भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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पृष्ठ 706

६२२ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ नौवां अधिकरण

(१) भिन्नेष्वन्यतमं लभेत । (२) तेन सेनापतिकुमारदण्डचारिणो व्याख्याताः । (३) साङ्घिकं च भेदं प्रयुञ्जीत । इति भेदकर्म । (४) तीक्ष्णमुत्साहिनं व्यसनिनं स्थितशत्रुं वा गूढपुरुषाः शस्त्राग्निरसादिभिः साधयेयुः । सौकर्यतो वा तेषामन्यतमः । तीक्ष्णो ह्येकः शस्त्ररसाग्निभिः साधयेत् । अयं सर्वसन्दोहकर्म विशिष्टं वा करोति । इत्युपायचतुर्वर्गः । (५) पूर्वः पूर्वश्चास्य लघिष्ठः । सान्त्वमेकगुणम् । दानं द्विगुणं सान्त्वपूर्वम् । भेदस्त्रिगुणः सान्त्वदानपूर्वः । दण्डश्चतुर्गुणः सान्त्वदानभेदपूर्वः ।


मारनेवालों में जिस सामवायिक राजा का नाम लिया जाय उसके पास एक बनावटी पत्र भेजा जाय, जिसका मजमून इस प्रकार हो 'इसी प्रकार तुम दूसरे सामवायिक राजाओं का नुकसान करते रहो । उसके बाद तुम्हें बाकी धन दे दिया जायेगा ।' उस पत्र को उभयवेतनभोगी गुप्तचर सामवायिक राजाओं तक पहुँचा दें । इस प्रकार सामवायिक राजाओं के बीच फूट डालने का यत्न किया जाय ।

( १ ) इस प्रकार जब सामवायिक राजाओं में फूट पड़ जाय तो उनमें से किसी एक राजा को अपने वश में कर लेना चाहिए ।

( २ ) भेद डालने के लिए जो उपाय सामवायिक राजाओं के संबंध में ऊपर बताये गये हैं वही उपाय सेनापति, युवराज तथा अन्य सैनिक अधिकारियों के लिए भी उपयोग में लाने चाहिए ।

( ३ ) संघवृत्त प्रकरण में निरूपित उपायों का आवश्यकतानुसार, यहाँ भी प्रयोग किया जा सकता है । यहाँ तक भेद-कार्यों का निरूपण किया गया ।

( ४ ) असहनशील, उत्साही, व्यसनी तथा दुर्ग-संपन्न शक्तिशाली शत्रु को गुप्तचर मिलकर शस्त्र, अग्नि तथा विष के प्रयोगों द्वारा मार डालें । अथवा उनमें से कोई एक ही समर्थ गुप्तचर ऐसे शत्रुओं को मार डाले; क्योंकि एक ही गुप्तचर पूर्वोक्त अनेक प्रकार के उपायों द्वारा सब प्रकार के शत्रुओं को अकेले ही मार सकता है । इस प्रकार का एक गुप्तचर वह कार्य कर सकता है, जो अनेक गुप्तचर मिलकर भी नहीं कर पाते हैं। यहाँ तक साम, दान, भेद और दण्ड, इस चतुर्वर्ग का निरूपण किया गया ।

( ५ ) उक्त चारों उपायों में पूर्व-पूर्व उपाय लघु होते हैं । साम में एक ही गुण होता है; दान में दो गुण होते हैं क्योंकि 'सान्त्वना' और 'देना', इसके दो अवयव हैं । भेद में तीन गुण होते हैं; क्योंकि 'साम', 'दान' और 'भेद', उसके तीन अंग हैं । इसी प्रकार दण्ड के चार अवयव होते हैं; तीन पहिले के और एक वह स्वयं ।