भारतकोश
संग्रह पर लौटें

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

प्र० १५८-१५९ : अ० ६ ] व्यूह-प्रतिव्यूह-स्थापना ६६३

वस्थाप्योरस्याभिक्रान्तः श्येनः; विपर्यये चापं चापकुक्षिः प्रतिष्ठः सुप्रतिष्ठश्च । चापपक्षः सञ्जयः; स एवोरस्यातिक्रान्तो विजयः; स्थूलकर्णपक्षः स्थूलकर्णः; द्विगुणपक्षस्थूलो विशालविजयः; त्र्यभिक्रान्तपक्षश्चमूमूखः; विपर्यये झषास्यः । ऊर्ध्वराजिर्दण्डः सूची; द्वौ दण्डौ वलयः; चत्वारो दुर्जयः । इति दण्डव्यूहाः ।

(१) पक्षकक्षोरस्यैर्विषमं वर्तमानो भोगः । स सर्पसारी गोमूत्रिका वा । स युग्मोरस्यो दण्डपक्षः शकटः; विपर्यये मकरः; हस्त्यश्वरथैर्व्यतिकीर्णः शकटः पारिपतन्तकः । इति भोगव्यूहाः ।

(२) पक्षकक्षोरस्यानामेकीभावे मण्डलः । स सर्वतोमुखः सर्वतोभद्रः; अष्टानीको दुर्जयः । इति मण्डलव्यूहाः ।


कहते हैं । आगे-पीछे के उपयुक्त भागों पर सेना को रखकर जब मध्यभाग के द्वारा सेना पर आक्रमण किया जाता है तब उस व्यूह को श्येनव्यूह कहते हैं । इन चार व्यूहों के सर्वथा विपरीत व्यूहों का नाम है क्रमशः चाप, चापकुक्षि, प्रतिष्ठ और सुप्रतिष्ठ । जिस व्यूह के पिछले भाग चाप ( धनुष ) के समान हों वह संजयव्यूह कहलाता है । जब बीच से शत्रु पर आक्रमण करके उसके बीच प्रवेश कर दिया जाता है, दण्डव्यूह की वह स्थिति विजयव्यूह कहलाती है । विजयव्यूह की अपेक्षा जिसके पिछले हिस्से दुगुने बड़े हों वह विशाल विजयव्यूह कहलाता है । जिस व्यूह के अगला, दो पिछले और मध्यभाग, तीनों बराबर हों वह चमूमुखव्यूह कहलाता है । इसके विपरीत होने पर वही चमूमुखव्यूह झषास्य व्यूह कहलाता है । जिस व्यूह की सेना ऊँची होकर शत्रुसेना पर आक्रमण करती है उस दण्डव्यूह को सूचीव्यूह कहते हैं । जब आगे, पीछे और मध्य, तीनों स्थानों में दो दण्डव्यूहों को तिरछा खड़ा किया जाय तब उसको वलय व्यूह कहते हैं । यदि इसी प्रकार चार दण्डव्यूहों को खड़ा कर दिया जाय तो उसको दुर्जयव्यूह कहते हैं । यहाँ तक दण्डव्यूहों का निरूपण हुआ ।

( १ ) आगे-पीछे आदि स्थानों के द्वारा विषम संख्या में रचा हुआ व्यूह भोग-व्यूह कहलाता है । भोगव्यूह दो प्रकार का होता है—एक सर्पहारी और दूसरा गोमूत्रिका । जब उसका मध्य भाग दो भागों में बँटकर दण्डाकार दोनों ओर स्थित हो जाता है उस स्थिति में उसको शकटव्यूह कहा जाता है । इसकी विपरीतावस्था में वही व्यूह मकरव्यूह कहलाता है । हाथी, घोड़े और रथों से युक्त शकटव्यूह को पारिपतन्तकव्यूह कहते हैं । यहाँ तक भोगव्यूहों का निरूपण हुआ ।

( २ ) जिस व्यूह में आगे-पीछे और बीच के सभी विभाग एक साथ मिल जायें उसको मंडलव्यूह कहते हैं । जब चारों ओर से शत्रु पर आक्रमण किया जाय तब वही

६६४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दसवां अधिकरण

(१) पक्षकक्षोरस्यानाम् असंहतादसंहतः । स पञ्चानीकानामाकृति-स्थापनाद्वज्रो गोधा वा । चतुर्णामुद्यानकः काकपदी वा । त्रयाणामर्धचन्द्रिकः कर्कटकशृङ्गी वा । इत्यसंहतव्यूहाः । (२) रथोरस्यो हस्तिकक्षोऽश्वपृष्ठोऽरिष्टः । (३) पत्तयोऽश्वा रथा हस्तिनश्चानुपृष्ठमचलः । (४) हस्तिनोऽश्वा रथाः पत्तयश्चानुपृष्ठमप्रतिहतः । (५) तेषां प्रदरं दृढकेन घातयेत्; दृढकमसह्येन, श्येनं चापेन, प्रतिष्ठं सुप्रतिष्ठेन, सञ्जयं विजयेन, स्थूलकर्णं विशालविजयेन, पारिपतन्तकं सर्वतोभद्रेण । दुर्जयेन सर्वान् प्रतिव्यूहेत ।

मण्डलब्यूह की स्थिति सर्वतोभद्रव्यूह कहलाती है और जब उस व्यूह में आठ सेनायें मिलकर शत्रु पर आक्रमण करें तो वही व्यूह दुर्जयव्यूह कहलाता है । यहाँ तक मण्डलब्यूहों का निरूपण हुआ ।

( १ ) आगे-पीछे आदि की सेनाओं को तितर-बितर कर जो युद्ध किया जाता है उसे असंहतव्यूह कहते हैं । उसके दो प्रकार हैं : एक वज्र और दूसरा गोधा । जब आगे-पीछे की सभी सेनाओं को वज्र के आकार में खड़ा कर दिया जाता है तब उसे वज्रव्यूह और जब उन्हें गोह के आकार में खड़ा कर दिया जाता है तब उसे गोधाव्यूह कहते हैं । जब कि आगे के दोनों हिस्से, बीच का एक हिस्सा और अंत का एक हिस्सा इन चार स्थानों में उक्त प्रकार से सेना को खड़ा कर दिया जाता है तब उस असंहत व्यूह को उद्यानकव्यूह या काकपक्षीव्यूह कहते हैं । जब आगे के दोनों हिस्सों और बीच के एक हिस्से में सेना को खड़ा कर दिया जाता है तब उस व्यूह को अर्धचन्द्रिक या कर्कटकशृङ्गीव्यूह कहते हैं । असंहत व्यूह के यही प्रमुख भेद हैं ।

