कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्र० १५८-१५९ : अ० ६ ] व्यूह-प्रतिव्यूह-स्थापना ६६३
वस्थाप्योरस्याभिक्रान्तः श्येनः; विपर्यये चापं चापकुक्षिः प्रतिष्ठः सुप्रतिष्ठश्च । चापपक्षः सञ्जयः; स एवोरस्यातिक्रान्तो विजयः; स्थूलकर्णपक्षः स्थूलकर्णः; द्विगुणपक्षस्थूलो विशालविजयः; त्र्यभिक्रान्तपक्षश्चमूमूखः; विपर्यये झषास्यः । ऊर्ध्वराजिर्दण्डः सूची; द्वौ दण्डौ वलयः; चत्वारो दुर्जयः । इति दण्डव्यूहाः ।
(१) पक्षकक्षोरस्यैर्विषमं वर्तमानो भोगः । स सर्पसारी गोमूत्रिका वा । स युग्मोरस्यो दण्डपक्षः शकटः; विपर्यये मकरः; हस्त्यश्वरथैर्व्यतिकीर्णः शकटः पारिपतन्तकः । इति भोगव्यूहाः ।
(२) पक्षकक्षोरस्यानामेकीभावे मण्डलः । स सर्वतोमुखः सर्वतोभद्रः; अष्टानीको दुर्जयः । इति मण्डलव्यूहाः ।
कहते हैं । आगे-पीछे के उपयुक्त भागों पर सेना को रखकर जब मध्यभाग के द्वारा सेना पर आक्रमण किया जाता है तब उस व्यूह को श्येनव्यूह कहते हैं । इन चार व्यूहों के सर्वथा विपरीत व्यूहों का नाम है क्रमशः चाप, चापकुक्षि, प्रतिष्ठ और सुप्रतिष्ठ । जिस व्यूह के पिछले भाग चाप ( धनुष ) के समान हों वह संजयव्यूह कहलाता है । जब बीच से शत्रु पर आक्रमण करके उसके बीच प्रवेश कर दिया जाता है, दण्डव्यूह की वह स्थिति विजयव्यूह कहलाती है । विजयव्यूह की अपेक्षा जिसके पिछले हिस्से दुगुने बड़े हों वह विशाल विजयव्यूह कहलाता है । जिस व्यूह के अगला, दो पिछले और मध्यभाग, तीनों बराबर हों वह चमूमुखव्यूह कहलाता है । इसके विपरीत होने पर वही चमूमुखव्यूह झषास्य व्यूह कहलाता है । जिस व्यूह की सेना ऊँची होकर शत्रुसेना पर आक्रमण करती है उस दण्डव्यूह को सूचीव्यूह कहते हैं । जब आगे, पीछे और मध्य, तीनों स्थानों में दो दण्डव्यूहों को तिरछा खड़ा किया जाय तब उसको वलय व्यूह कहते हैं । यदि इसी प्रकार चार दण्डव्यूहों को खड़ा कर दिया जाय तो उसको दुर्जयव्यूह कहते हैं । यहाँ तक दण्डव्यूहों का निरूपण हुआ ।
( १ ) आगे-पीछे आदि स्थानों के द्वारा विषम संख्या में रचा हुआ व्यूह भोग-व्यूह कहलाता है । भोगव्यूह दो प्रकार का होता है—एक सर्पहारी और दूसरा गोमूत्रिका । जब उसका मध्य भाग दो भागों में बँटकर दण्डाकार दोनों ओर स्थित हो जाता है उस स्थिति में उसको शकटव्यूह कहा जाता है । इसकी विपरीतावस्था में वही व्यूह मकरव्यूह कहलाता है । हाथी, घोड़े और रथों से युक्त शकटव्यूह को पारिपतन्तकव्यूह कहते हैं । यहाँ तक भोगव्यूहों का निरूपण हुआ ।
( २ ) जिस व्यूह में आगे-पीछे और बीच के सभी विभाग एक साथ मिल जायें उसको मंडलव्यूह कहते हैं । जब चारों ओर से शत्रु पर आक्रमण किया जाय तब वही