भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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६४६ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दसवां अधिकरण

(१) शुष्कचर्मवृत्तशर्कराकोशकैर्गोमहिषोष्ट्रयूथैर्वा त्रस्नुभिरकृतहस्त्यश्वं भिन्नमभिन्नः प्रतिनिवृत्तं हन्यात् । प्रतिसूर्यवातं वा सर्वमभिहन्यात् । (२) धान्वनवनसङ्कटपङ्कशैलनिम्नविषमनावो गावः शकटव्यूहो नीहारो रात्रिरिति सत्राणि । (३) पूर्वे च प्रहरणकालाः कूटयुद्धहेतवः । (४) संग्रामस्तु निर्दिष्टदेशकालो धर्मिष्ठः । (५) संहत्य दण्डं ब्रूयात्—‘तुल्यवेतनॊऽस्मि, भवद्भिः सह भोग्यमिदं राज्यं, मयाभिहितः परोऽभिहन्तव्यः’ इति । वेदेष्वप्यनुश्रूयते समाप्तदक्षिणानां यज्ञानामवभृथेषु—‘सा ते गतिर्या शूराणाम्’ इति । अपीह श्लोकौ भवतः— (६) यान् यज्ञसंघैस्तपसा च विप्राः स्वर्गैषिणः पात्रचयैश्च यान्ति । क्षणेन तामप्यतियान्ति शूराः प्राणान्सुयुद्धेषु परित्यजन्तः ॥


(१) सूखे चमड़े से बँधे हुए मिट्टी के छोटे-छोटे ढेलों से या घवड़ा जाने वाले गाय, भैंसों और ऊँटों के झुंडों के द्वारा हाथी-घोड़े रहित शत्रु की छिन्न-भिन्न हुई सेना को अपनी एकत्र सेना के द्वारा मरवा दिया जाय । सूर्य और हवा के सामने आयी हुई सभी तरह की सेना को नष्ट कर डालना चाहिए ।

(२) मरुस्थल का दुर्ग (धान्वन), जंगल का दुर्ग, कंटकाकीर्ण झाड़ियों वाले स्थान (संकट), दलदल भूमि, पहाड़ी इलाके, तराई क्षेत्र, ऊबड़-खाबड़ भूमि, नौकाएँ, गायों के झुंड, शकटव्यूह, कुहरा और रात्रि इन सब को सत्र कहा जाता है । इन स्थानों में छिप कर युद्ध करना चाहिए ।

(३) पूर्व प्रहार करने के समय और सत्र स्थान कूट युद्धों के कारण हुआ करते हैं ।

(४) यहाँ तक कूट युद्ध के विभिन्न प्रकारों का निरूपण किया गया ।

(५) विजिगीषु को चाहिए कि वह अपनी संगठित सेना से कहे कि 'मैं भी आपके ही समान वेतनभोगी नौकर हूँ । आप लोगों के साथ ही मैं इस राज्य का उपयोग कर सकता हूँ । इसलिए जिसका मैं शत्रु बताऊँ वह आप लोगों के हाथों अवश्य मारा जाना चाहिए ।' इस प्रकार सेना को उत्साहित करना चाहिए । तदनंतर मन्त्रियों और पुरोहितों द्वारा सेना को यह कह कर उत्साहित कराये कि वेदों में ऐसा लिखा हुआ है कि यज्ञ, अनुष्ठान समाप्त हो जाने के बाद और दक्षिणा दिये जाने के बाद यजमान को जो फल मिलता है । वही फल युद्धक्षेत्र में वीरगति पाये हुए सैनिक को मिलता है । इसी सम्बन्ध में पूर्वाचार्यों के दो श्लोक हैं कि—

(६) अनेक यज्ञों को करके, कठिन तप करके और अनेक सुपात्रों को दान