( २ ) व्यूहों के तीन भेद और हैं : अरिष्ट, अचल और अप्रतिहत । जिस व्यूह के मध्य में रथ, अंत में घोड़े और आदि में हाथी हों उसको अरिष्टव्यूह कहते हैं ।

( ३ ) जिस व्यूह में पैदल, हाथी, घोड़े और रथ एक-दूसरे के पीछे हों, उसे अचलव्यूह कहते हैं ।

( ४ ) जिस व्यूह में हाथी, घोड़ा, रथ और पैदल एक-दूसरे के पीछे हों, उसे अप्रतिहतव्यूह कहते हैं ।

( ५ ) उक्त व्यूहों में से प्रदर को दृढक से, दृढक को असह्य से, श्येन को चाप से, प्रतिष्ठ को सुप्रतिष्ठ से, संजय को विजय से, स्थूलकर्ण को विशालविजय से और पारिपतंतक को सर्वतोभद्र से तोड़ा जाना चाहिए । दुर्जयव्यूह के द्वारा सभी व्यूहों को तोड़ा जाना चाहिए ।

प्र० १५८-१५९ : अ० ६ ] व्यूह-प्रतिव्यूह-स्थापना ६६५

(१) पत्त्यश्वरथद्विपानां पूर्वं पूर्वमुत्तरेण घातयेत् । हीनाङ्गमधिकाङ्गेन चेति । (२) अङ्गदशकस्यैकः पतिः पदिकः, पदिकदशकस्यैकः सेनापतिः, तद्दशकस्यैको नायक इति । स तूर्यघोषध्वजपताकाभिर्व्यूहाङ्गानां संज्ञाः स्थापयेद् अङ्गविभागे सङ्घाते स्थाने गमने व्यावर्तने प्रहरणे च । (३) समे व्यूहे देशकालसारयोगात् सिद्धिः । (४) यन्त्रैरुपनिषद्योगैस्तीक्ष्णैर्व्यासक्तघातिभिः । मायाभिर्दैवसंयोगैः शकटैर्हस्तिभूषणैः ॥ (५) दूष्यप्रकोपैर्गोयूथैः स्कन्धावारप्रदीपनैः । कोटीजघनघातैर्वा दूतव्यञ्जनभेदनैः ॥ (६) दुर्गं दग्धं हृतं वा ते कोपः कुल्यः समुत्थितः । शत्रुराटविको वेति परस्योद्वेगमाचरेत् ॥


(१) पैदल, घोड़ा, रथ तथा हाथी इनको उत्तरोत्तर अंग से नष्ट करना चाहिए और हीन अंग को अधिक बलवान् अङ्ग से नष्ट करना चाहिए ।

(२) दस रथ और दस हाथियों के अधिकारी को पदिक; दस पदिकों के अधिकारी को सेनापति; और दस सेनापतियों के अधिकारी को नायक कहा जाता है । उस सर्वोच्चसत्ताधारी नायक को चाहिए कि वह विशेष वाद्य शब्दों द्वारा अथवा पताका-ध्वजाओं द्वारा व्यूह में खड़ी सेना के लिए सांकेतिक इशारों की व्यवस्था करे । युद्ध में खड़ी सेना को बिखराने के लिए, बिखरी हुई सेना को एकत्र करने के लिए, चलती हुई सेना को रोकने के लिए, रुकी हुई सेना को चलाने के लिए तथा आक्रमण करती हुई सेना को लौट आने के लिए तथा प्रहार करने के लिए यथावसर उक्त संकेतों का प्रयोग किया जाय ।

(३) शत्रु सेना और अपनी सेना में बराबर की व्यूह रचना होने पर देश, काल और योग के अनुसार विजय प्राप्त की जानी चाहिए ।

(४) जामदग्न्य आदि यंत्र, औपनिषदिक प्रकरण में निर्दिष्ट उपाय, तीक्ष्ण आदि गुप्तचरों, छल, कपट, ज्योतिष और हाथी के योग्य वेषों से ढके हुए रथ आदि के द्वारा शत्रु सेना को उद्विग्न करना चाहिए ।

(५) शत्रु के दूष्यों में कोप पैदा करके, आगे गायों का झुंड खड़ा करके, छावनी में आग लगाकर, सेना के आगे-पीछे छापा मारकर, गुप्तचरों को शत्रु सेना में घुसाकर शत्रु सेना को बेचैन करना चाहिए ।

(६) 'तेरे दुर्ग को आग लगा दी गई है, तेरे दुर्ग को जीत लिया गया है, तेरे कुल का ही कोई व्यक्ति तेरे विरुद्ध उठ खड़ा हुआ है, तेरा सामंत युद्ध के लिए तैयार

६६६ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दसवां अधिकरण

(१) एकं हन्यान्न वा हन्यादिषुः क्षिप्तो धनुष्मता । प्राज्ञेन तु मतिः क्षिप्ता हन्याद् गर्भगतानपि ॥

इति सांग्रामिके दशमेऽधिकरणे दण्डभोगमण्डलासंहतव्यूहव्यूहनं तस्य प्रतिव्यूहस्थापनं चेति षष्ठोऽध्यायः; आदितस्त्रयस्त्रिंशदधिकशततमः ।

समाप्तमिदं सांग्रामिकं दशममधिकरणम् ।

—: ० :—


हो गया है, तेरा आटविक तेरे विरुद्ध उठ आया है, आदि अफवाहों को उड़ाकर भी विजिगीषु शत्रु सेना को उद्विग्न कर सकता है ।

(१) धनुर्धारी के धनुष से छोड़ा गया बाण, संभव है किसी एक व्यक्ति को ही मार डाले या न भी मारे; किन्तु बुद्धिमान् व्यक्ति के द्वारा किया गया बुद्धि का प्रयोग गर्भस्थ प्राणियों को भी नष्ट कर देता है । इसलिए युद्ध की अपेक्षा बुद्धि को ही अधिक शक्ति-संपन्न समझना चाहिए ।

