कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६३२ | कौटिल्य का अर्थशास्त्र | [ नौवां अधिकरण
(१) शत्रोः शङ्कितामात्येषु सान्त्वं प्रयुक्तं शेषप्रयोगं निवर्तयति । दूष्यामात्येषु दानम् । संघातेषु भेदः । शक्तिमत्सु दण्ड इति । (२) गुरुलाघवयोगाच्चापदां नियोगविकल्पसमुच्चया भवन्ति । (३) 'अनेनैवोपायेन नान्येन' इति नियोगः । (४) 'अनेन वाऽन्येन वा' इति विकल्पः । (५) 'अनेनान्येन च' इति समुच्चयः । (६) तेषामेकयोगाश्चत्वारस्त्रियोगाश्च, द्वियोगाः षट्, एकश्चतुर्योग इति पञ्चदशोपायाः । तावन्तः प्रतिलोमाः । (७) तेषामेकेनोपायेन सिद्धिरेकसिद्धिः, द्वाभ्यां द्विसिद्धिः, त्रिभिस्त्रिसिद्धिः, चतुर्भिश्चतुःसिद्धिरिति ।
( १ ) अपने जिन अमात्यों पर शत्रु संदेह करता है उन पर किया गया साम प्रयोग अन्य सभी उपायों का निवारण कर देता है। इसी प्रकार शत्रु के दूष्य अमात्यों में दान, आपस में मिले हुए अमात्यों में भेद और शक्तिमान्-अमात्यों में दण्ड का प्रयोग, शेष सभी उपायों को निवृत्त कर देता है ।
( २ ) छोटी-बड़ी आपत्तियों के अनुसार ही उपायों के नियोग, विकल्प और समुच्चय हुआ करते हैं ।
( ३ ) केवल इसी उपाय से कार्यसिद्धि हो सकेगी, दूसरे से नहीं, इसी का नाम नियोग है ।
( ४ ) इस उपाय से कार्यसिद्धि होगी या दूसरे उपाय से इसका नाम विकल्प है ।
( ५ ) इस उपाय को तथा दूसरे उपाय को मिलाकर कार्यसिद्धि होगी, इसका नाम समुच्चय है ।
( ६ ) साम आदि चारों उपायों को अलग-अलग, दो-दो, तीन-तीन या चार-चार एक साथ मिलाकर पंद्रह तरह से प्रयोग में लाया जा सकता है । जैसे—सामदानभेद, सामदानदण्ड, सामभेददण्ड और दानभेददण्ड—ये चार; केवल साम, केवल दान, केवल भेद और केवल दण्ड—ये चार; सामदान, सामभेद, सामदण्ड, दानभेद, दानदण्ड और भेददण्ड—ये छः और सामदानदण्डभेद, इन चारों को मिलाकर एक; इस प्रकार ( ४+४+६+१ ) पंद्रह प्रयोग होते हैं । पंद्रह प्रकार के प्रतिलोम उपाय भी होते हैं; जैसे—दण्ड, भेद, दान, साम—ये चार; दण्डभेददान, दण्डभेदसाम, भेददानसाम, दण्डदानसाम—ये चार; दण्डभेद, दण्डदान, दण्डसाम, भेददान, भेदसाम, दानसाम—ये छह और दण्ड आदि चारों एक साथ मिलाकर पंद्रह प्रतिलोम उपाय होते हैं ।
( ७ ) उक्त उपायों में से एक ही उपाय के द्वारा जो कार्यसिद्धि होती है उसे