कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
पृष्ठ 717, कुल 918 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्र० १४५-१४६ : अ० ७] अर्थानर्थ-संशय-विचार ६३३
(१) धर्ममूलत्वात्कामफलत्वाच्चार्थस्य धर्मार्थकामानुबन्धा याऽर्थस्य सिद्धिः सा सर्वार्थसिद्धिः ।
(२) इति सिद्धयः ।
(३) दैवादग्निरुदकं व्याधिः प्रमारो विद्रवो दुर्भिक्षमासुरी सृष्टिः इत्यापदः ।
(४) तासां दैवतब्राह्मणप्रणिपातः सिद्धिः ।
(५) अवृष्टिरतिवृष्टिर्वा सृष्टिर्वा याऽऽसुरी भवेत् ।
तस्यामाथर्वणं कर्म सिद्धारम्भाश्च सिद्धयः ॥
इति अभियास्यत्कर्मणि नवमेऽधिकरणे अर्थानर्थसंशययुक्तास्तासामुपायविकल्पजाः सिद्धयश्चेति सप्तमोऽध्यायः; आदितः सप्तविंशत्युत्तरशततमः ।
समाप्तमिदमभियास्यत्कर्म नाम नवममधिकरणम् ।
—: ० :—
एकसिद्धि कहते हैं । इसी प्रकार दो उपायों से हुई सिद्धि को द्विसिद्धि तीन उपायों से हुई सिद्धि को त्रिसिद्धि और चार उपायों से हुई सिद्धि को चतुःसिद्धि कहते हैं ।
(१) इन सिद्धियों से प्रतीकारस्वरूप होने वाले अनेक लाभों में से धर्म, काम और अर्थ का साधक होने के कारण अर्थ-लाभ ही सर्वश्रेष्ठ होता है, उसी को सर्वार्थ-सिद्धि के नाम ले कहा जाता है ।
(२) यहाँ तक मानुषी आपत्तियों को लेकर सिद्धियों का निरूपण किया गया ।
(३) अग्नि, जल, व्याधि, महामारी, राष्ट्रविप्लव, दुर्भिक्ष और आसुरी सृष्टि ये सब दैवी आपत्तियाँ हैं ।
(४) इन दैवी आपत्तियों का प्रतीकार देवता और ब्राह्मणों को अभिवादन करने से किया जा सकता है ।
(५) अनावृष्टि, अतिवृष्टि अथवा आसुरी सृष्टि आदि के कारण जो आपत्तियाँ उत्पन्न हों उनके प्रतीकारार्थ अथर्ववेद में निरूपित शान्तिकर्मों के अनुष्ठान द्वारा किया जाना चाहिए । सिद्ध, तपस्वी, महात्मा पुरुषों द्वारा आरम्भ किये गये शान्तिकर्मों द्वारा भी इन आपत्तियों का प्रतीकार समझना चाहिए ।
इति अभियास्यत्कर्म नामक नौवें अधिकरण में अर्थानर्थसंशय विचार नामक सातवाँ अध्याय समाप्त ।
—: ० :—