कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्र० १४५-१४६ : अ० ७ ] अर्थानर्थ-संशय-विचार ६२७
(१) परस्यान्तररुच्छेदनमर्थोऽनर्थानुबन्धः । (२) शत्रुप्रतिवेशस्यानुग्रहः कोशदण्डाभ्यामनर्थोऽर्थानुबन्धः । (३) हीनशक्तिमुत्साह्य निवृत्तिरनर्थो निरनुबन्धः । (४) ज्यायांसमुत्थाप्य निवृत्तिरनर्थोऽनर्थानुबन्धः । (५) तस्य पूर्वः पूर्वः श्रेयानुपसम्प्राप्तुम् । इति कार्यवस्थापनम् । (६) समन्ततो युगपदर्थोत्पत्तिः समन्ततोऽर्थापद्भवति । (७) सैव पाष्णिग्राहविगृहीता समन्ततोऽर्थसंशयापद्भवति । (८) तयोर्मित्राक्रन्दोपग्रहात्सिद्धिः । (९) समन्ततः शत्रुभ्यो भयोत्पत्तिः समन्ततोऽनर्थापद्भवति । (१०) सैव मित्रविगृहीता समन्ततोऽनर्थसंशयापद्भवति । (११) तयोश्चलामित्रान्क्रन्दोपग्रहात्सिद्धिः । परमिश्राप्रतीकारो वा ।
( १ ) शत्रु के अन्तर्द्धि राजा का उच्छेद कर देना अनर्थानुबंध अर्थ है ।
( २ ) कोष और सेना के द्वारा शत्रु के पड़ोसी की सहायता करना अर्थानुबंध अनर्थ कहलाता है ।
( ३ ) हीनशक्ति राजा को सहायता का वचन देकर उसे लड़ने के लिए तैयार कर फिर उसकी मदद न करना निरनुबंध अनर्थ कहलाता है ।
( ४ ) अधिक शक्तिशाली राजा को सहायता का वचन देकर फिर उसकी मदद न करना अनर्थानुबंध अनर्थ कहलाता है ।
( ५ ) उक्त अनुबंध षड्वर्ग में पूर्व-पूर्व का अर्थ अधिक श्रेयस्कर है। यहाँ तक अर्थ-अनर्थ रूप कार्यों का प्रतिपादन किया गया ।
( ६ ) एक साथ चारों ओर से अर्थों की उत्पत्ति होने लगे तो उसको समंततः अर्थापत् कहते हैं ।
( ७ ) यदि उस समंततः अर्थापत् में पाष्णिग्राह द्वारा विरोध किया जाय तो उसको समंततः अर्थसंशयापत् कहते हैं ।
( ८ ) उक्त दोनों प्रकार की आपत्तियों का प्रतीकार मित्र और आक्रंद की सहायता से किया जा सकता है ।
( ९ ) चारों ओर से शत्रुओं द्वारा भय उत्पन्न होना समंततः अनर्थापत् कहलाता है ।
( १० ) यदि उक्त भय में मित्र विघ्न उपस्थित करे तो उसको समंततः अनर्थ-संशयापत् कहते हैं ।
( ११ ) इन दोनों भयों का प्रतीकार चलशत्रु और आक्रंद को अनुकूल बनाकर किया जा सकता है । अथवा नवम अधिकरण में परमिश्रा आपत्ति का जो प्रतीकार बताया गया है उसको भी यहाँ प्रयोग में लाया जाय ।