कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६४२ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दसवाँ अधिकरण
(१) हस्तिस्तम्भसंक्रमसेतुबन्धनौकाष्ठवेणुसंघातैः अलाबुचर्मकरण्ड-दृतिप्लवगण्डिकावेणिकाभिश्चोदकानि तारयेत् । (२) तीर्थाभिग्रहे हस्त्यश्वैरन्यतो रात्रावुत्तार्य सत्रं गृह्णीयात् । (३) अनुदके चक्रिचतुष्पदं चाध्वप्रमाणेने शक्त्योदकं वाहयेत् । (४) दीर्घकान्तारमनुदकं यवसेन्धनोदकहीनं वा कृच्छाध्वानमभियोग-प्रस्कन्नं क्षुत्पिपासाध्वक्लान्तं पङ्कतोयगभीराणां वा नदीदरीशैलानामुच्चा-नापयाने व्यासक्तम् । एकायनमार्गं शैलविषमे सङ्कटे वा बहुलीभूतं निवेशे प्रस्थिते विसन्नाहं भोजनव्यासक्तम् । आयतगतपरिश्रान्तमवसुप्तं व्याधि-मरकदुर्भिक्षपीडितं व्याधितपत्त्यश्वद्विपमभूमिष्ठं वा बलव्यसनेषु वा स्वसैन्यं रक्षेत् । परसैन्यं चाभिहन्यात् ।
अथवा युद्ध के बिना ही शत्रु मेरे अभिप्राय को पूरा कर देगा, तब धीरे-धीरे यात्रा करे । इसके विपरीत अवस्थाओं में शीघ्रता से ही यात्रा करनी चाहिए ।
(१) यात्राकाल में हाथियों, लकड़ी के खंभों; झूलों, पुलों, नौकाओं, लकड़ी तथा बाँस के बेड़ों, तूंबियों, चर्मकाण्डों, चमड़े की तूंबियों, मोमजामा के तकियों, काग की लकड़ी के वेड़ों और मजबूत रस्सियों से सेनाओं को नदी पार उतारा जाय ।
(२) नदी के घाट यदि शत्रु के कब्जे में हों तो हाथी और घोड़ों के द्वारा रात में दूसरी ओर से बिना घाट के ही अपनी सेनाओं को पार उतार कर शत्रु के स्थानों पर कब्जा कर लेना चाहिए ।
(३) जिस प्रदेश से जल न हो वहाँ गाड़ी, बैल आदि चौपायों द्वारा पास में पर्याप्त जल रखकर मार्ग तय किया जाय ।
(४) विजिगीषु को चाहिए कि वह लम्बा रास्ता तय करने वाली तथा जंगलों से होकर सफर करने वाली अपनी सेना की भरसक रक्षा करे । मार्ग में जल न पाने वाली, धान, भूसा, ईंधन, लकड़ी आदि से हीन, कठिन मार्ग में चलनेवाली, लम्बे समय युद्ध में रहने के कारण खिन्न, भूख, प्यास तथा सफर के कारण बेचैन, भारी दलदल, गहरे पानी, नदी, गुफा तथा पर्वत आदि के पार करने एवं चढ़ने-उतरने में संलग्न, तंग रास्ते में, विषम स्थान में या पहाड़ी किलों में एकत्र, लम्बा सफर करने से थकी, नींद लेती हुई, ज्वर, महामारी तथा दुर्भिक्ष से पीडित, बीमार, पैदल-हाथी घोड़ों से युक्त, प्रतिकूल भूमि में ठहरी, सैनिक आपत्तियों से पस्त, आदि जितनी भी कठिनाइयाँ हैं उनमें विजिगीषु को अपनी सेना की रक्षा करनी चाहिए । साथ ही विजिगीषु को चाहिए कि उक्त अवस्थाओं को प्राप्त हुई शत्रु की सेना को नष्ट-भ्रष्ट कर डाले ।