सांग्रामिक नामक दसवें अधिकरण में व्यूहप्रतिव्यूहस्थापना नामक छठा अध्याय समाप्त ।

—: ० :—

ग्यारहवाँ अधिकरण

ग्यारहवाँ अधिकरण

सङ्घवृत्त

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प्रकरण१६०-१६१
अध्याय

भेदोपादानानि, उपांशुदण्डश्च


(१) सङ्घलाभो दण्डमित्रलाभानामुत्तमः । सङ्घा हि संहतत्वादधृष्याः परेषाम् । ताननुगुणान् भुञ्जीत सामदानाभ्याम् । विगुणान् भेददण्डाभ्याम् ।

(२) काम्बोजसुराष्ट्रक्षत्रियश्रेण्यादयो वार्ताशस्त्रोपजीविनः । लिच्छिविकवृजिकमल्लकद्रककुकुरपाञ्चालादयो राजशब्दोपजीविनः ।

(३) सर्वेषामासन्नाः सत्रिणः सङ्घानां परस्परन्यङ्गद्वेषवैरकलहस्थानान्युपलभ्य क्रमाभिनीतं भेदमुपचारयेयुः—‘असौ त्वा विजलपति’ इति । एवमुभयतः । बद्धरोषाणां विद्याशिल्पद्यूतवैहारिकेष्वाचार्यव्यञ्जना बालककलहानुत्पादयेयुः । वेशशौण्डिकेषु वा प्रतिलोमप्रशंसाभिः सङ्घमुख्यमनुष्याणां तीक्ष्णाः कलहानुत्पादयेयुः । कृत्यपक्षोपग्रहेण वा ।


भेदक प्रयोग और उपांशुदण्ड

(१) भेदक प्रयोग : संघलाभ, सेनालाभ और मित्रलाभ, इन तीनों में संघ-लाभ उत्तम है; क्योंकि संगठित होने से संघों को शत्रु दबा नहीं पाता है । इन संघों के अनुकूल होने पर विजिगीषु को साम और दान के द्वारा उनका उपभोग करना चाहिए और प्रतिकूलावस्था में भेद तथा दण्ड के द्वारा उनका उपभोग करना चाहिए ।

(२) कम्बोज और सौराष्ट्र देशों के क्षत्रिय, वैश्य आदि वर्गों के संघ कृषि, व्यापार और शस्त्र के द्वारा जीविकोपार्जन करते हैं । लिच्छविक, व्रजिक, मल्लक, मद्रक, कुकुर, कुरु और पांचाल देशों के राजाओं के केवल नाममात्र के संघ होते हैं ।

(३) विजिगीषु को चाहिए कि उक्त सभी प्रकार के संघों में अपने सत्री नामक गुप्तचरों को नियुक्त करे और वे सत्री उन संघों के पारस्परिक दोष, द्वेष, वैर और कलह के कारणों को पकड़ कर धीरे-धीरे उन्हें प्रकाश में लाकर उन संघों में इस तरीके से कि 'अमुक संघ आप की ऐसी निंदा करता है' भेद डाल दे । इसी प्रकार दूसरे को भी पहिले के विरुद्ध भड़काने का यत्न करे । परस्पर द्वेष रखने वाले संघों के राजकुमारों के कपटी आचार्य बनकर गुप्तचर विद्या, शिल्प, द्यूत और प्रश्नोत्तर आदि के विषय में कलह उत्पन्न करा दे । अथवा वेश्या तथा सुरापान आदि में आसक्त संघ के मुख्य व्यक्तियों की उल्टी प्रशंसा कराकर तीक्ष्ण गुप्तचर उनमें कलह उत्पन्न करा दें । अथवा संघमुख्यों के प्रति जो कुछ, लुब्ध या भीत आदि भृत्य व्यक्ति हों उनको अपने वश में करके फिर संघों के साथ उनका कलह करा दे ।

६७० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ ग्यारहवां अधिकरण

६७० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ ग्यारहवां अधिकरण

(१) कुमारकान् विशिष्टच्छन्दिकया हीनच्छन्दिकानुत्साहयेयुः । (२) विशिष्टानां चैकपात्रं विवाहं हीनेभ्यो वारयेयुः । हीनान् वा विशिष्टैरेकपात्रे विवाहे वा योजयेयुः । अवहीनान् वा तुल्यभावोपगमने कुलतः पौरुषतः स्थानविपर्यास्तो वा । व्यवहारमवस्थितं वा प्रतिलोम-स्थापनेन निशामयेयुः । विवादपदेषु वा द्रव्यपशुमनुष्याभिघातेन रात्रौ तीक्ष्णाः कलहानुत्पादयेयुः । सर्वेषु च कलहस्थानेषु हीनपक्षं राजा कोश-दण्डाभ्यामुपगृह्य प्रतिपक्षवधे योजयेत्, भिन्नानपवाहयेद्वा । एकदेशे सम-स्तान् वा निवेश्य भूमौ चेषां पञ्चकुलीं दशकुलीं वा कृष्यां निवेशयेत् । एकस्था हि शस्त्रग्रहणसमर्थाः स्युः । समवाये चैषामत्ययं स्थापयेत् । (३) राजशब्दिभिरवरुद्धमवक्षिप्तं वा कुल्यमभिजातं राजपुत्रत्वे स्था-


( १ ) संघ के राजकुमारों में जो अधिक साधनसंपन्न होकर सुखपूर्वक रहते हों उनके मुकाबले में असंपन्न राजकुमारों को भड़का दे ।

( २ ) गुप्तचरों को चाहिए कि वे संघ के विशिष्ट व्यक्तियों को उनकी अपेक्षा हीन व्यक्तियों के साथ एक पंक्ति में बैठ कर भोजन करने तथा विवाहादि संबंध करने, से वर्जित करें । अथवा हीन व्यक्तियों को विशिष्ट व्यक्तियों के साथ एक पंक्ति में भोजन करने तथा विवाहादि संबंध के लिए प्रेरित करें । अथवा छोटी हैसियत के व्यक्तियों को बड़ी हैसियत के व्यक्तियों के बराबर खानदानी या बहादुरी या स्थानां-तर के लिए उत्साहित करें । अथवा संघ द्वारा किसी विवादास्पद विषय का निर्णय किये जाने पर जो निर्णय हुआ हो उसके विपरीत ही वादी को जाकर सुनायें । अथवा रात में तीक्ष्ण गुप्तचर स्वयं ही किसी संघ के द्रव्य, पशु तथा मनुष्यों को नष्ट कर उसको दूसरे संघ वालों का कार्य बताकर प्रचार करे और इस प्रकार के विवादास्पद विषयों को उठाकर उनको आपस में लड़ा दे । जब इस प्रकार के कलह संघों में उत्पन्न हों, तो विजिगीषु को चाहिए कि वह किसी पक्षपात रहित संघ के व्यक्ति को कोष तथा दण्ड के द्वारा अपने वश में कर उससे अपने शत्रु का वध करा डाले । अथवा संघ के विरुद्ध हुए उन व्यक्तियों को संघ से अलग करा दे । अथवा उनको किसी एक प्रदेश में इकट्ठा कर पाँच-पाँच, दस-दस समूहों के छोटे-छोटे गाँवों में बसा दे । क्योंकि यदि उन्हें एक साथ ही बसा दिया जायगा तो संभव है वे लोग फिर कभी अवसर आने पर विजिगीषु के विरुद्ध हथियार उठाने में समर्थ हो सकें, इसलिए उनकी आबादी के बीच में थोड़ी-थोड़ी सेना नियुक्त कर दे ।

