भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

पृष्ठ 712, कुल 918 में से

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६२८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ नौवां अधिकरण

(१) इतो लाभ इतरतो लाभ इत्युभयतोऽर्थापद्भवति । तस्यां समन्ततोऽर्थायां च लाभगुणयुक्तमर्थमादातुं यायात् । तुल्ये लाभगुणे प्रधानमासन्नमनतिपातिनम्, ऊनो वा येन भवेत्तमादातुं यायात् । (२) इतोऽनर्थ इतरतोऽनर्थ इत्युभयतोऽनर्थापत् । तस्यां समन्ततोऽनर्थायां च मित्रेभ्यः सिद्धिं लिप्सेत । (३) मित्राभावे प्रकृतीनां लघीयस्यैकतोऽनर्थां साधयेत् । उभयतोऽनर्थां ज्यायस्या । समन्ततोऽनर्थां मूलेन प्रतिकुर्यात् । अशक्ये सर्वमुत्सृज्यापगच्छेत् । दृष्टा हि जीवता पुनरापत्तिः, यथा सुयात्रोदयनाभ्याम् । (४) इतो लाभ इतरतो राज्याभिमर्श इत्युभयतोऽर्थानर्थापद्भवति । तस्यामनर्थसाधको योऽर्थस्तमादातुं यायात्, अन्यथा हि राज्याभिमर्शं वारयेत् । (५) एतया समन्ततोऽर्थानर्थापद्व्याख्याता ।


( १ ) जहाँ पर दोनों से अर्थविषयक आपत्ति प्राप्त हो उसे उभयतः अर्थापद् कहते हैं । उभयतः अर्थापद् और समन्ततः अर्थापद् में से किसी एक में यदि आदेय, प्रत्यादेय आदि लाभ-गुणों से युक्त अर्थ के प्राप्त होने की संभावना हो तो उस अर्थ को प्राप्त करने के लिए अवश्य जाना चाहिए । यदि दोनों ओर लाभगुण समान ही हों तो उनमें जो श्रेष्ठ फल देने वाला हो, या अपने देश के नजदीक हो, या थोड़े ही समय में प्राप्त किया जाने योग्य हो, या जिसके प्राप्त न करने पर अपनी हानि हो, उस अर्थ को लेने के लिए अवश्य जाना चाहिए ।

( २ ) यदि दोनों ओर से अनर्थ की ही उत्पत्ति होती हो तो उसे उभयतः अनर्थापद् कहते हैं । उभयतः अनर्थापद् और समन्ततः अनर्थापद् दोनों में मित्रों द्वारा सफलता प्राप्त करने की चेष्टा करनी चाहिए ।

( ३ ) ऐसी स्थिति में यदि मित्रों से सहायता प्राप्त न हो तो अपनी लघु प्रकृतियों ( साधारण राजकर्मचारी ) द्वारा ही एकतः अनर्थापद् का प्रतीकार किया जा सकता है । इसी प्रकार उभयतः अनर्थापद् का प्रतीकार ज्येष्ठ प्रकृति द्वारा और समन्ततः अनर्थापद् का प्रतीकार राजधानी को छोड़कर किया जा सकता है । यदि इतने पर भी इन आपदाओं को शान्त न किया जा सके तो अपना सर्वस्व त्याग कर चला जाना चाहिए । जीवित रहने पर अपने छोड़े हुए स्थान को पुनः प्राप्त किया जा सकता है, जैसा कि राजा नल और वत्सराज उदयन के जीवनचरित से स्पष्ट है ।

( ४ ) एक ओर से लाभ और दूसरी ओर से अपने राज्य पर आक्रमण किये जाने वाली अर्थ और अनर्थ युक्त स्थिति को उभयतः अर्थ-अनर्थापद् कहते हैं । इन दोनों स्थितियों में यदि अर्थ से अनर्थ का भी प्रतीकार किया जा सके तो अर्थ-प्राप्ति के लिए ही यत्न करना चाहिए, अन्यथा अर्थ को छोड़कर अनर्थ का ही प्रतीकार करना चाहिए ।

( ५ ) इसी प्रकार समन्ततः अर्थानर्थापद् के सम्बन्ध में भी समझना चाहिए ।

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