भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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पृष्ठ 715

प्र० १४५-१४६ : अ० ७ ] अर्थानर्थ-संशय विचार ६३१

(१) अर्थो धर्मः काम इत्यर्थत्रिवर्गः । तस्य पूर्वः पूर्वः श्रेयानुपसम्प्राप्तुम् । (२) अनर्थोऽधर्मः शोक इत्यनर्थत्रिवर्गः । तस्य पूर्वः पूर्वः श्रेयान् प्रतिकर्तुम् । (३) अर्थोऽनर्थ इति, धर्मोऽधर्म इति, कामः शोक इति संशयत्रिवर्गः । तस्योत्तरपक्षसिद्धौ पूर्वपक्षः श्रेयानुपसंप्राप्तुम् । (४) इति कालावस्थापनम् । इत्यापदः । (५) तासां सिद्धिः पुत्रभ्रातृबन्धुषु सामदानाभ्यां सिद्धिरनुरूपा, पौरजानपददण्डमुख्येषु दानभेदाभ्यां, सामन्ताटविकेषु भेददण्डाभ्याम् । (६) एषाऽनुलोमा विपर्यये प्रतिलोमा । मित्रामित्रेषु व्यामिश्रा सिद्धिः । परस्परसाधका ह्युपायाः ।


समय यात्रा के मध्य में और अन्त में होने वाले अनर्थ तथा संशय का प्रतीकार करना ही श्रेयस्कर होता है, क्योंकि प्रधान राजा उस समय नेतृत्व में ही फँसे रहते हैं और अप्रधान राजा प्रतिबन्धरहित होने के कारण कहीं भी जा सकता है ।

( १ ) अर्थ, धर्म और काम, इनको अर्थत्रिवर्ग कहा जाता है । इस अर्थत्रिवर्ग में पूर्व-पूर्व का ग्रहण करना अधिक श्रेयस्कर है ।

( २ ) अनर्थ, अधर्म और शोक, इनको अनर्थत्रिवर्ग कहा जाता है । इस अनर्थ-त्रिवर्ग में पूर्व-पूर्व का प्रतीकार करना अधिक कल्याणप्रद है ।

( ३ ) अर्थ-अनर्थ, धर्म-अधर्म और काम-शोक इनमें परस्पर संशय का होना संशयत्रिवर्ग कहा जाता है । इस संशयत्रिवर्ग में अनर्थ, अधर्म और शोक का प्रतीकार होने पर अर्थ, धर्म और काम का ग्रहण करना अधिक श्रेयस्कर है ।

( ४ ) यहाँ तक यात्राकाल के आदि, मध्य तथा अन्त आदि के अर्थों एवं अनर्थों की व्याख्या और अर्थ, अनर्थ तथा संशययुक्त सभी प्रकार की विपत्तियों का निरूपण किया गया ।

( ५ ) पुत्र, भाई और बन्धु-बांधवों के संबन्ध में साम तथा दान के अनुरूप प्रतीकार करना ही उचित समझा गया है । इसी प्रकार नागरिकों, जनपदवासियों, सैनिकों और राष्ट्र के प्रमुख व्यक्तियों के विषय में दान तथा भेद उपायों का प्रयोग करना ही उचित है । सामंत और आटविकों के संबंध में भेद तथा दण्ड के उपायों का प्रयोग करना उचित है ।

( ६ ) इस रीति से किया गया प्रतीकार अनुलोम कहलाता है और इसके विपरीत होने पर वह प्रतिलोम कहा जाता है । मित्र तथा शत्रुओं के विषय में आवश्यकतानुसार मिले-जुले ( व्यामिश्र ) उपायों द्वारा प्रतीकार करना चाहिए; क्योंकि सभी उपाय परस्पर एक-दूसरे के सहायक ही होते हैं ।

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