( ३ ) विजिगीषु को चाहिए कि वह नाममात्र को राजा कहलाने वाले लिच्छिवी आदि क्षत्रिय-संघों से अवरुद्ध या तिरस्कृत, उच्चकुलोत्पन्न गुणी व्यक्ति को राजपुत्र

प्र० १६०-१६१ : अ० १ ] भेदक-प्रयोग और उपांशुदण्ड ६७१

पयेत् । कार्तान्तिकादिश्चास्य वर्गो राजलक्षण्यतां सङ्घेषु प्रकाशयेत् । सङ्घ-मुख्यांश्च धर्मिष्ठानुपजपेत्—'स्वधर्मममुष्य राज्ञः पुत्रे भ्रातरि वा प्रतिपद्य-ध्वम्' इति । प्रतिपन्नेषु कृत्यपक्षोपग्रहार्थमर्थं दण्डं च प्रेषयेत् । (१) विक्रमकाले शौण्डिकव्यञ्जनाः । पुत्रदारप्रेतापदेशेन 'नैषेच-निकम्' इति मदनरसयुक्तान् मद्यकुम्भान् शतशः प्रयच्छेयुः । (२) चैत्यदैवतद्वाररक्षास्थानेषु च सत्रिणः समयकर्मनिक्षेपं सहिरण्या-भिज्ञानमुद्राणि हिरण्यभाजनानि च प्ररूपयेयुः, दृश्यमानेषु च सङ्घेषु 'राज-कीयाः' इत्यावेदयेयुः । अथावस्कन्दं दद्यात् । (३) सङ्घानां वा वाहनहिरण्ये कालिके गृहीत्वा संघमुख्याय प्रख्यातं द्रव्यं प्रयच्छेत् । तदेषां याचिते 'दत्तममुष्मै मुख्याय' इति ब्रूयात् ।


के रूप में नियुक्त करे और संबंधित ज्योतिषी तथा सामुद्रिक लिच्छवी-संघों में जाकर उस राजपुत्र को राज-लक्षणों से युक्त प्रकाशित करें । उन संघों के जो मुख्य धार्मिक व्यक्ति हैं उनको इस प्रकार बहकाया जाय कि 'अमुक राजपुत्र या राजमाता को संघ के लोग कैद में डाल कर बहुत कष्ट दे रहे हैं; आप ही इस बीच धर्मात्मा व्यक्ति हैं, इसलिए आप ही उस निर्दोष राजपुत्र की रक्षा करें ।' जब संघ के मुख्य लोग इस बात को स्वीकार कर लें तब क्रुद्ध, लुब्ध एवं भीत कृत्य व्यक्तियों को अपने अनुकूल बनाने के लिए संघ के मुख्य व्यक्तियों के पास सहायतार्थ धन तथा सेना भेजी जाय ।

( १ ) जब युद्ध की तैयारी हो जाय; तब शराब बेचने वाले छद्मवेष गुप्तचर अपने स्त्री-पुत्रों के मर जाने का बहाना बनाकर 'यह नैषेचनिक मद्य है, अपने दिवंगत स्त्री-पुत्रों के निमित्त इसको हम आप लोगों के लिए भेंट करते हैं' ऐसा कह कर विष-रस से भरे हुए सैकड़ों घड़े लाकर उन्हें थमा दें ।

( २ ) देवालय तथा अन्य पवित्र स्थानों के दरवाजों पर और रक्षास्थानों के सभी गुप्तचर संघ के मुखिया के साथ शर्त के तौर पर अमानत के रूप में दिया जाने वाला धन, अभिज्ञात सुवर्ण मुद्रा सहित तथा अन्य सुवर्ण के पात्र आदि वस्तुओं को संघ के अन्य व्यक्तियों के समक्ष इस प्रकार प्रकट करें कि वे इस बात को जान लें । बात के खुल जाने पर जब संघ के लोग यह पूछें कि 'यह सुवर्ण का सामान किसका है ?' तब उनको उत्तर दिया जाय कि 'यह राजा का है ।' इस प्रकार संघों में पारस्परिक फूट पड़ जाने के बाद विजिगीषु फौरन उन पर धावा बोल दे ।

( ३ ) अथवा सभी गुप्तचर किसी बहाने से संघ के लोगों से घोड़े, सवारी तथा हिरण्य आदि को नियत समय पर वापिस कर देने के वायदे पर ले ले, और समय आने पर सब लोगों के सामने उस सामान को संघ के मुखिया को वापिस कर दे ।

६७२ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ ग्यारहवां अधिकरण

(१) एतेन स्कन्धावाराटवीभेदो व्याख्यातः । (२) सङ्घमुख्यपुत्रमात्मसंभावितं वा सत्त्री ग्राहयेत्—'अमुष्य राज्ञः पुत्रस्त्वं शत्रुभयादिह न्यस्तोऽसि' इति । प्रतिपन्नं राजा कोशदण्डाभ्यामुपगृह्य सङ्घेषु विक्रमयेत्; अवाप्तार्थस्तमपि प्रवासयेत् । (३) बन्धकीपोषकाः प्लवकनटनर्तकसौभिका वा प्रणिहिताः स्त्रीभिः परमरूपयौवनाभिः सङ्घमुख्यानुन्मादयेयुः । जातकामानामन्यतमस्य प्रत्ययं कृत्वाऽन्यत्र गमनेन प्रसभहरणेन वा कलहानुत्पादयेयुः । कलहे तीक्ष्णाः कर्म कुर्युः–हतोऽयमित्थं कामुकः' इति । (४) विसंवादितं वा मर्षयमाणमभिसृत्य स्त्री ब्रूयात्—असौ मां मुख्यस्त्वयि जातकामां बाधते, तस्मिन् जीवति नेह स्थास्यामि' इति घातमस्य प्रयोजयेत् ।


