भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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प्र० १४८-१४९ : अ० २ ] छावनी-सम्बन्धी विचार ६४१

(१) पुरस्तादभ्याघाते मकरेण यायात्, पश्चाच्छकटेन, पार्श्वयोर्वज्रेण, समन्ततः सर्वतोभद्रेण, एकायने सूच्या । (२) पथि द्वैधीभावे स्वभूमितो यायात् । अभूमिष्ठानां हि स्वभूमिष्ठा युद्धे प्रतिलोमा भवन्ति । योजनमधमा, अध्यर्धं मध्यमा, द्वियोजनमुत्तमा, संभाव्या वा गतिः । (३) आश्रयकारी, सम्पन्नघाती, पार्ष्णिरासारो मध्यम उदासीनो वा प्रतिकर्त्तव्यः, संकटो मार्गः शोधयितव्यः, कोशो दण्डो मित्रामित्राटवीबलं विष्टिरृतुश्च प्रतीक्ष्याः कृतदुर्गकर्मनिचयरक्षाक्षयः क्रीतबलनिर्वेदो मित्रबलनिर्वेदश्चागमिष्यति, उपजपिलारो वा नातित्वरयन्ति, शत्रुरभिप्रायं वा पूरयिष्यति इति शनैर्यायात् । विपर्यये शीघ्रम् ।


( १ ) यदि सामने की ओर से शत्रु के आक्रमण की आशंका हो तो 'मकराकार व्यूह' की रचना करके शत्रु की ओर बढ़ना चाहिए, यदि आक्रमण की पीछे से संभावना हो तो 'शकटव्यूह' बनाकर आगे बढ़ना चाहिए, यदि अगल-बगल से आक्रमण की संभावना हो तो 'चक्रव्यूह' बनाकर आगे बढ़ना चाहिए, और यदि चारों ओर से आक्रमण की संभावना हो तो 'सर्वतोभद्रव्यूह' बनाकर, यदि मार्ग इतना तंग हो कि उससे एक साथ न जाया जाय तो 'सूचीव्यूह' बनाकर आगे बढ़ना चाहिए ।

( २ ) यदि मार्ग में किसी प्रकार की द्विविधा हो तो उसी मार्ग से प्रस्थान करना चाहिए जिससे चतुरंगिनी सेना आसानी से जा सके, क्योंकि अनुकूल मार्ग से चलने वाले राजा पर प्रतिकूल मार्ग से चलने वाला राजा आक्रमण नहीं कर सकता है । प्रतिदिन एक योजन ( चार कोस ) चलना अधम गति है, डेढ़ योजन चलना मध्यम गति और दो योजन चलना उत्तम गति कहलाती है । अथवा सुविधानुसार प्रतिदिन जितना चला जा सके, उतना चलना चाहिए ।

( ३ ) विजिगीषु जब यह सोचे कि 'अपनी उन्नति के लिए मुझे किसी राजा को अपना आश्रय बनाना चाहिए, अथवा धनधान्य-सम्पन्न किसी शत्रुदल को नष्ट करना है, या पार्ष्णिग्राह, आसार, मध्यम और उदासीन राजा का प्रतीकार करना है, तो धीरे से यात्रा करे । ऊबड़-खावड़ मार्ग को साफ करने के लिए भी धीरे से ही यात्रा करे । अथवा जब कोष, अपनी सेना, मित्रसेना, शत्रुसेना, आटविक सेना, कारीगर और अपनी सेना के अनुकूल ऋतु की प्रतीक्षा करनी हो तो तब भी धीरे-धीरे यात्रा करे । अथवा जब यह संभावना हो कि शत्रु का दुर्ग बेमरम्मत है, उसका संगृहीत धान्य भी समाप्त प्राय है, उसके रक्षा-साधन भी विनष्ट हैं, धन देकर अपने वश में की हुई सेना भी उससे खिन्न है और मित्रसेना भी उससे विरक्त है, तो भी धीरे-धीरे यात्रा करे । अथवा जब समझे कि शत्रुद्रोही लोग अभी जल्दी में नहीं हैं,

४१ कौ०