कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
पृष्ठ 731, कुल 918 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्र० १५०-१५२ : अ० ३ ] कूटयुद्ध और सेना-प्रयोग ६४७
(१) नवं शरावं सलिलस्य पूर्णं सुसंस्कृतं दर्भकृतोत्तरीयम् ।
तत्तस्य माभून्नरकं च गच्छेद्यो भर्तृपिण्डस्य कृते न युध्येत् ॥
(२) इति मन्त्रिपुरोहिताभ्यामुत्साहयेद्योधान् ।
(३) व्यूहसम्पदा कार्तान्तिकादिश्चास्य वर्गः सर्वज्ञदैवसंयोगख्यापनाभ्यां स्वपक्षमुद्धर्षयेत् । परपक्षं चोद्वेजयेत् । ‘श्वो युद्धम्’ इति कृतोपवासः शस्त्रवाहनं चानुशयीत । अथर्वभिश्च जुहुयात् । विजययुक्ताः स्वर्गीयाश्चाशिषो वाचयेत् । ब्राह्मणेभ्यश्चात्मानमतिसृजेत् ।
(४) शौर्यशिल्पाभिजानानुरागयुक्तमर्थमानाभ्यामविसंवादितमनीकगर्भं कुर्वीत । पितृपुत्रभ्रातृकाणामायुधीयानामध्वजं मुण्डानीकं राजस्थानम् । हस्ती रथो वा राजवाहनमश्वानुबन्धे । यत्प्रायः सैन्यो, यत्र वा विनीतः स्यात्, तदधिरोहयेत् । राजव्यञ्जनो व्यूहाधिष्ठानमायोज्यः ।
देकर ब्राह्मण लोग जिस उच्च गति को प्राप्त करते हैं, शूरवीर क्षत्रिय धर्मयुद्ध में प्राणोत्सर्ग करके उससे भी उच्च-गति को प्राप्त करते हैं ।
( १ ) ‘मन्त्रों से संस्कृत, जल से भरा हुआ और दर्भ से आच्छादित नई शराव का छलछलाता शकोरा उस व्यक्ति को प्राप्त नहीं होता और वह नरक में जाता है, जो अपने स्वामी के लिए प्राणों की बाजी नहीं लगाता ।’
( २ ) इस प्रकार मंत्री और पुरोहितों के द्वारा सैनिकों को प्रोत्साहित किया जाय ।
( ३ ) विजिगीषु राजा के ज्योतिर्विद् एवं शकुनशास्त्री व्यक्तियों को चाहिए कि वे अलग-अलग व्यूहों की विशेष रचना द्वारा अपनी सर्वज्ञता को और दैव-साक्षात्कार होने की प्रसिद्धि को फैलाकर अपने पक्ष के सैनिकों को उत्साहित करते रहें तथा शत्रु के सैनिकों को बेचैन बनाये रखें । ‘कल युद्ध है’ ऐसा निश्चय हो जाने पर विजिगीषु को चाहिए कि उस दिन उपवास करता हुआ वह अपने रथ, हाथी, घोड़े आदि सवारियों के पास ही शयन करे, और अथर्ववेद में बताये गये शत्रु-ध्वंसक मंत्रों का जप तथा अनुष्ठान करता रहे । शत्रु के हार जाने पर अपनी विजय के अनुकूल और अपने ही सैनिकों की वीरगति प्राप्त होने पर ब्राह्मणों से स्वर्गीय आशीर्वादों का वाचन कराये । अपनी रक्षा के लिए स्वयं को वह ब्राह्मणों को अर्पण कर दे ।
( ४ ) बहादुर, कारीगर, खानदानी तथा अनुरक्त और धन, मान आदि से सदा अनुकूल बनाई गई सेना को अपनी बड़ी सेना में रक्षा के निमित्त नियुक्त किया जाना चाहिए । राजा के पिता, पुत्र, भाई आदि अन्तरंग संबंधियों के निवास स्थान को और राजा के अङ्गरक्षक तथा प्रच्छन्न वेष धारण किये प्रधान सेना के निवास-स्थान को राजा के निवास स्थान के समीप ही टिकाया जाय । राजा हाथी या रथ