जब वे लोग उससे अपना सामान माँगे तो कह दे कि 'वह सामान मुखिया को वापिस कर दिया गया है।' इस रीति से सभी गुप्तचर, संघ के लोगों और मुखिया के बीच भेद डाल दें ।

( १ ) अपनी छावनी में प्रविष्ट आटविक लोगों को परस्पर फोड़ने के लिए भी उक्त उपायों को ही उपयोग में लाना चाहिए ।

( २ ) उपांशुवध : संघमुख्य के अभिमानी पुत्र को सभी गुप्तचर यह कह कर बहकायें कि 'तू अमुक राजा का पुत्र है, शत्रु भय से यहाँ रख दिया गया है'। यदि संघ मुख्य का पुत्र इस बात को मान जाय तो उसको कोष और सेना की सहायता देकर संघों के ऊपर आक्रमण के लिए भेज दिया जाय । उसके द्वारा जब अपने कार्य की सिद्धि हो जाय तो बाद में उसको भी प्रवासित कर दिया जाय या मार दिया जाय ।

( ३ ) कुलटा स्त्रियों का पालन-पोषण करने वाले या प्लवक, नट, नर्तक और सौभिक वेष में रहने वाले गुप्तचर अत्यंत सुन्दरी यौवन-संपन्न स्त्रियों के द्वारा संघमुख्यों को प्रमादी बनायें । जब स्त्रियों में बहुत से संघमुख्यों की आसक्ति हो जाय तो उनमें से किसी एक को किसी सांकेतिक स्थान पर स्त्री से मिलने का वायदा कर, ठीक समय पर उस स्त्री को वहाँ से किसी दूसरे संघमुख्य के द्वारा अन्यत्र भिजवा दें या उसके द्वारा अपहरण करा दें और बाद में इसी निमित्त उन संघमुख्यों का परस्पर झगड़ा करा दें । झगड़ा होने पर तीक्ष्ण गुप्तचर उनमें से किसी एक संघ मुख्य को मार डालें और बाद में यह अफवाह उड़ा दें कि एक कामी पुरुष ने दूसरे कामी पुरुष का वध कर डाला है ।

( ४ ) यदि उन संघमुख्यों में एक व्यक्ति स्त्री के लिए झगड़ा न करना चाहे तो

प्र० १६०-१६१ : अ० १ ] भेदक-प्रयोग और उपांशुदण्ड ६७३

(१) प्रसह्यापहृता वा वनान्ते क्रीडागृहे वापहर्तारं रात्रौ तीक्ष्णेन घातयेत् । स्वयं वा रसेन । ततः प्रकाशयेद्—'अमुना मे प्रियो हतः' इति । (२) जातकामं वा सिद्धव्यञ्जनः सांवननिकीभिरोषधीभिः संवास्य रसेनातिसन्धायोपगच्छेत् । तस्मिन्नपक्रान्ते सत्रिणः परप्रयोगमभिशंसेयुः । (३) आढ्यविधवा गूढाजीवा योगस्त्रियो वा दायनिक्षेपार्थं विवदमानाः संघमुख्यानुन्मादयेयुः इति । अदितिकौशिकस्त्रियो नर्तकीगायना वा प्रतिपन्नान् गूढवेश्मसु रात्रिसमागमप्रविष्टांस्तीक्ष्णा हन्युर्बद्ध्वा हरेयुर्वा । (४) सत्री वा स्त्रीलोलुपं सङ्घमुख्यं प्ररूपयेत्—'अमुष्मिन् ग्रामे दरिद्रकुलमपसृतं, तस्य स्त्री राजार्हा, गृहाणैनाम्' इति । गृहीतायामर्धमासान्तरं


उसके पास जाकर वह स्त्री कहे 'आपके प्रति मेरी दिली ख्वाहिश होने पर भी अमुक संघमुख्य मुझे आपके पास आने से रोकता है। उसके जीवित रहते मैं आपके पास न आ सकूँगी', इस प्रकार दूसरे संघमुख्य के वध का आयोजन किया जाय।

(१) अथवा बलात् अपहृत स्त्री तीक्ष्ण गुप्तचर द्वारा अपने अपहरण करने वाले व्यक्ति को मरवा डाले, अथवा स्वयं ही उसे विष देकर मार डाले। तदनन्तर यह अफवाह फैलाये कि 'अमुक संघमुख्य कामुक व्यक्ति ने मेरे प्रियतम को मार डाला है।'

(२) अथवा संघमुख्य जब उस स्त्री पर आसक्त हो जाय तो सिद्ध के वेष में रहने वाला गुप्तचर उस स्त्री पर वशीकरण मन्त्र प्रयोग करने के बहाने संघमुख्य व्यक्ति को विषमिश्रित औषधियाँ देकर मार डाले और स्वयं वहाँ से भाग जाय। उसके भाग जाने पर सभी गुप्तचर इस अफवाह को उड़ायें कि 'प्रतिद्वंद्वी किसी कामी पुरुष की प्रेरणा से ही सिद्ध-पुरुष के द्वारा इसको विष देकर मारा है।'

(३) कोई धनी विधवा, गूढाजीवा (गरीबी के कारण व्यभिचार करने वाली सधवा), या स्त्री का कपटवेष धारण करने वाले पुरुष दायभाग या अमानत आदि का विवाद लेकर निर्णय के बहाने संघमुख्यों के पास जाकर उन्हें अपने वश में कर ले। अथवा अदिति (तरह-तरह के देवताओं के चित्र दिखाकर जीविका कमाने वाली) स्त्रियाँ, या कौशिक स्त्रियाँ (सँपेरों की स्त्रियाँ) या नाचने-गाने वाली स्त्रियाँ ही संघमुख्यों को अपने वश में करें। जब संघमुख्य उन स्त्रियों के जाल में फँस जायें और उनसे सम्भोग करने के लिए किसी निश्चित स्थान का संकेत कर दें, तब एकान्त में उन स्थानों पर रात में संभोग करते हुए संघमुख्यों को तीक्ष्ण गुप्तचर मार डाले या बांध कर उनका अपहरण कर लें।

