भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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६२४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ नौवां अधिकरण

(१) वितंसगिलवच्चारीन् योगैराचरितैः शठः।
घातयेत्परमिश्रायां विश्वासेनामिषेण च॥

इति अभियास्यत्कर्मणि नवमेऽधिकरणे दूष्यशत्रुसंयुक्ताः नाम षष्ठोऽध्यायः;
आदित सप्तविंशत्युत्तरशततमः।

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भैंसों तथा द्रव्यवनों या हस्तिवनों को नष्ट-भ्रष्ट करवा दे; अथवा रक्षा करने वाली सेना को ही नष्ट करवा दे; और परस्पर अलग किये गये जातिसंघ इन मित्र या शत्रु के प्रमादस्थानों पर बराबर प्रहार करते रहें। इसी प्रकार अन्य तीक्ष्ण, रसद आदि गुप्तचर भी अग्नि, विष आदि के द्वारा प्रहार करते रहें।

( १ ) परमिश्र ( मित्र और शत्रु द्वारा उत्पन्न की गई आपत्ति में ), शठ, विजिगीषु, वितंस ( पक्षियों के ठगने के लिए चित्र-विचित्र रंगोंवाला शरीर को ढकने वाला वस्त्र ), और गिल ( खाने योग्य मांस ) आदि के समान प्रयुक्त किए गए कपट उपायों के द्वारा, अपने ऊपर विश्वास पैदा कराके तथा कुछ सारवस्तु देकर, अपने शत्रुओं को वश में करना चाहिए।

इति अभियास्यत्कर्म नामक नौवें अधिकरण में दूष्यशत्रुसंयुक्त नामक छठा अध्याय समाप्त

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