् । (२) एतया समन्ततोऽनर्थार्थसंशया व्याख्याता । (३) इतोऽर्थ इतरतोऽनर्थसंशय इत्युभयतोऽर्थानर्थसंशयापत् । (४) एतया समन्ततोऽर्थानर्थसंशया व्याख्याता । (५) तस्यां पूर्वा पूर्वा प्रकृतीनामनर्थसंशयान्मोक्षयितुं यतेत । श्रेयो हि मित्रमनर्थसंशये तिष्ठन्न दण्डः, दण्डो वा न कोश इति । (६) समग्रमोक्षणाभावे प्रकृतीनामवयवान्मोक्षयितुं यतेत । तत्र पुरुषप्रकृतीनां च बहुलमनुरक्त वा तीक्ष्णलुब्धवज्र्जम् । द्रव्यप्रकृतीनां सारं महोपकारं वा । सन्धिनाऽऽसनेन द्वैधीभावेन वा लघूनि विपर्ययैर्गुरूनि ।
(१) एक ओर से अनर्थ का होना और दूसरी ओर से अर्थ में संशय का होना उभयतः अनर्थार्थसंशयापद् कहलाता है । इस आपत्ति में पहले अनर्थ का और बाद में अर्थसंशय का प्रतीकार करना चाहिए ।
(२) इसी प्रकार समंततः अनर्थार्थसंशयापद् के सम्बन्ध में भी समझना चाहिए ।
(३) एक ओर से अर्थ और दूसरी ओर से अनर्थ का संशय होने पर उभयतः अर्थानर्थ-संशयापद् कहलाता है ।
(४) इसी के समान समंततः अर्थानर्थ-संशयापद् भी समझना चाहिए ।
(५) इन विपत्तियों में पहले अनर्थसंशय को हटाकर फिर अर्थ के लिए यत्न करना चाहिए । स्वामी, अमात्य, जनपद, दुर्ग, कोष, दण्ड और मित्र, इन प्रकृतियों में उत्तर-उत्तर की अपेक्षा पूर्व-पूर्व प्रकृति के अनर्थ का प्रतीकार करना चाहिए । मित्र की ओर से यदि अनर्थसंशय हो तो वह सेना की ओर से होने वाले अनर्थसंशय की अपेक्षा सुकर है, क्योंकि मित्र सेना की अपेक्षा अधिक कष्टकर नहीं होता है । इसी प्रकार सेना की ओर से होने वाला अनर्थसंशय, कोष से होने वाले अनर्थसंशय की अपेक्षा अधिक कष्टकर नहीं है । इसलिए कोष से होने वाले अर्थसंशय का ही पहिले प्रतीकार करना चाहिए ।
(६) यदि समग्र प्रकृतियों का अनर्थसंशय एक बार ही दूर न किया जा सके तो उनमें से कुछ का ही अनर्थसंशय दूर किया जाय । ऐसी स्थिति में पुरुष प्रकृतियों में से तीक्ष्ण और लोभी पुरुषों को छोड़कर पहिले उनके ही अनर्थसंशय का प्रतीकार किया जाय जो बहुसंख्यक होने के साथ-साथ अनुराग भी रखते हैं । द्रव्य प्रकृतियों में से अधिक मूल्यवान् एवं अत्यन्त उपकारक द्रव्यों को ही अनर्थसंशय से मुक्त करना चाहिए । संधि, आसन तथा द्वैधीभाव के द्वारा लघुद्रव्यों को छुड़ाने का और विग्रह तथा संश्रय के द्वारा गुरु द्रव्यों को छुड़ाने का यत्न करना चाहिए ।