(४) अथवा स्त्रीलोलुप संघमुख्य को सभी गुप्तचर यह कह कर बहकायें कि 'अमुक गाँव का एक गरीब व्यक्ति जीविकोपार्जन के लिए विदेश चला गया है।

४३ कौ०

६७४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ ग्यारहवां अधिकरण

सिद्धव्यञ्जनो दूष्यः सङ्घमुख्यमध्ये प्रक्रोशेत—‘असौ मे मुख्यां भार्यां स्नुषां भगिनीं दुहितरं वाधिचरति’ इति । तं चेत्सङ्घो निगृह्णीयात्, राजैनमुपगृह्य विगुणेषु विक्रमयेत् । अनिगृहीते सिद्धव्यञ्जनं हि रात्रौ तीक्ष्णाः प्रवासयेयुः । ततस्तद्व्यञ्जनाः प्रक्रोशेयुः—असौ ब्रह्महा ब्राह्मणीजारश्च’ इति । (१) कार्तान्तिकव्यञ्जनो वा कन्यामन्येन वृतामन्यस्य प्ररूपयेत्—‘अमुष्य कन्या राजपत्नी राजप्रसविनी च भविष्यति, सर्वस्वेन प्रसह्य वैनां लभस्व’ इति । अलभ्यमानायां परपक्षमुद्धर्षयेत् । लब्धायां सिद्धः कलहः । (२) भिक्षुकी वा प्रियभार्यं मुख्यं ब्रूयात्—‘असौ ते मुख्यो यौवनोत्सिक्तो भार्यायां मां प्राहिणोत्; तस्याहं भयाल्लेख्यमाभरणं गृहीत्वाऽऽगतास्मि,


उसकी रूपवती स्त्री राजा के योग्य है। आप उसको ले लें।' यदि वह संघमुख्य उस स्त्री को ग्रहण कर ले तो पन्द्रह दिन के बाद सिद्ध-वेषधारी दूष्य पुरुष संघमुख्यों के पास आकर शोर मचाता हुआ इस प्रकार कहे 'यह संघमुख्य मेरी पत्नी या पुत्रवधू या बहिन या लड़की को बलात् उपभोग करता है।' इस बात को सुनकर संघ के लोग यदि उस संघमुख्य को गिरफ्तार कर लें तो विजिगीषु राजा उस गिरफ्तार व्यक्ति को अपनी ओर मिलाकर, विरोधी संघों के साथ उसको युद्ध करने के लिए खड़ा कर दे। यदि उसको गिरफ्तार न किया जाय तो सिद्ध के वेष में आये हुए उस दूष्य पुरुष को तीक्ष्ण गुप्तचर रात में मार डालें। उसके बाद वही तीक्ष्ण गुप्तचर सिद्ध का वेष धारण कर यह शोर मचाये कि 'अमुक संघमुख्य ब्रह्म-हत्यारा है। यह ब्राह्मणी का बलात् उपभोग करता है और इसी ने ब्राह्मण को भी मार डाला है।'

(१) ज्योतिषी के वेष में रहने वाले सभी गुप्तचर किसी दूसरे संघमुख्य द्वारा वरण की हुई कन्या को किसी दूसरे ही संघमुख्य के लिए बतलाकर उससे कहे कि 'अमुक व्यक्ति की कन्या से जो व्याह करेगा वह राजा होगा और उससे जो पुत्र होगा वह भी राजा बनेगा। इसलिए अपना सर्वस्व लगाकर अथवा बलात्कार द्वारा ही उसको अवश्य प्राप्त करो।' इसके बाद यत्न करने पर भी यदि वह संघमुख्य उस कन्या को प्राप्त न कर सके तो जिस घर में उस कन्या का विवाह हुआ है उन लोगों को इसके विरुद्ध उभारे। यदि वह कन्या को प्राप्त कर ले तब दोनों संघमुख्यों में झगड़ा होना निश्चित है।

(२) अथवा भिक्षुकी के वेष में रहने वाली गुप्तचर पर किसी ऐसे संघमुख्य के पास, जो कि अपनी स्त्री पर बुरी तरह आसक्त है, जाकर यह कहे 'अपने यौवन के अभिमान में अमुक संघमुख्य ने आपकी स्त्री के साथ समागम करने की इच्छा से दूती बनाकर मुझे भेजा है, भय से विवश होकर वह प्रेमपत्र और यह आभूषण

प्र० १६०-१६१ : अ० १ ] भेदक-प्रयोग और उपांशुदण्ड ६७५

निर्दोषो ते भार्या; गूढमस्मिन् प्रतिकर्तव्यम् । अहमपि तावत्प्रतिपत्स्यामि' इति । एवमादिषु कलहस्थानेषु स्वयमुत्पन्ने वा कलहे तीक्ष्णैरुत्पादिते वा हीनपक्षं राजा कोशदण्डाभ्यामुपगृह्य विगुणेषु विक्रमयेदपवाहयेद् वा ।

(१) सङ्घेष्वेवमेकराजो वर्तेत । सङ्घाश्चाप्येवमेकराजादेतेभ्योऽतिसन्धानेभ्यो रक्षेयुः ।

(२) सङ्घमुख्यश्च सङ्घेषु न्यायवृत्तिर्हितः प्रियः ।
दान्तो युक्तजनस्तिष्ठेत्सर्वचित्तानुवर्तकः ॥

इति संघवृत्ते एकादशेऽधिकरणे भेदोपादानानि उपांशुदण्डश्चेति प्रथमोऽध्यायः;
आदितश्चतुस्त्रिंशदधिकशततमः ।

समाप्तमिदं संघवृत्तं नाम एकादशमधिकरणम् ।

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आदि उपहार लेकर मुझे यहाँ आना पड़ा है । आपकी पत्नी सर्वथा निर्दोष है । इसलिए आप चुपचाप ही उस संघमुख्य का वध कर डालें । जब तक उसकी हत्या नहीं की जायगी तब तक डर के मारे मैं भी यहाँ से नहीं जा सकती हूँ ।' इस प्रकार कलह के कारणों के उत्पन्न होने पर अथवा तीक्ष्ण आदि गुप्तचरों द्वारा उत्पन्न किये जाने पर कमजोर संघमुख्य को विजिगीषु कोष तथा सेना की यथोचित सहायता देकर अपने वश में कर ले और अवसर आने पर उसे विरोधी संघमुख्यों के मुकाबले में युद्ध के लिए तैयार कर दे । यदि वह युद्ध करने में असमर्थ हो तो उसे अपने देश से बाहर कर दे ।

