कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
पृष्ठ 724, कुल 918 में से
संदर्भ में पढ़ें| प्रकरण १४८-१४९ | स्कन्धावारप्रयाणां बलव्यसनाव- |
|---|---|
| अध्याय २ | स्कन्दकालरक्षणं च |
(१) ग्रामारण्यानामध्वनि निवेशान् यवसेन्धनोदकवशेन परिसंख्याय स्थानासनगमनकालं च यात्रां यायात् । तत्प्रतीकारद्विगुणं भक्तोपकरणं वाहयेत् । अशक्तो वा सैन्येष्ववायोजयेत् । अन्तरेषु वा निचिनुयात् । (२) पुरस्तान्नायकः । मध्ये कलत्रं स्वामी च । पार्श्वयोरश्वा बाहूत्सारः । चक्रान्तेषु हस्तिनः । प्रसारवृद्धिर्वा सर्वतः । वनाजीवः प्रसारः । स्वदेशादन्वायतिर्वीवधः । मित्रबलमासारः । कलत्रस्थानमपसारः । पश्चात्सेनापतिः पर्यायान्निविशेत ।
छावनी का प्रमाण और आपत्ति एवं आक्रमण के समय सेना की रक्षा
( १ ) गावों, जंगलों तथा मार्गों में ठहरने योग्य स्थानों का घास, लकड़ी तथा जल आदि के अनुसार निर्णय कर और वहाँ पर पहुँचने, ठहरने, वहाँ से जाने आदि का पहिले ही से समय का निश्चय करके फिर विजिगीषु को यात्रा के लिए घर से निकलना चाहिए । उस यात्रा में खाने-पीने और पहनने ओढ़ने के लिए जितने समान की आवश्यकता हो, उससे दुगुना सामान साथ रखना चाहिए । यदि इतना सब सामान सवारियों पर ही न जा सके तो उसमें से थोड़ा-थोड़ा सैनिकों को दिया जाय । अथवा पड़ाव के लिए नियुक्त स्थानों से आवश्यक सामान को संग्रह करके साथ ले जाना चाहिए ।
( २ ) सेना के सबसे आगे दस सेनापतियों के प्रमुख नायक को चलना चाहिए, बीच में अन्तःपुर तथा राजा चले, अगल-बगल में भुजाओं से ही शत्रु के आघात को रोकने वाली घुड़सवारसेना चले, पिछले भाग में हाथी चलें, और अन्न, घास, भूसा आदि सब सामान चारों ओर से ले जाया जाय । जंगल में पैदा होने वाले अन्न, घास आदि आजीविका-योग्य वस्तुओं को प्रसार कहते हैं । अपने ही देश से अनाज आदि द्रव्यों के आयात को वीवध कहते हैं । मित्र की सेना को आसार कहा जाता है । रानियों के ठहरने के स्थान को अपसार कहते हैं । यात्राकाल में अपनी-अपनी सेना के सबसे पीछे सेनापति रहे ।