भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

पृष्ठ 732, कुल 918 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 732
६४८कौटिल्य का अर्थशास्त्र[ दसवां अधिकरण

(१) सूतमागधाः शूराणां स्वर्गमस्वर्गं भीरूणां जातिसङ्घकुलकर्मवृत्तस्तवं च योधानां वर्णयेयुः । पुरोहितपुरुषाः कृत्याभिचारं ब्रूयुः । सत्रिकवर्धकिमौहूर्तिकाः स्वकर्मसिद्धिमसिद्धिं परेषाम् ।

(२) सेनापतिरर्थमानाभ्यामभिसंस्कृतमनीकमाभाषेत—'शतसाहस्रो राजवधः । पञ्चाशतसाहस्रः सेनापतिकुमारवधः । दशसाहस्रः प्रवीरमुख्यवधः । पञ्चसाहस्रो हस्तिरथवधः । साहस्रोऽश्ववधः । शत्यः पत्तिमुख्यवधः । शिरो विंशतिकम् । भोगद्वैगुण्यं स्वयंग्राहश्चेति । तदेषां दशवर्गाधिपतयो विद्युः ।


पर सवार होकर चले और उसकी रक्षा के लिए साथ में अश्वारोही सैनिक हों । अथवा जिन सवारियों पर प्रायः सेना चल रही हो उसी प्रकार की सवारी में या जिस सवारी में चढ़ने का राजा का अच्छा अभ्यास हो, उसमें चढ़कर चले । व्यूहरचना का अधिष्ठाता किसी ऐसे व्यक्ति को नियुक्त किया जाय, जो राजा से अविकल रूप में मिलता-जुलता हो ।

(१) सूतों ( ऐतिहासिक गाथाओं के गायकों ) और मागधों ( स्तुतिवाचकों ) को चाहिए कि वे—शूर-वीर सैनिकों को स्वर्ग, कायरों को नरक और अन्य जाति संघी ( बटालियनों ) को उनके कुल, कर्म, शील, स्वभाव तथा व्यवहार के अनुसार ओजोमयी उत्साहवर्धक वाणी सुनाकर स्तुतिगान करें । पुरोहितों को चाहिए कि वे अथर्ववेद में निर्दिष्ट शत्रुनाशक कृत्याभिचार का अनुष्ठान करें । सत्री, बढ़ई और ज्योतिषियों को चाहिए कि वे सदा ही अपने कार्यों की सिद्धि और शत्रुकार्यों की असफलता के सम्बन्ध में प्रचार करते रहें ।

(२) युद्ध के लिए तैयार, धन-सत्कार से संवर्द्धित सेना को ललकार कर सेनापति यों कहे, 'आप लोगों में से जो भी सैनिक शत्रुराजा को मार डालेगा उसे एक लाख स्वर्णमुद्राएँ पुरस्कार में दी जायेंगी । जो सैनिक शत्रु के सेनापति या राजकुमार को मार डालेगा, उसे पचास हजार स्वर्णमुद्रायें इनाम में दी जायेंगी । इस प्रकार शत्रु के वीर सैनिकों में से मुख्य सैनिकों को मारने वाले को दस हजार, हाथी तथा रथों को नष्ट करने वाले को पाँच हजार, घुड़सवारों को नष्ट करने वाले को एक हजार, पैदल सेना के मुख्य सैनिकों को नष्ट करने वाले को एक सौ और साधारण सिपाही का शिर काट कर लाने वाले को बीस स्वर्ण मुद्राएँ इनाम में दी जायेंगी । इसके अतिरिक्त युद्ध में भाग लेने वाले प्रत्येक सैनिक का वेतन, भत्ता दुगुना कर दिया जायेगा और शत्रु के यहाँ से लूट-पाट में मिला हुआ सारा माल भी उन्हें ही दिया जायेगा ।' इस प्रकार बताये गये राजवध का समाचार केवल पदिक सेनापति और नायक ही जान पायें ।

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला) · पृष्ठ 732, कुल 918 में से · BharatKosha