( १ ) इस प्रकार विजिगीषु उन संघमुख्यों पर अपना आधिपत्य जमाये रखे और संघों को भी उचित है कि वे इस प्रकार की चेष्टा करने वालों तथा उनके द्वारा फैलाये गये षड्यन्त्रों से अपनी रक्षा करते रहें ।

( २ ) अतः संघमुख्य को चाहिए कि वह संघों के बीच में न्यायपूर्ण हितकारी और प्रिय व्यवहार करे । कभी भी उद्धत होकर बर्ताव न करे और अपने अनुकूल व्यक्तियों को सदा अपने समीप रखे तथा सब संघों के व्यक्तियों की राय से राज-व्यवहार चलाये ।

संघवृत्त नामक ग्यारहवें अधिकरण में भेदोपादान-उपांशुदण्ड नामक पहला अध्याय समाप्त ।

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(प्रस्तुत पृष्ठ अत्यधिक धुंधला/प्रकाश के आधिक्य (faded/overexposed) के कारण लगभग पूर्णतः अपाठ्य है।)


कठोपनिषद् [...]

(उपर्युक्त पृष्ठ का मूल पाठ अत्यधिक क्षीण होने के कारण स्पष्ट रूप से पठनीय नहीं है।)

बारहवाँ अधिकरण

बारहवाँ अधिकरण

आबलीयस

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प्रकरण १६२दूतकर्माणि
अध्याय १

(१) बलीयसाऽभियुक्तो दुर्बलः सर्वत्रानुप्रणतो वेतसधर्मा तिष्ठेत् । 'इन्द्रस्य हि स प्रणमति यो बलीयसो नमति' इति भारद्वाजः ।

(२) 'सर्वसन्दोहेन बलानां युध्येत, पराक्रमो हि व्यसनमपहन्ति । स्वधर्मश्चैष क्षत्रियस्य, युद्धे जयः पराजयो वा' इति विशालाक्षः ।

(३) नेति कौटिल्यः । सर्वत्रानुप्रणतः कुलैडक इव निराशो जीविते वसति । युध्यमानश्चाल्पसैन्यः समुद्रमिवाप्लवोऽवगाहमानः सीदति । तद्विशिष्टं तु राजानमाश्रितो दुर्गमविषह्यं वा चेष्टेत ।


दूतकर्म

(१) 'जब किसी दुर्बल राजा पर कोई बलवान् राजा आक्रमण करे तो उसे चाहिए कि वह हर प्रकार का अपमान सहन करता हुआ उसके सामने बेत की तरह झुक जाय। जो अपने से बलवान् राजा के सामने झुकता है, वह दंड के सामने झुकता है'—यह आचार्य भारद्वाज का मत है।

(२) किन्तु इसके विरुद्ध आचार्य विशालाक्ष की राय है कि 'दुर्बल राजा को चाहिए कि वह अपनी सारी सैन्य-शक्ति को लगाकर बलवान् राजा के साथ युद्ध करे; क्योंकि पराक्रम ही आपत्तियों को नष्ट करता है और पराक्रम तो क्षत्रिय का धर्म है। युद्ध में विजय हो या पराजय, क्षत्रिय को अपने क्षात्रधर्म का पालन करना चाहिए; शत्रु के आगे कदापि न झुकना चाहिए।'

(३) किन्तु आचार्य कौटिल्य उक्त दोनों मतों से सहमत नहीं है। उसका कहना है कि 'जो दुर्बल राजा हर तरह का अपमान होने पर भी नम्र ही बना रहता है उसका जीवन वैसा ही दूभर हो जाता है, जैसा कि अपने समूह से अलग हुए मेंढे का। इसी प्रकार थोड़ी सेना को लेकर जो युद्ध में जाता है उसकी वही स्थिति है; जो तैरने के साधनों को साथ लिये बिना ही समुद्र में कूद पड़ता है। इसलिए दुर्बल राजा को चाहिए कि वह अपने प्रतिद्वंद्वी राजा के सामने या उससे भी अधिक शक्तिशाली किसी दूसरे राजा का आश्रय प्राप्त करे। अथवा ऐसे दुर्ग में जाकर शत्रु का मुकाबला करे, जो कि अभेद्य हो।

६८० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ बारहवां अधिकरण

(१) त्रयोऽभियोक्तारो धर्मलोभासुरविजयिन इति । तेषामभ्यवपत्त्या धर्मविजयी तुष्यति; तमभ्यवपद्येत परेषामपि भयात् । भूमिद्रव्यहरणेन लोभविजयी तुष्यति; तमर्थेनाभ्यवपद्येत । भूमिद्रव्यपुत्रदारप्राणहरणेन असुरविजयी, तं भूमिद्रव्याभ्यामुपगृह्याग्राह्यः प्रतिकुर्वीत । (२) तेषामुत्तिष्ठमानं सन्धिना मंत्रयुद्धेन कूटयुद्धेन वा प्रतिव्यूहेत । शत्रुपक्षमस्य सामदानाभ्यां, स्वपक्षं भेददण्डाभ्याम् । दुर्गं राष्ट्रं स्कन्धावारं वास्य गूढाः शस्त्ररसाग्निभिः साधयेयुः । (३) सर्वतः पार्ष्णिमस्य ग्राहयेत्, अटवीभिर्वा राज्यं घातयेत्, तत्कुलीनावरुद्धाभ्यां वा हारयेत् । (४) अपकारान्तेषु चास्य दूतं प्रेषयेत् । अनपकृत्य वा सन्धानम् । तथाप्यभिप्रयान्तं कोशदण्डयोः पादोत्तरमहोरात्रोत्तरं वा सन्धि याचेत ।

(१) दुर्बल राजा पर आक्रमण करने वाला बलवान् राजा तीन प्रकार का होता है : १. धर्मविजयी २. लोभविजयी और ३. असुरविजयी । उनमें धर्मविजयी तो आत्मसमर्पण करने से संतुष्ट हो जाता है । उस धर्मविजयी राजा की शाखा में जाने से दुर्बल राजा अपने वर्तमान संकट को तो दूर कर ही लेता है, वरन् दूसरे बलवान् राजाओं से भी वह अपनी रक्षा कर लेता है लोभविजयी राजा भूमि और धन देने से संतुष्ट हो जाता है । इसलिए दुर्बल राजा धनादि देकर उसको संतुष्ट करे । किन्तु असुरविजयी राजा तो भूमि, द्रव्य, स्त्री, पुत्र और प्राणों तक ले लेने के बाद ही सूझता है । इसलिए उससे दूर रहकर ही उसको भूमि आदि देकर अपने अनुकूल बनाना चाहिए या संधि आदि के द्वारा उसका प्रतीकार करना चाहिए ।

