भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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६६६ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दसवां अधिकरण

(१) एकं हन्यान्न वा हन्यादिषुः क्षिप्तो धनुष्मता । प्राज्ञेन तु मतिः क्षिप्ता हन्याद् गर्भगतानपि ॥

इति सांग्रामिके दशमेऽधिकरणे दण्डभोगमण्डलासंहतव्यूहव्यूहनं तस्य प्रतिव्यूहस्थापनं चेति षष्ठोऽध्यायः; आदितस्त्रयस्त्रिंशदधिकशततमः ।

समाप्तमिदं सांग्रामिकं दशममधिकरणम् ।

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हो गया है, तेरा आटविक तेरे विरुद्ध उठ आया है, आदि अफवाहों को उड़ाकर भी विजिगीषु शत्रु सेना को उद्विग्न कर सकता है ।

(१) धनुर्धारी के धनुष से छोड़ा गया बाण, संभव है किसी एक व्यक्ति को ही मार डाले या न भी मारे; किन्तु बुद्धिमान् व्यक्ति के द्वारा किया गया बुद्धि का प्रयोग गर्भस्थ प्राणियों को भी नष्ट कर देता है । इसलिए युद्ध की अपेक्षा बुद्धि को ही अधिक शक्ति-संपन्न समझना चाहिए ।

सांग्रामिक नामक दसवें अधिकरण में व्यूहप्रतिव्यूहस्थापना नामक छठा अध्याय समाप्त ।

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