कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
पृष्ठ 709, कुल 918 में से
संदर्भ में पढ़ें| प्रकरण १४५-१४६ | ## अर्थानर्थसंशययुक्ताः तासामुपाय-विकल्पजाः सिद्धयश्च |
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| अध्याय ७ |
(१) कामादिरुत्सेकः स्वाः प्रकृतीः कोपयति, अपनयो बाह्याः। तदुभयमासुरी वृत्तिः। स्वजनविकारः कोपः परवृद्धिहेतुष्वापदर्थोऽनर्थः संशय इति।
(२) योऽर्थः शत्रुवृद्धिमप्राप्तः करोति, प्राप्तः प्रत्यादेयः परेषां भवति, प्राप्यमाणो वा क्षयव्ययोदयो भवति, स भवत्यापदर्थः यथा—सामन्तानामामिषभूतः, सामन्तव्यसनजो लाभः, शत्रुप्रार्थितो वा स्वभावाधिगम्यो लाभः, पश्चात्कोपेन पाणिग्राहेण वा विगृहीतः पुरस्ताल्लाभः, मित्रोच्छेदनेन सन्धिव्यतिक्रमेण वा मण्डलविरुद्धो लाभ इत्यापदर्थः।
अर्थ, अनर्थ तथा संशय संबंधी आपत्तियाँ और उनके प्रतीकार के उपायों से प्राप्त होने वाली सिद्धियाँ
( १ ) काम, क्रोधादि दोषों के बढ़ जाने पर राजा की अपनी ही प्रकृतियाँ कुपित हो जाया करती हैं। अपनय अर्थात् नीतिभ्रष्ट हो जाने से परराष्ट्र संबंधी बाह्य प्रकृतियाँ कुपित हो जाती हैं। इसलिए कामक्रोधादि दोषों और अपनय, इन दोनों को आसुरी वृत्ति कहा गया है। अपनी प्रकृतियों का कोप शत्रु की उन्नति के अवसर पर आपत्ति का रूप धारण कर लेता है, जो कि अर्थ, अनर्थ और संशय, इन तीनों रूपों में प्रकट होता है।
( २ ) जो अर्थ अपनी लापरवाही से गँवाया हुआ शत्रु की वृद्धि करता है; जो अर्थ अपने हाथ में आ जाने पर भी दूसरों को लौटाया जाता है; और इसी प्रकार जो अर्थ प्राप्त होने पर भी क्षय-व्यय करने वाला होता है, उसे आपदर्थ; अर्थात्, अर्थरूप आपत्ति कहते हैं। जैसे : अनेक सामंतों द्वारा भोगी जाने योग्य वस्तु एक ही सामंत को मिल जाय, तो वह अन्य सामंतों के द्वारा मिलकर लौटाये जाने के कारण आपत्ति-जनक हो जाती है, इसी प्रकार व्यसन-पीड़ित सामन्त से छीना हुआ लाभ, स्वभावतः प्राप्त होने योग्य शत्रु से मांगा हुआ लाभ, पश्चात्कोप तथा पाणिग्राह के द्वारा बाधा पहुँचाये जाने पर यातव्य राजा से प्राप्त हुआ लाभ, मित्र का उच्छेदन करने तथा संधि को उल्लंघन करने के कारण, राजमण्डल की इच्छा के विरुद्ध प्राप्त हुआ लाभ—ये सब ही आपदर्थ हैं।
४० कौ०