(२) यदि उक्त राजाओं में से कोई राजा दुर्बल राजा पर आक्रमण करे तो संधि, मंत्र-युद्ध अथवा कूट-युद्ध के द्वारा उसका मुकाबला करना चाहिए । उस बलवान् अभियोक्ता के शत्रुपक्ष को साम तथा दाम द्वारा अपने अनुकूल बनाना चाहिए और अपने प्रकृतिवर्ग को भेद तथा दण्ड द्वारा अपने वश में रखना चाहिए । उस प्रबल राजा के दुर्ग, राष्ट्र तथा छावनियों को अपने गुप्तपुरुषों द्वारा शस्त्र, विष तथा अग्नि आदि से नष्ट कर देना चाहिए ।

(३) यथावसर उसके आगे-पीछे, अगल-बगल से छापा मारना चाहिये; अथवा आटविक पुरुषों द्वारा उसके दुर्ग, जनपद को नष्ट करवा देना चाहिए; अथवा उसके द्वारा अवरुद्ध उसके किसी बंधु-बांधव द्वारा ही उसके राज्य का अपहरण करवा देना चाहिए ।

(४) इस प्रकार उसका अनिष्ट कर देने के बाद संधि के लिए उसके पास अपना दूत भेजना चाहिए । अथवा यदि उसका अनिष्ट न किया जा सके तो उससे

प्र० १६२ : अ० १ ] दूतकर्म ६८१

(१) स चेद्दण्डसन्धि याचेत, कुण्ठमस्मै हस्त्यश्वं दद्यात् । उत्साहितं वा गरयुक्तम् । (२) पुरुषसन्धि याचेत, दूष्यामित्राटवीबलमस्मै दद्याद्योगपुरुषाधिष्ठितम् । तथा कुर्याद्यथोभयविनाशः स्यात् । तीक्ष्णबलं वाऽस्मै दद्यात्, यदवमानितं विकुर्वीत । मौलमनुरक्तं वा, यदस्य व्यसनेऽपकुर्यात् । (३) कोशसन्धि याचेत, सारमस्मै दद्यात् । यस्य क्रेतारं नाधिगच्छेत्; कुप्यमयुद्धयोग्यं वा । (४) भूमिसन्धि याचेत, प्रत्यादेयां नित्यामित्रामनपाश्रयां महाक्षयव्ययनिवेशां वास्मै भूमिं दद्यात् । (५) सर्वस्वेन वा राजधानीवर्जेन सन्धि याचेत बलीयसः ।


संधि की याचना करनी चाहिए। यदि वह इतने पर भी रजामंद न हो और चढ़ाई करने पर ही आमादा हो तो पूर्वप्रतिज्ञात धन में अपने कोष तथा सेना का चौथाई भाग अधिक बढ़ाकर उससे संधि के लिए याचना करनी चाहिए।

( १ ) यदि वह बलवान् अभियुक्ता संधि की शर्तों में केवल सेना को ही लेना चाहे तो सर्वथा अशक्त हाथी, घोड़े अथवा विष खिलाकर सशक्त हाथी, घोड़े देकर संधि कर लेनी चाहिए ।

( २ ) यदि वह संधि की शर्तों में पैदल सेना की माँग करे तो अपने गुप्तचरों को साथ मिलाकर दूष्यबल, शत्रुबल तथा आटविकबल शर्तनामा में देने चाहिए और इस प्रकार का प्रबंध करे कि अपनी वे दूष्य आदि सेनायें तथा शत्रु की सेनायें नष्ट हो जायें । अथवा ऐसे तीक्ष्ण बल को देना चाहिए जो थोड़ी सी बात पर बिगड़ उठे और शत्रु का अपकार करने के लिए तैयार हो जाय । अथवा वंशपरंपरा से चली आती अनुरक्त तथा विश्वासी सेना को संधि में देना चाहिए, जो आपत्ति के समय शत्रु का अपकार कर सके ।

( ३ ) यदि अभियुक्ता संधि के बदले में धन लेना पसंद करे तो ऐसे बहुमूल्य रत्न आदि दिये जायें, जिन्हें कोई न खरीद सके अथवा ऐसा सामान दिया जाय जो युद्ध में काम न आ सके ।

( ४ ) यदि अभियुक्ता भूमिसंधि की माँग करे तो उसको ऐसी भूमि दी जाय, जिसको आसानी से वापस लिया जा सके अथवा जिसके स्थायी शत्रु हों या जिसमें कोई दुर्ग न हो और जिसमें अधिक क्षय-व्यय की आशंका हो ।

( ५ ) अथवा जो अत्यंत बलवान् अभियुक्ता हो उसको राजधानी के अलावा अपना सर्वस्व देकर, उससे संधि कर लेनी चाहिए ।

आबलीयस नामक बारहवें अधिकरण में दूतकर्म नामक पहला अध्याय समाप्त ।

६४२ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ बारहवां अधिकरण

(१) यत्प्रसह्य हरेदन्यस्तत्प्रयच्छेदुपायतः ।
रक्षेत्स्वदेहं न धनं का ह्यनित्ये धने दया ॥

इति आबलीयसनाम्नि द्वादशेऽधिकरणे दूतककर्मणि सन्धियाचनं नाम प्रथमोऽध्यायः; आदितः पञ्चत्रिंशदधिकशततमः ।

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( १ ) यदि कोई बलवान् अभियोक्ता किसी दुर्बल राजा से बलात् धन आदि का अपहरण करे तो वह धन संधि आदि के बहाने उसी को दे देना चाहिए । धन की की अपेक्षा अपने प्राणों की अधिक रक्षा करनी चाहिए, क्योंकि अनित्य धन पर अधिक मोह करना ठीक नहीं है । यदि जीवन रहेगा तो नष्ट हुआ धन फिर से पैदा किया जा सकता है ।

आबलीयस नामक बारहवें अधिकरण में दूतकर्म नामक पहला अध्याय समाप्त ।

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