भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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प्र० १४४ : अ० ६ ] दूष्य और शत्रु-जन्य आपत्तियाँ ६२३

(१) इत्यभियुञ्जानेषूक्तम् । स्वभूमिष्ठेषु तु त एवोपायाः । विशेषस्तु । स्वभूमिष्ठानामन्यतमस्य पण्यागारैरभिज्ञातान्दूतमुख्यानभीक्ष्णं प्रेषयेत्, त एनं सन्धौ परहिंसायां वा योजयेयुः, अप्रतिपद्यमानं कृतो नः सन्धिः इत्यावेद्येयुः । तमितरेषामुभयवेतनाः सङ्क्रामयेयुः—अयं वो राजा दुष्टः इति । (२) यस्य वा यस्माद्भयं वैरं द्वेषो वा, तं तस्माद्भेद्येयुः—'अयं ते शत्रुणात सन्धत्ते, पुरा त्वामतिसन्धत्ते, क्षिप्रतरं सन्धीयस्व, निग्रहे चास्य प्रयतस्व' इति । (३) आवाहविवाहाभ्यां वा कृत्वा संयोगमसंयुक्तानभेदयेत् । (४) सामन्ताटविकतत्कुलीनावरुद्धैश्चैषां राज्यं निघातयेत् । सार्थव्रजाटवीर्वा । दण्डं वाभिसृतम् । परस्परापाश्रयाश्चैषां जातिसङ्घांश्छिद्रेषु प्रहरेयुः । गूढाश्चाग्निरसशस्त्रेण ।


( १ ) आक्रमणकारी शत्रु तथा मित्र आदि सामवायिकों को भी इन्हीं उपायों के द्वारा शांत किया जा सकता है । इन पर तभी उक्त उपायों का प्रयोग किया जाय, जब तक कि आक्रमण के लिए प्रस्थान न करके अपनी ही भूमि में स्थित हों । उनके संबंध में विशेष बात यह है कि आक्रमण करने से पूर्व जब वे अपनी ही भूमि में वर्तमान हों उस समय अच्छी जानकारी रखनेवाले दूत-मुख्य उनमें से किसी एक के पास मणि-मुक्ता लेकर जायें और उसको अपने साथ सन्धि करने या दूसरे को मारने के लिए राजी करें । यदि वह सन्धि करना स्वीकार न भी करे तब भी दूतमुख्य यह अफवाह फैला दे कि अमुक राजा ने हमारे साथ सन्धि कर ली है । उस अफवाह को उभयवेतनभोगी व्यक्ति दूसरे मित्र राजाओं अथवा शत्रु-राजाओं तक पहुँचा दें; और कहें; कि 'अमुक राजा बड़ा दुष्ट है । उसने आप से कुछ न कह कर विजिगीषु राजा से चुपचाप सन्धि कर ली है ।'

( २ ) इस प्रकार गुप्तचर जिस राजा से शत्रुता, द्वेष या भय की आशंका रखते हों उसको अन्य राजाओं से भिन्न कर दे; बल्कि उनसे यह कहे कि 'देखो, यह राजा आपके शत्रु से संधि करता है । बाद में यह तुम्हें भी दबा लेगा । इसलिए आप जल्दी से अपने शत्रु विजिगीषु से संधि कर लें और इस अपने धोखेबाज मित्र को काबू में करने का प्रबंध करें ।

( ३ ) अवाह ( कन्या स्वीकार करना ) अथवा विवाह ( कन्यादान करना ) आदि के द्वारा संबंध जोड़कर ऐसे संबंधरहित दूसरे राजाओं में फूट उत्पन्न करना चाहिए ।

( ४ ) विजिगीषु को चाहिए कि वह सामंत, आटविक या उनके मित्रों अथवा उनके शत्रुओं के कुल में पैदा हुए अवरुद्ध राजकुमारों के द्वारा उनके राज्य को हानि पहुँचाने का यत्न सोचे । अथवा उनके व्यापार-भार को ढोने वाले पशुओं, दूसरे गाय-