भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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६२६ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ नौवां अधिकरण

(१) स्वतः परतो वा भयोत्पत्तिरित्यनर्थः । (२) तयोः 'अर्थो न वा' इति, 'अनर्थो न वा' इति, 'अर्थोऽनर्थः' इति, 'अनर्थः अर्थः' इति संशयः । (३) शत्रुमित्रमुत्साहयितुमर्थो न वेति संशयः । शत्रुबलमर्थमानाभ्या-मावाहयितुमनर्थो न वेति संशयः । बलवत्सामन्तानां भूमिमादातुमर्थोऽनर्थः इति संशयः । ज्यायसा सम्भूययानमनर्थोऽर्थः इति संशयः । (४) तेषामर्थसंशयमुगच्छेत् । (५) अर्थोऽर्थानुबन्धः, अर्थो निरनुबन्धः अर्थोऽनर्थानुबन्धः, अनर्थो-ऽर्थानुबन्धः, अनर्थो निरनुबन्धः, अनर्थोऽनर्थानुबन्ध इत्यनुबन्धषड्वर्गः । (६) शत्रुमुत्पाट्य पाष्णिग्राहादानमर्थोऽर्थानुबन्धः । (७) उदासीनस्य दण्डानुग्रहः फलेन अर्थो निरनुबन्धः ।


(१) स्वयं या दूसरे किसी से प्राप्त हुए अर्थ के कारण जो भय की उत्पत्ति होती है, उसको अनर्यरूप आपत्ति कहते हैं ।

(२) १. यह अर्थ है या नहीं ? २. यह अनर्थ है या नहीं ? ३. यह अर्थ है या अनर्थ ? और ४. यह अनर्थ है या अर्थ ? इस प्रकार अर्थ और अनर्थ को लेकर चार प्रकार से उत्पन्न संशयरूप आपत्ति कहलाती है ।

(३) शत्रु के मित्र को शत्रु के साथ ही लड़ाने के लिए तैयार करते समय पहिला संशय होता है । शत्रु की सेना को धन तथा सत्कार के द्वारा बुलाने पर दूसरा संशय होता है । बलवान् सामन्त की भूमि को लेने में तीसरा संशय होता है । बलवान् सामन्त के साथ मिलकर यातव्य पर आक्रमण करने में चौथा संशय होता है ।

(४) इस दृष्टि से विजिगीषु को चाहिए कि उक्त चारों प्रकार के संशयों में जो संशय अर्थ-विषयक हो और अनर्थ के साथ जिसका कत्तई सम्बन्ध न हो, ऐसे संशय के विषय में उद्योग करे ।

(५) प्रत्येक अर्थ और अनर्थ के साथ अनुबन्ध का योग करने तथा न करने से उसके छह भेद होते हैं, जिन्हें अनुबंधषड्वर्ग कहते हैं । उसके भेद इस प्रकार हैं, १. अर्थानुबंध अर्थ, २. निरनुबंध अर्थ, ३. अनर्थानुबंध अर्थ, (ये तीन अर्थ के भेद हैं), और ४. अर्थानुबंध अनर्थ ५. निरनुबंध अनर्थ तथा ६. अनर्थानुबंध अनर्थ (ये तीन अनर्थ के भेद हैं) ।

(६) शत्रु का उच्छेद कर पाष्णिग्राह को भी अपने वश में कर लेना अर्थानुबंध अर्थ कहलाता है ।

(७) उदासीन राजा से धन आदि लेकर उसको सेना की सहायता देना निरनुबंध अर्थ कहलाता है ।